बी.एस. स्पंज की जनसुनवाई से पहले उठे पर्यावरणीय सवाल, 67 लाख लीटर पानी और 12 लाख लीटर अपशिष्ट जल का हिसाब कौन देगा?
28 सितंबर को प्रस्तावित जनसुनवाई से पहले ग्रामीणों का विरोध, पर्यावरण संरक्षण के दावों पर सवाल; उद्योगों के विस्तार के बीच रायगढ़ के पर्यावरण की चिंता करने वाले कथित पहरेदार आखिर कहां हैं?

रायगढ़ में उद्योगों का विस्तार लगातार जारी है। इस्पात संयंत्रों की चिमनियों से लेकर कोयला, राख और औद्योगिक अपशिष्ट तक, जिले की जल, जंगल और जमीन पर बढ़ते दबाव की चर्चा अब किसी से छिपी नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि विकास की इस दौड़ में पर्यावरण की कीमत कौन चुका रहा है? जिन ग्रामीणों की जमीन, पानी, हवा और भविष्य पर औद्योगिक विस्तार का असर पड़ सकता है, उनकी आवाज कितनी सुनी जा रही है? और पर्यावरण संरक्षण का झंडा उठाने वाले लोग आखिर उस समय कहां खड़े हैं, जब रायगढ़ की एक और विशाल औद्योगिक परियोजना जनसुनवाई के दरवाजे पर पहुंच चुकी है?
बी.एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड की नवापारा (टेंडा) एवं चारमार, तहसील घरघोड़ा क्षेत्र में प्रस्तावित इस्पात एवं विद्युत परियोजना की 28 सितंबर 2026 को प्रस्तावित जनसुनवाई ने इन सवालों को और तीखा कर दिया है। उपलब्ध पर्यावरणीय दस्तावेजों में दर्ज आंकड़े परियोजना के विशाल स्वरूप और उसके संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की ओर संकेत करते हैं। वहीं, प्रभावित ग्रामीणों के विरोध की बात सामने आने के बाद यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या जनसुनवाई वास्तव में जनता की आवाज सुनने का मंच बनेगी या फिर विकास के नाम पर एक और औपचारिकता पूरी कर दी जाएगी?
40 मीटर दूर दुकानें, 80 मीटर पर वन क्षेत्र; फिर भी क्या पर्यावरणीय पड़ताल पूरी है?
परियोजना के उपलब्ध पर्यावरण प्रभाव आकलन दस्तावेजों में डंगनीनार ग्राम की कुछ दुकानें संयंत्र स्थल से महज 40 मीटर और वन क्षेत्र लगभग 80 मीटर दूर बताया गया है। चारमार ग्राम की दूरी लगभग 520 मीटर तथा छिनी नाला लगभग 700 मीटर दूर दर्शाया गया है। ये दूरियां किसी सामान्य औद्योगिक विस्तार की नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील स्थल-स्थिति की ओर ध्यान खींचती हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या परियोजना के प्रत्येक प्रस्तावित औद्योगिक घटक से आसपास की वास्तविक आबादी, वन सीमा, जलस्रोत और सामाजिक संस्थानों की दूरी का स्वतंत्र सत्यापन किया गया है? 40 मीटर दूर बताई गई दुकानों के आसपास कितनी आबादी है? कितने घर, विद्यालय, आंगनबाड़ी, धार्मिक स्थल और सार्वजनिक उपयोग के स्थान मौजूद हैं? क्या इन सभी की वास्तविक स्थिति राजस्व अभिलेखों और स्थल निरीक्षण से प्रमाणित है? इन सवालों का जवाब केवल कागज पर दर्ज दूरियों से नहीं मिल सकता। इसके लिए स्वतंत्र भौगोलिक एवं राजस्व सर्वेक्षण जरूरी है। यदि दस्तावेजों में दर्ज दूरियां सही हैं, तो उनकी स्वतंत्र पुष्टि होनी चाहिए। और यदि वास्तविक स्थिति में अंतर है, तो जनता को जनसुनवाई से पहले इसकी जानकारी मिलनी चाहिए।
67 लाख लीटर पानी प्रतिदिन! रायगढ़ के जल संसाधनों पर कितना बढ़ेगा बोझ?
