जांजगीर-चांपा जिले ने आखिरकार वह कर दिखाया, जो हर जिला नहीं कर पाता। छत्तीसगढ़ बोर्ड परीक्षा परिणाम 2026 में जिला पूरे सम्मान के साथ निचले पायदानों में अपना झंडा गाड़ चुका है। हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी दोनों में ऐसा प्रदर्शन कि बाकी जिले भी सोच रहे होंगे—इतनी निरंतर मेहनत आखिर कैसे की जाती है!
सबसे पहले हार्दिक बधाई जिले के जिम्मेदार अधिकारियों को, जिनके कुशल मार्गदर्शन, दूरदर्शिता और फाइलों में तेज गति से चल रहे विकास कार्यों ने जिले को यह गौरव दिलाया। जिला कलेक्टर महोदय और शिक्षा विभाग के अफसरों ने सिद्ध कर दिया कि बैठकें चाहे जितनी हो जाएं, रिजल्ट नीचे ही रहना चाहिए—तभी प्रशासनिक परंपरा बनी रहती है।
विशेष बधाई जिला शिक्षा अधिकारी महोदय को, जिनकी निगरानी इतनी मजबूत रही कि जिले के बच्चे सीधे निचले क्रमांक तक पहुंच गए। ऐसी रणनीति हर किसी के बस की बात नहीं। ऊपर जाने के लिए तो मेहनत लगती है, नीचे गिरने के लिए व्यवस्था चाहिए।
अब आते हैं शिक्षक नेताओं पर। ये वही योद्धा हैं जो वेतन वृद्धि, महंगाई भत्ता, पदोन्नति, स्थानांतरण और छुट्टियों के मुद्दे पर बिजली की गति से सक्रिय हो जाते हैं। यदि कहीं ज्ञापन देना हो, धरना करना हो, नारे लगाने हों, प्रेस नोट जारी करना हो—तो इनकी ऊर्जा देखने लायक होती है। पर शिक्षा स्तर गिर जाए, बच्चे पिछड़ जाएं, जिले का नाम डूब जाए—तो इस विषय पर इनकी चुप्पी तपस्वियों जैसी हो जाती है।
मेरा विनम्र सुझाव है कि अब एक नया आंदोलन शुरू किया जाए—
“जिले को नीचे से नंबर वन बनाने वाले योद्धाओं का सम्मान समारोह।”
माल्यार्पण हो, शॉल ओढ़ाई जाए, और मंच से घोषणा हो कि अगले वर्ष हमारा लक्ष्य अंतिम स्थान प्राप्त करना है। जब आधे-अधूरे काम में इतना शानदार परिणाम है, तो पूरी ताकत लगाने पर कमाल हो सकता है।
एक और अद्भुत रहस्य यह है कि नियम कहता है शासकीय सेवक पदस्थापना स्थल पर निवास करें। पर हमारे जिले में यह नियम शायद प्रेरणादायक साहित्य की श्रेणी में रखा गया है—पढ़ने के लिए अच्छा, पालन के लिए नहीं। शिक्षक शहर में रहेंगे, स्कूल गांव में होगा, और उपस्थिति भगवान भरोसे चलेगी। फिर रिजल्ट भी वहीं जाएगा, जहां जाना चाहिए।
सुबह स्कूल पहुंचने से पहले कुछ शिक्षक सामाजिक कार्यक्रमों, कुछ राजनीतिक चर्चाओं, कुछ निजी कारोबार और कुछ मोबाइल विश्वविद्यालय में व्यस्त मिल जाते हैं। पढ़ाई यदि बची हुई ऊर्जा से होगी, तो परिणाम भी बची हुई प्रतिष्ठा जैसा ही आएगा।
अब जब सर्वोच्च न्यायालय शिक्षकों की योग्यता और TET की बात करता है, तो कुछ संगठनों को तकलीफ होने लगती है। मानो बच्चों की पढ़ाई नहीं, केवल सुविधाओं का अधिकार ही सर्वोच्च सत्य हो।
जांजगीर-चांपा के नागरिकों को गर्व होना चाहिए। जिले ने सिद्ध कर दिया कि यदि अधिकारी गंभीर न हों, शिक्षक नेता सुविधाओं में व्यस्त हों, नियम कागज पर हों और जवाबदेही शून्य हो—तो पीछे से टॉप करना बिल्कुल संभव है।
अंत में पुनः बधाई।
अगले वर्ष लक्ष्य स्पष्ट रहे—
“नीचे से पहला स्थान, और ऊपर वालों को संघर्ष का संदेश!”






