रायगढ़ में पर्यावरण प्रदूषण के विरोध वाले मुखौटे कहां गायब हो गए?
28 सितंबर की जनसुनवाई से पहले जमीन, जंगल, पानी और आबादी का सच सामने लाने की मांग; दस्तावेजों में 40 मीटर पर दुकानें, 80 मीटर पर वन क्षेत्र और प्रतिदिन 67 लाख लीटर से अधिक पानी की जरूरत
डमरूआ न्यूज़ / रायगढ़। रायगढ़ की पहचान आज उद्योगों के शहर के रूप में जरूर बन चुकी है, लेकिन इसी औद्योगिक विस्तार के साथ जिले की हवा, पानी, जंगल और जमीन पर बढ़ते दबाव का सवाल भी लगातार गहराता जा रहा है। अब नवापारा (टेंडा) एवं चारमार क्षेत्र में प्रस्तावित बी.एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड की विशाल इस्पात एवं विद्युत परियोजना की 28 सितंबर को प्रस्तावित जनसुनवाई ने एक बार फिर जिले के पर्यावरणीय भविष्य को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल केवल एक नए संयंत्र की स्थापना का नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि जिस जिले में पर्यावरण संरक्षण की बातें वर्षों से होती रही हैं, वहां विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का वास्तविक हिसाब आखिर कौन देगा?

उपलब्ध पर्यावरण प्रभाव आकलन दस्तावेजों में परियोजना स्थल से डंगनीनार ग्राम की कुछ दुकानों की दूरी मात्र 0.04 किलोमीटर अर्थात लगभग 40 मीटर तथा वन क्षेत्र की दूरी लगभग 0.08 किलोमीटर अर्थात 80 मीटर बताई गई है। चारमार ग्राम लगभग 0.52 किलोमीटर और छिनी नाला लगभग 0.70 किलोमीटर दूरी पर दर्शाया गया है। इतनी कम दूरी पर आबादी, दुकानें और वन क्षेत्र होने के बावजूद यदि वास्तविक स्थल स्थिति का स्वतंत्र सत्यापन नहीं होता है तो जनसुनवाई में जनता के सामने रखी जाने वाली पर्यावरणीय तस्वीर पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
40 मीटर की दूरी, लेकिन सवाल हजार
सबसे बड़ा सवाल यही है कि परियोजना से महज 40 मीटर दूर बताई गई दुकानों के पीछे वास्तविक बसाहट कितनी दूर तक है? 500 मीटर के दायरे में कितने मकान हैं? कितने परिवार रहते हैं? विद्यालय, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, धार्मिक स्थल, तालाब, कुएं, नाले और प्राकृतिक जल निकासी की वास्तविक स्थिति क्या है? वन क्षेत्र की वास्तविक सीमा कहां तक है? इन सवालों का जवाब कागज पर दर्ज दूरी से नहीं, बल्कि मौके पर स्वतंत्र सर्वेक्षण से मिलना चाहिए। राजस्व अभिलेख, भौगोलिक मानचित्र, वास्तविक स्थल निरीक्षण और भौगोलिक निर्देशांकों के आधार पर यदि पूरी स्थिति सार्वजनिक कर दी जाए तो तस्वीर अपने आप साफ हो जाएगी।
67 लाख लीटर पानी प्रतिदिन, आखिर किसका पानी?
बी.एस. स्पंज परियोजना से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल जल संसाधनों को लेकर भी है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार परियोजना की कुल जल आवश्यकता 6,716 हजार लीटर प्रतिदिन, अर्थात लगभग 67 लाख 16 हजार लीटर प्रतिदिन बताई गई है। पानी छिनी नाला अथवा संबंधित जल स्रोत से लेने का प्रस्ताव है। इतनी बड़ी मात्रा में पानी प्रतिदिन लेने के बाद स्थानीय ग्रामीणों, कृषि भूमि, तालाबों, कुओं और प्राकृतिक जलस्रोतों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? गर्मी के मौसम में जलस्रोत की वास्तविक क्षमता कितनी रहती है? मानसून में प्राकृतिक जल प्रवाह किस दिशा में होता है? क्या परियोजना की भूमि के आसपास कोई प्राकृतिक जल निकासी मार्ग मौजूद है?
इन सवालों का जवाब जनसुनवाई से पहले सामने आना चाहिए, बाद में नहीं, 12 लाख लीटर से अधिक अपशिष्ट जल, कागज पर शून्य तरल अपशिष्ट कितना जमीन पर?
दस्तावेजों में परियोजना से लगभग 1,228 हजार लीटर प्रतिदिन, अर्थात 12 लाख 28 हजार लीटर अपशिष्ट जल उत्पन्न होने का अनुमान दर्ज है। इसके उपचार और पुनः उपयोग के साथ शून्य तरल अपशिष्ट व्यवस्था का उल्लेख भी किया गया है।व्यवस्था कागज पर कितनी सुंदर है, यह अलग विषय है। असली सवाल यह है कि उसका लगातार संचालन कौन और कैसे सुनिश्चित करेगा? निगरानी कितनी प्रभावी होगी? तकनीकी खराबी अथवा आकस्मिक स्थिति में क्या व्यवस्था होगी? क्या इसकी वास्तविक निगरानी और आंकड़े आम जनता के सामने उपलब्ध होंगे?
