डमरुआ न्यूज ।।खनन और क्रेशर विस्तार को लेकर बोंदा और कटंगपाली क्षेत्र में प्रस्तावित जनसुनवाई से पहले ही कई अहम सवाल खड़े हो गए हैं। एक ओर प्रशासन मुनादी और पंचायत स्तर पर सूचना देने का दावा कर रहा है, तो दूसरी ओर स्थानीय लोगों के बीच अब भी जरूरी जानकारियों की कमी देखने को मिल रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जनसुनवाई पूरी तरह नियमों के अनुरूप हो रही है या प्रक्रिया कहीं अधूरी रह गई है।
बोंदा और कटंगपाली के गांवों में जनसुनवाई की तारीख को लेकर मुनादी कराई जा रही है और पंचायतों को भी सूचित किया गया है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह बताती है कि अधिकतर लोगों को केवल तारीख और स्थान की जानकारी है, जबकि परियोजना के वास्तविक प्रभावों को लेकर स्पष्ट जानकारी का अभाव है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें यह नहीं बताया गया कि चूना पत्थर खदान और क्रेशर विस्तार से उनके स्वास्थ्य, जल स्रोत और खेती पर क्या असर पड़ेगा।
जनसुनवाई की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट होती है। इसी रिपोर्ट के आधार पर यह तय होता है कि परियोजना का पर्यावरण और स्थानीय जीवन पर कितना प्रभाव पड़ेगा। लेकिन क्षेत्र में कई लोगों का कहना है कि उन्होंने यह रिपोर्ट कभी देखी ही नहीं और उन्हें यह भी नहीं बताया गया कि यह रिपोर्ट कहां उपलब्ध है।
नियमों के अनुसार, जनसुनवाई से पहले EIA रिपोर्ट को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना अनिवार्य होता है ताकि लोग उसे पढ़कर अपनी आपत्ति या सहमति दर्ज कर सकें। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि जनता को पूरी जानकारी ही नहीं मिलती, तो उनकी भागीदारी भी प्रभावित होती है और पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
इसके अलावा समय को लेकर भी चर्चा हो रही है। जनसुनवाई की तारीख नजदीक होने के कारण लोगों को पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है कि वे परियोजना को समझ सकें और अपनी बात प्रभावी तरीके से रख सकें। ऐसी स्थिति में यह आशंका भी जताई जा रही है कि प्रक्रिया जल्दबाजी में पूरी की जा रही है।
जनसुनवाई का उद्देश्य केवल औपचारिकता पूरी करना नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की राय को गंभीरता से सुनना और उसे निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना होता है। लेकिन जब जानकारी अधूरी हो और पारदर्शिता पर सवाल उठें, तो पूरी प्रक्रिया पर संदेह होना स्वाभाविक है।
बोंदा और कटंगपाली क्षेत्र में जनसुनवाई को लेकर स्थिति मिश्रित नजर आ रही है।
जहां एक ओर प्रशासन द्वारा सूचना देने की प्रक्रिया अपनाई गई है, वहीं दूसरी ओर EIA रिपोर्ट की उपलब्धता और जानकारी के अभाव ने पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि
जनसुनवाई की प्रक्रिया शुरू तो हो गई है, लेकिन क्या यह पूरी तरह नियमों के अनुरूप है यह अब भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
बहरहाल जब जनता को पूरी जानकारी ही नहीं मिलेगी, तो उनकी सहमति कितनी प्रभावी और वैध मानी जाएगी?