परियोजना के पर्यावरणीय दस्तावेजों के अनुसार प्रस्तावित संयंत्र की कुल जल आवश्यकता 6,716 हजार लीटर प्रतिदिन अर्थात लगभग 67 लाख 16 हजार लीटर प्रतिदिन है। इतनी बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता किसी छोटे औद्योगिक उपक्रम की नहीं, बल्कि व्यापक औद्योगिक गतिविधियों की ओर संकेत करती है। दस्तावेजों में छिनी नाला अथवा संबंधित जलस्रोत से पानी प्राप्त करने का प्रस्ताव और जल संसाधन विभाग से अनुमति की प्रक्रिया का उल्लेख है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जिस क्षेत्र में यह परियोजना स्थापित करने की योजना है, वहां जल संसाधनों की वास्तविक स्थिति क्या है? गर्मी के दिनों में जलस्रोतों में कितना पानी बचता है? आसपास के गांवों, कृषि और ग्रामीण जरूरतों पर प्रस्तावित जल दोहन का क्या प्रभाव पड़ेगा?केवल पानी की उपलब्धता का दावा पर्याप्त नहीं है। जलस्रोत की क्षमता, प्राकृतिक जल प्रवाह, जलग्रहण क्षेत्र और नीचे की ओर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए।रायगढ़ की धरती पर उद्योगों की प्यास लगातार बढ़ रही है। ऐसे में ग्रामीणों के हिस्से का पानी कितना सुरक्षित रहेगा, इसका स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए।
प्रतिदिन 12 लाख लीटर से अधिक अपशिष्ट जल; शून्य तरल अपशिष्ट का दावा कितना प्रभावी?
परियोजना के उपलब्ध दस्तावेजों में प्रतिदिन लगभग 1,228 हजार लीटर अर्थात 12 लाख 28 हजार लीटर अपशिष्ट जल उत्पन्न होने का अनुमान दर्ज है। दस्तावेजों में अपशिष्ट जल उपचार, पुनर्चक्रण और शून्य तरल अपशिष्ट व्यवस्था का उल्लेख भी किया गया है। लेकिन पर्यावरण संरक्षण का असली परीक्षण कागज पर किए गए दावों से नहीं, बल्कि जमीन पर उनके प्रभावी संचालन से होता है। यदि प्रतिदिन इतना बड़ा अपशिष्ट जल उत्पन्न होगा, तो उसके उपचार की वास्तविक क्षमता क्या होगी? संयंत्र की निगरानी कौन करेगा? तकनीकी खराबी या उपचार व्यवस्था बंद होने की स्थिति में क्या प्रबंध रहेगा? क्या इन व्यवस्थाओं की नियमित जांच और निगरानी की जानकारी सार्वजनिक होगी? इन सवालों का जवाब मिलना इसलिए जरूरी है, क्योंकि औद्योगिक अपशिष्ट का अनुचित प्रबंधन केवल जलस्रोतों ही नहीं, बल्कि मिट्टी और आसपास के ग्रामीण जीवन को भी प्रभावित कर सकता है।
धूल, धुआं और शोर रोकने के दावे; निगरानी की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
परियोजना के पर्यावरणीय दस्तावेजों में वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए विद्युतस्थैतिक अवक्षेपित्र, थैलीदार छनन प्रणाली, धूल निष्कर्षण व्यवस्था और अन्य नियंत्रण उपकरणों का उल्लेख है। विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के लिए कणीय पदार्थ उत्सर्जन की सीमा 30 मिलीग्राम प्रति घन मीटर से कम रखने का लक्ष्य भी दर्शाया गया है। दस्तावेजों में ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण के लिए ध्वनि अवरोधक, मशीनों के आसपास नियंत्रण व्यवस्था और हरित पट्टी विकसित करने की योजना का भी उल्लेख है। लेकिन रायगढ़ के लोगों का सवाल यह है कि क्या इन नियंत्रण व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता की स्वतंत्र निगरानी होगी? क्या उत्सर्जन के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएंगे? क्या ग्रामीणों को यह जानकारी मिल सकेगी कि संयंत्र के संचालन के दौरान वायु और ध्वनि प्रदूषण निर्धारित मानकों के भीतर है या नहीं?क्योंकि प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का प्रस्ताव और उनका लगातार प्रभावी संचालन दो अलग-अलग बातें हैं। पर्यावरणीय दावों की जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना केवल तकनीकी शब्दों के सहारे जनता की चिंता दूर नहीं की जा सकती।
35.37 हेक्टेयर जमीन में हरित पट्टी; क्या इतने से पर्यावरणीय दबाव कम हो जाएगा?
