सारंगढ़-बिलाईगढ़। वार्ड क्रमांक 01 कुटेला में जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड (JSPL) की 16 हेक्टेयर जमीन पर अवैध कब्जे और उत्खनन का मामला अब एक बड़े प्रशासनिक स्कैंडल में बदलता नजर आ रहा है। इस मामले ने न केवल भू-माफियाओं की हिम्मत को उजागर किया है, बल्कि प्रशासन, पर्यावरण विभाग और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नियमों की धज्जियां: बिना अनुमति कैसे डंप हो रही है फ्लाई ऐश?
नियमों के मुताबिक, किसी भी निजी या सरकारी जमीन पर फ्लाई ऐश (राखड़) डालने के लिए एक लंबी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
पर्यावरण विभाग (Environment Board) का निरीक्षण: बिना विभाग की एनओसी (NOC) के एक ट्रक राखड़ भी कहीं नहीं डाली जा सकती।
कलेक्टर की अनुमति: जमीन के उपयोग को लेकर जिला प्रशासन की अनुमति अनिवार्य है।
निकाय की NOC: स्थानीय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होता है कि डंपिंग से जल स्रोत या आबादी को खतरा तो नहीं।
बड़ा सवाल: अगर कुटेला में महीनों से फ्लाई ऐश डाली जा रही है, तो क्या इन विभागों ने अपनी आंखें मूंद रखी थीं? बिना सरकारी कागजों और अनुमति के किसी कंपनी की फ्लाई ऐश वहाँ कैसे पहुँच रही है?
साजिश या सच? जिंदल बनाम रसूखदार
जिंदल स्टील ने सुनील यादव, हरिकांत निराला और सूरज अग्रवाल समेत 9 लोगों पर अवैध उत्खनन और डंपिंग का आरोप लगाया है।
यहाँ दो बड़ी संभावनाएं हैं:
यदि जिंदल के आरोप सही हैं: तो इतनी बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश का परिवहन और डंपिंग बिना ‘ऊपर’ की सेटिंग के मुमकिन नहीं है। क्या पटवारी और स्थानीय राजस्व अमले को इसकी भनक नहीं थी?
यदि डंपिंग करने वालों के पास अनुमति है: तो सवाल यह है कि जिंदल की निजी जमीन पर प्रशासन ने किसी और को डंपिंग की अनुमति कैसे दे दी? क्या यह जमीन हड़पने की कोई बड़ी साजिश है?
पटवारी और बड़े अफसरों की भूमिका संदिग्ध
किसी भी क्षेत्र में जमीन पर क्या चल रहा है, इसकी पहली जिम्मेदारी क्षेत्रीय पटवारी की होती है। महीनों से चल रहे उत्खनन और भारी वाहनों की आवाजाही को पटवारी द्वारा रिपोर्ट न करना उनकी संलिप्तता की ओर इशारा करता है। साथ ही, जिला प्रशासन और खनिज विभाग की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है।
किसकी है जिम्मेदारी?
यह मामला सीधे तौर पर खनिज विभाग, पर्यावरण संरक्षण मंडल और राजस्व विभाग की मिलीभगत को दर्शाता है। अगर यह फ्लाई ऐश अवैध है, तो उस बिजली संयंत्र (Power Plant) पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जिसकी यह राखड़ है, क्योंकि नियमानुसार राखड़ का सुरक्षित निपटान (Safe Disposal) सुनिश्चित करना संयंत्र की जिम्मेदारी है।
बहरहाल यह केवल एक जमीन का विवाद नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ खिलवाड़ और सरकारी तंत्र का दुरुपयोग है। क्या कलेक्टर महोदया इस ‘सिंडिकेट’ को तोड़ पाएंगी? क्या उन अधिकारियों पर गाज गिरेगी जिन्होंने अपनी फाइलों में ‘सब ठीक है’ लिखकर इन अवैध गतिविधियों को संरक्षण दिया?