संयंत्र छोटा नहीं, औद्योगिक गतिविधियों का पूरा जाल
परियोजना में स्पंज आयरन निर्माण भट्टियों, प्रेरण भट्टियों, विद्युत आर्क भट्टियों, रोलिंग मिल, कोयला धुलाई संयंत्र, लौह मिश्रधातु इकाई, सिंटर संयंत्र और बड़े पैमाने पर विद्युत उत्पादन सहित अनेक औद्योगिक इकाइयों का प्रस्ताव है। ऐसे में पर्यावरणीय प्रभाव को केवल मुख्य संयंत्र की चारदीवारी तक सीमित करके देखना पर्याप्त नहीं होगा। कच्चे माल का भंडारण, कोयला प्रबंधन, राख, परिवहन, चिमनियां, अपशिष्ट प्रबंधन और अन्य सहायक गतिविधियां भी परियोजना के वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव का हिस्सा हैं। इसलिए पूरे प्रस्तावित परिसर और प्रत्येक प्रमुख औद्योगिक घटक की स्थिति को एक साथ देखकर आकलन किया जाना जरूरी है।
पर्यावरण के नाम पर दाल-रोटी, लेकिन जमीन पर पर्यावरण कहां?
रायगढ़ में पर्यावरण संरक्षण की चर्चा कोई नई बात नहीं है। यहां पर्यावरण के नाम पर बोलने वाले बुद्धिजीवियों, संगठनों और तथाकथित पर्यावरण प्रेमियों की कमी भी नहीं रही है। लेकिन सवाल यह है कि जब वास्तव में किसी बड़े औद्योगिक विस्तार के सामने जमीन, जंगल, पानी और आबादी के हितों की परीक्षा होती है, तब इनमें से कितनी आवाजें मैदान में दिखाई देती हैं? रायगढ़ के लोगों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पर्यावरण संरक्षण अब केवल विरोध के बयानों और बैठकों तक सीमित रह गया है? बाहर से प्रदूषण का विरोध और भीतर से औद्योगिक हितों के साथ खड़े होने के आरोप यदि लगातार उठ रहे हैं, तो इनका जवाब भी सार्वजनिक रूप से दिया जाना चाहिए।
हर जनसुनवाई के समय कुछ चेहरे विरोध के साथ दिखाई देते रहे हैं। लेकिन इस बार 28 सितंबर की प्रस्तावित जनसुनवाई से पहले वे मुखौटे दिखाई क्यों नहीं दे रहे, जो हर बार पर्यावरण संरक्षण का दावा करते थे? क्या यह महज संयोग है या बदलते औद्योगिक समीकरणों का असर? यह सवाल जनता के बीच चर्चा का विषय बन चुका है।
रायगढ़ को उद्योग चाहिए, लेकिन क्या पर्यावरण की कीमत पर?
रायगढ़ को रोजगार चाहिए। जिले को विकास चाहिए। उद्योग भी चाहिए। लेकिन क्या इसके लिए हवा, पानी, जंगल और जमीन की कीमत चुकाना अनिवार्य है? यही मूल प्रश्न है। किसी परियोजना का विरोध करना विकास विरोधी होना नहीं है और पर्यावरणीय सवाल उठाना उद्योग विरोधी होना नहीं है। वास्तविक सवाल यह है कि उद्योग स्थापित हो, लेकिन उसके पहले यह साबित हो कि स्थानीय पर्यावरण और जनजीवन पर उसकी कीमत कितनी पड़ेगी।
28 सितंबर से पहले सामने आए 500 मीटर का पूरा सच
जनसुनवाई से पहले परियोजना के चारों ओर कम से कम 500 मीटर के दायरे का स्वतंत्र सर्वेक्षण कराया जाना जरूरी है। इसमें आबादी, मकान, दुकानें, विद्यालय, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, पंचायत भवन, धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थल, तालाब, डबरी, कुएं, नाले, प्राकृतिक जल निकासी और वन क्षेत्र को स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाना चाहिए। सर्वेक्षण में दर्ज भौगोलिक निर्देशांक, मानचित्र और स्थल चित्र सार्वजनिक किए जाएं तथा पर्यावरण प्रभाव आकलन में दर्ज दूरियों का स्वतंत्र सत्यापन हो। यदि दस्तावेज और जमीन की वास्तविक स्थिति में कोई महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है तो जनता को उसकी जानकारी दिए बिना जनसुनवाई आगे बढ़ाना गंभीर सवाल पैदा कर सकता है।
सवाल पर्यावरण प्रेमियों से भी है
रायगढ़ की हवा और पानी का सवाल केवल सरकारी विभागों का नहीं है। यह हर नागरिक का सवाल है। इसलिए जो लोग वर्षों से पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई लड़ने का दावा करते रहे हैं, उनसे भी अब जनता जवाब चाहती है—क्या बी.एस. स्पंज की जनसुनवाई में वे खुलकर सवाल उठाएंगे या फिर इस बार भी पर्यावरण की आवाज औपचारिकता की भीड़ में दब जाएगी? 28 सितंबर की जनसुनवाई अब केवल एक औद्योगिक परियोजना की प्रक्रिया नहीं रह गई है। यह रायगढ़ के पर्यावरणीय चरित्र की परीक्षा भी बनती दिखाई दे रही है। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बी.एस. स्पंज कितना उत्पादन करेगा। असली सवाल यह है कि उसके बदले रायगढ़ कितना खोएगा?
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