परियोजना के दस्तावेजों में कुल 35.37 हेक्टेयर भूमि में से 12.15 हेक्टेयर अर्थात लगभग 34.36 प्रतिशत क्षेत्र में हरित पट्टी विकसित करने का प्रस्ताव है। इसके लिए लगभग 30,500 पौधे लगाने की योजना भी दर्शाई गई है। पर्यावरण संरक्षण के लिए पौधारोपण और हरित पट्टी का विकास महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि प्रस्तावित पौधारोपण का वास्तविक स्थान क्या होगा? पौधों की प्रजातियां कौन-सी होंगी? उनके जीवित रहने और नियमित देखरेख की जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या हरित पट्टी की योजना आसपास मौजूद प्राकृतिक वन क्षेत्र के विकल्प के रूप में प्रस्तुत की जा सकती है? क्या पौधारोपण के आंकड़े औद्योगिक प्रदूषण के संभावित प्रभावों का पूरा जवाब हैं? इन सवालों का उत्तर स्पष्ट होना चाहिए। हरित पट्टी का वास्तविक मूल्य पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके जीवित रहने, विकास और पर्यावरणीय उपयोगिता से तय होगा।
पर्यावरण संरक्षण पर 115.6 करोड़ रुपये का प्रस्ताव; खर्च और परिणाम की जवाबदेही कहां?
उपलब्ध पर्यावरणीय दस्तावेजों में परियोजना के लिए पर्यावरण संरक्षण संबंधी पूंजीगत व्यय लगभग 115.6 करोड़ रुपये तथा वार्षिक पर्यावरण संरक्षण व्यय लगभग 16.56 करोड़ रुपये दर्शाया गया है। यह राशि बताती है कि परियोजना में पर्यावरणीय प्रबंधन के लिए बड़े आर्थिक प्रावधान प्रस्तावित हैं। लेकिन जनहित का सवाल यह है कि इनका उपयोग किन-किन व्यवस्थाओं पर होगा और वास्तविक परिणामों का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाएगा? क्या वायु प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों, अपशिष्ट जल उपचार, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और हरित पट्टी के विकास पर होने वाले खर्च का विवरण सार्वजनिक होगा? क्या पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रस्तावित राशि का उपयोग सुनिश्चित करने के लिए नियमित निरीक्षण और जवाबदेही की व्यवस्था होगी? पर्यावरण संरक्षण के नाम पर बजट का प्रावधान महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि उसका लाभ स्थानीय पर्यावरण और प्रभावित ग्रामीणों तक वास्तविक रूप से पहुंचे।
उद्योगों का विस्तार जारी, पर्यावरण की चिंता करने वाले कथित पहरेदार आखिर कहां हैं?
रायगढ़ की विडंबना यही है कि यहां पर्यावरण संरक्षण की चर्चा भी होती है और औद्योगिक विस्तार भी लगातार जारी रहता है। पर्यावरण प्रेमी होने का तमगा लगाए बैठे कुछ लोगों की भूमिका पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। जनसुनवाई के समय विरोध के स्वर बुलंद करने वाले कथित पर्यावरणीय पहरेदारों की सक्रियता यदि केवल औपचारिक विरोध तक सीमित रह जाए, तो पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? क्या पर्यावरण के नाम पर आवाज उठाने वालों की जिम्मेदारी केवल बयान जारी करने तक है, या उन्हें उन औद्योगिक परियोजनाओं के पर्यावरणीय दावों की भी निष्पक्ष पड़ताल करनी चाहिए, जिनका असर आने वाली पीढ़ियों तक रह सकता है? यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि जिले में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सक्रिय सभी लोगों की भूमिका पर सार्वजनिक बहस के लिए जरूरी है। यदि किसी परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, तो उनका जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए। विरोध करने वालों को भी प्रमाण के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए और समर्थन करने वालों को भी अपने दावों की जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए। पर्यावरण संरक्षण कोई निजी स्वार्थ साधने का मंच नहीं, बल्कि सार्वजनिक जिम्मेदारी है।
प्रभावित ग्रामीणों का विरोध; क्या उनकी आवाज जनसुनवाई तक पहुंच पाएगी?
