जांजगीर चांपा : क्षेत्र में पहले से बिगड़ती वायु गुणवत्ता के बीच प्रस्तावित कोयला वॉशरी विस्तार परियोजना को लेकर अब पर्यावरण संरक्षण मंडल और जिला प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। क्षेत्र में PM2.5 का स्तर 38.1 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वार्षिक मानक से करीब 7.6 गुना अधिक बताया जा रहा है। ऐसे हालात में नई कोयला आधारित परियोजना की जनसुनवाई को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ती दिखाई दे रही है।
29 मई 2026 को ग्राम कोटाडबरी में प्रस्तावित जनसुनवाई से पहले यह सवाल उठ रहा है कि आखिर जब चांपा पहले ही प्रदूषण की मार झेल रहा है, तब पर्यावरण संरक्षण मंडल और जिला प्रशासन किस आधार पर कोल वॉशरी विस्तार परियोजना को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि प्रशासन प्रदूषण नियंत्रण के दावे तो करता है, लेकिन जमीनी स्तर पर हवा की गुणवत्ता लगातार खराब होती जा रही है।
परियोजना के तहत 0.96 एमटीपीए कोल साइजिंग एवं स्क्रीनिंग यूनिट को उन्नत कर 0.96 एमटीपीए कोल वॉशरी (वेट टाइप) स्थापित करने और 1.50 लाख टन कोल स्टोरेज क्षमता विकसित करने का प्रस्ताव है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या पर्यावरणीय प्रभावों का वास्तविक आकलन किया गया है, या फिर जनसुनवाई महज औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि पर्यावरण मंडल का काम प्रदूषण रोकना है, लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि उद्योगों के विस्तार को मंजूरी देने में ज्यादा तेजी दिखाई जाती है। वहीं जिला प्रशासन पर भी आरोप लग रहे हैं कि वह जनता की स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं से ज्यादा औद्योगिक हितों को प्राथमिकता दे रहा है।
अब 29 मई की जनसुनवाई को लेकर क्षेत्र में माहौल गर्म है। ग्रामीणों का कहना है कि वे सिर्फ रोजगार के वादों से संतुष्ट नहीं होंगे, बल्कि वायु प्रदूषण, जल उपयोग, राख और कोयला धूल से होने वाले प्रभावों पर जवाब मांगेंगे। जनसुनवाई में प्रशासन और पर्यावरण मंडल को लोगों के तीखे सवालों का सामना करना पड़ सकता है।



























