जहाँ जिला पंचायत में भाजपा को पूर्ण बहुमत करीब 3/4 प्राप्त हों, वहीं यदि महिला जनप्रतिनिधियों को अपमानित किया जाए, उनकी आवाज दबाई जाए, धमकी भरी भाषा का प्रयोग किया जाए, तो फिर जनता के मन मे एक स्वाभाविक प्रश्न उठता हैं की नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल संसद का नारा था या जमीन पर उसका कोई मूल्य भी है?
महिलाओं के सम्मान की सांसद से लेकर बंगाल के चुनावी मंचों तक भाजपा के बड़े नेता डिंडोरा पिट रहे थे , लेकिन यदि जिला पंचायत में महिला प्रतिनिधियों को ही सम्मान न मिले, तो यह नारों और नीयत के बीच का अंतर उजागर करता है। कानून बनाना आसान है, संस्कार बनाना कठिन।
छत्तीसगढ़ में पंचायतों में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण है। यह व्यवस्था महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में सहभागी बनाने के लिए है, न कि उन्हें कुर्सियों के सामने मौन दर्शक बनाने के लिए। यदि महिला सदस्य बोलें और उन्हें चुप कराया जाए, तो यह केवल व्यक्ति का अपमान नहीं, संविधान की भावना का अपमान है।
भाजपा को तय करना होगा कि उसका तीसरा इंजन विकास का प्रतीक है या दबंगई का। यदि स्थानीय नेतृत्व ही महिला सम्मान की मर्यादा न निभा सके, तो बड़े-बड़े राष्ट्रीय अभियान केवल पोस्टर बनकर रह जाते हैं।
आज जांजगीर-चांपा पूछ रहा है—क्या तीसरे इंजन के लोको पायलट भाजपा की वास्तविक दशा दिखा रहे हैं, जहाँ नारी शक्ति का सम्मान केवल दिखावटी हैँ, भीतर ख़ाने सत्ता के नशे में संवैधानिक गरिमा औऱ नैतिकता कुचली जाती है?
यदि यही सच हैँ, तो भारतीय जनता पार्टी जो एक अनुशासित पार्टी कहलाती है, भीतर ख़ाने नैतिक रूप से दरक चूकि हैँ !
औऱ यदि कोई पदाधिकारी पार्टी लाईन का अनुशासन तोड़ कर महिला पदाधिकारी का अपमान कर रहा हैँ तो पार्टी को नैतिकता का उच्च माप दंड स्थापित कर दिखाना होगा ,
आने वाला समय ही बताएगा की भाजपा संगठन किस तरह इस मुद्दे को देखता हैँ,औऱ क्या कार्यवाही करता हैँ?