बी. एस. स्पंज की प्रस्तावित जनसुनवाई से प्रभावित ग्रामीणों के विरोध की बात सामने आ रही है। ग्रामीणों की चिंताओं को देखते हुए यह आवश्यक है कि उन्हें परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों से संबंधित पूरी और सही जानकारी उपलब्ध कराई जाए। यदि ग्रामीण परियोजना का विरोध कर रहे हैं, तो उनके सवालों को गंभीरता से सुनना और उनका तथ्यात्मक जवाब देना प्रशासन तथा संबंधित पर्यावरणीय संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
ग्रामीणों के विरोध को दबाए जाने के आरोप भी सामने आ रहे हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जनसुनवाई में किसी भी प्रभावित व्यक्ति को अपनी बात रखने से रोका न जाए और उसकी आपत्ति को नियमानुसार दर्ज किया जाए। जनसुनवाई का अर्थ केवल लोगों को एकत्र करना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य जनता को जानकारी देना, उनकी चिंताओं को सुनना और उन पर विचार करना है। यदि प्रभावित लोगों की आवाज ही नहीं सुनी गई, तो जनसुनवाई की सार्थकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
28 सितंबर से पहले स्वतंत्र जांच जरूरी; पहले जमीन का सच, फिर जनसुनवाई
परियोजना के आसपास 40 मीटर दूर दुकानों, 80 मीटर दूर वन क्षेत्र और लगभग 700 मीटर दूर छिनी नाला होने के उल्लेख को देखते हुए सबसे पहले वास्तविक स्थल स्थिति का स्वतंत्र सत्यापन होना चाहिए। प्रत्येक प्रस्तावित औद्योगिक घटक की सीमा से 500 मीटर के भीतर आबादी, मकान, दुकानें, विद्यालय, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, धार्मिक स्थल, तालाब, डबरी, कुएं, नाले, प्राकृतिक जल निकासी और वन क्षेत्र का भौगोलिक निर्देशांक आधारित सर्वेक्षण किया जाना चाहिए। इस सर्वेक्षण में राजस्व विभाग, पर्यावरण संरक्षण मंडल, वन विभाग, जल संसाधन विभाग और अन्य संबंधित विभागों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। सर्वेक्षण की रिपोर्ट, नक्शे और तस्वीरें सार्वजनिक किए जाने चाहिए, ताकि प्रभावित ग्रामीण पूरी जानकारी के साथ जनसुनवाई में अपनी बात रख सकें। यदि स्वतंत्र जांच में पर्यावरणीय दस्तावेजों और वास्तविक स्थल स्थिति के बीच कोई महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है, तो उसका सुधार और आवश्यक पूरक पर्यावरणीय मूल्यांकन जनसुनवाई से पहले कराया जाना चाहिए।
रायगढ़ को उद्योग चाहिए, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं
रायगढ़ में उद्योगों से रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि जिले के प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभावों की अनदेखी कर दी जाए। जल, जंगल और जमीन केवल औद्योगिक विकास के साधन नहीं हैं। ये ग्रामीणों के जीवन, कृषि, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़े संसाधन हैं। बी. एस. स्पंज की प्रस्तावित परियोजना के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पर्यावरणीय दावों की स्वतंत्र जांच होगी? क्या प्रभावित ग्रामीणों की आवाज को पूरा सम्मान मिलेगा? क्या परियोजना के संभावित प्रभावों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाएगा? रायगढ़ की धरती पर उद्योगों का विस्तार हो रहा है, लेकिन पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए।
आखिर रायगढ़ की जल, जंगल और जमीन की कीमत पर औद्योगिक विकास की सीमा कौन तय करेगा?
रायगढ़ को उद्योगों की जरूरत हो सकती है, लेकिन रायगढ़ के लोगों को स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी और जीवित जंगलों की जरूरत उससे कहीं अधिक है।






