𝗔𝗗𝗔𝗡𝗜: 2012 की कूलिंग टॉवर त्रासदी की यादें आज भी ताजा, ग्रामीण पूछ रहे—पुराने सवालों का जवाब दिए बिना नए विस्तार की मंजूरी क्यों?
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डमरूआ न्यूज़ /रायगढ़। पुसौर क्षेत्र में अदानी पावर लिमिटेड के प्रस्तावित ताप विद्युत संयंत्र विस्तार की जनसुनवाई अब केवल एक औपचारिक सरकारी प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह पिछले डेढ़ दशक के औद्योगिक विकास, पर्यावरणीय प्रभाव, श्रमिक सुरक्षा, स्थानीय रोजगार, सामाजिक उत्तरदायित्व और जनता के विश्वास की परीक्षा बन चुकी है। कंपनी अपनी पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में देश की बढ़ती बिजली मांग, अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल तकनीक, कम ईंधन खपत और अपेक्षाकृत कम कार्बन उत्सर्जन का दावा कर रही है, जबकि प्रभावित गांवों के लोग सवाल उठा रहे हैं कि पहले से संचालित संयंत्र के कारण वर्षों से उठ रहे प्रदूषण, फ्लाई ऐश, रोजगार, स्वास्थ्य और मुआवजे से जुड़े मुद्दों का समाधान किए बिना नए विस्तार को मंजूरी क्यों दी जाए।
जनसुनवाई से पहले जिला पंचायत सदस्य लक्ष्मी जीवन पटेल सहित अनेक जनप्रतिनिधियों और ग्राम पंचायतों ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर परियोजना विस्तार का विरोध दर्ज कराया है। ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि पिछले 15 वर्षों में स्थानीय युवाओं को अपेक्षित रोजगार नहीं मिला, फ्लाई ऐश और कोयला परिवहन से प्रदूषण बढ़ा, किसानों की जमीन और फसलों को नुकसान हुआ, सीएसआर गतिविधियां अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंचीं तथा प्रभावित गांवों के विकास के संबंध में किए गए अनेक वादे आज भी अधूरे हैं। ज्ञापन में मांग की गई है कि पहले इन शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा कराई जाए और उसके बाद ही विस्तार परियोजना पर निर्णय लिया जाए।
इस पूरे विवाद के बीच एक ऐसी घटना भी बार-बार लोगों की स्मृतियों में लौट रही है, जिसे क्षेत्र आज भी भूल नहीं पाया है। वर्तमान अदानी पावर परियोजना का यह परिसर पहले कोरबा वेस्ट पावर कंपनी लिमिटेड (KWPCL) के नाम से विकसित किया जा रहा था। 21 जुलाई 2012 को बड़े भंडार गांव स्थित निर्माणाधीन संयंत्र के लगभग 170 फीट ऊंचे कूलिंग टॉवर के भीतर सहायक प्लेटफॉर्म गिरने से पांच श्रमिकों की दर्दनाक मृत्यु हो गई थी और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए थे। बाद में इस परियोजना का अधिग्रहण अदानी समूह ने किया। स्थानीय लोगों का कहना है कि वह हादसा आज भी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में गिना जाता है और हर बार विस्तार की चर्चा के साथ वह घटना लोगों के जेहन में फिर ताजा हो जाती है।
दूसरी ओर कंपनी की ईआईए रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रस्तावित विस्तार में अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल तकनीक अपनाई जाएगी, जिससे तापीय दक्षता बढ़ेगी, ईंधन की खपत कम होगी तथा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 15 प्रतिशत तक कमी लाने का प्रयास किया जाएगा। रिपोर्ट में शून्य तरल अपशिष्ट (ZLD), 1440 केएलडी क्षमता का ईटीपी, हरित पट्टी, धूल नियंत्रण, ध्वनि नियंत्रण, पर्यावरण निगरानी और आधुनिक प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों का भी उल्लेख किया गया है।
हालांकि विरोध कर रहे ग्रामीणों का कहना है कि यदि ये सभी उपाय इतने प्रभावी हैं तो वर्षों से प्रदूषण, फ्लाई ऐश, कोयला धूल, किसानों की समस्याएं, स्वास्थ्य संबंधी शिकायतें और स्थानीय असंतोष क्यों बना हुआ है। उनका कहना है कि नए विस्तार से पहले वर्तमान संयंत्र के पर्यावरणीय प्रदर्शन, सुरक्षा व्यवस्था, सामाजिक दायित्व और स्थानीय विकास कार्यों का स्वतंत्र सामाजिक एवं पर्यावरणीय ऑडिट सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
अब पूरे क्षेत्र की निगाहें प्रस्तावित जनसुनवाई पर टिकी हैं। लोगों का कहना है कि यह केवल एक बिजली परियोजना के विस्तार का मामला नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरण, श्रमिक सुरक्षा, स्थानीय रोजगार और जनता के अधिकारों को वास्तव में कितना महत्व दिया जाता है।
2012 की त्रासदी आज भी लोगों की स्मृतियों में जिंदा
जनसुनवाई के विरोध के बीच वर्ष 2012 की कूलिंग टॉवर दुर्घटना एक बार फिर चर्चा में है। उस समय परियोजना कोरबा वेस्ट पावर कंपनी लिमिटेड के नाम से विकसित की जा रही थी और निर्माण कार्य के दौरान सहायक प्लेटफॉर्म गिरने से पांच श्रमिकों की जान चली गई थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि उद्योग केवल उत्पादन क्षमता का नाम नहीं होता, बल्कि उससे जुड़ी श्रमिक सुरक्षा और मानवीय जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। इसलिए वे चाहते हैं कि विस्तार से पहले सुरक्षा व्यवस्था और पूर्व अनुभवों का भी गंभीर मूल्यांकन किया जाए।
ईआईए रिपोर्ट में बड़े दावे, ग्रामीणों के मन में बड़े सवाल
परियोजना की पर्यावरण रिपोर्ट में आधुनिक तकनीक, कम कार्बन उत्सर्जन, शून्य तरल अपशिष्ट, हरित पट्टी, धूल नियंत्रण, पर्यावरण निगरानी और प्रदूषण कम करने के अनेक उपायों का विस्तृत उल्लेख किया गया है। दूसरी ओर ग्रामीणों का कहना है कि यदि ये व्यवस्थाएं व्यवहार में भी उतनी ही प्रभावी हैं तो क्षेत्र में वर्षों से प्रदूषण, फ्लाई ऐश, कोयला धूल, स्वास्थ्य समस्याओं और पर्यावरणीय शिकायतों का सिलसिला आखिर क्यों जारी है। उनका मानना है कि दस्तावेजों के दावों और जमीनी वास्तविकता के बीच की दूरी को जनसुनवाई में स्पष्ट किया जाना चाहिए।
जनसुनवाई अब सिर्फ औपचारिकता नहीं, भरोसे की सबसे बड़ी परीक्षा
स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापनों ने इस जनसुनवाई को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि रोजगार, मुआवजा, सीएसआर, पर्यावरण संरक्षण, किसानों की समस्याएं और प्रदूषण नियंत्रण जैसे पुराने मुद्दों पर ठोस जवाब मिलने के बाद ही किसी नए विस्तार पर जनता का विश्वास बन सकेगा। उनका मानना है कि इस बार की जनसुनवाई केवल 1600 मेगावाट बढ़ाने का निर्णय नहीं, बल्कि पिछले 15 वर्षों के औद्योगिक विकास मॉडल की सार्वजनिक समीक्षा भी होगी।




























