Damrua

मस्तुरिया के गीत पर मंत्री की आवाज, श्रेय में सत्ता का चेहरा!

 मुख्यमंत्री की पोस्ट में रचनाकार गायब; छत्तीसगढ़ की संस्कृति के नाम पर आखिर किसका प्रचार?

रायपुर। छत्तीसगढ़ की संस्कृति पर गर्व करने वाली सरकार से एक असहज सवाल पूछने का समय है—क्या अब लोक कलाकारों की पहचान भी सत्ता के प्रचार तंत्र में खो जाएगी?

लोक कलाकार लक्ष्मण मस्तुरिया की चर्चित रचना “महानदी के पानी…” से जुड़ा है। यह गीत मंत्री टंकराम वर्मा की आवाज में सोशल मीडिया पर सामने आया। मंत्री का गीत गाना गलत नहीं है। पुरानी लोक रचना को नई आवाज मिलना तो स्वागतयोग्य है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने मंत्री टंकराम वर्मा की इस प्रस्तुति को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से साझा किया। पोस्ट में मंत्री के गायन और छत्तीसगढ़ की समृद्ध संगीत परंपरा की तारीफ की गई, लेकिन लक्ष्मण मस्तुरिया का नाम दिखाई नहीं देता।

गाने वाले का नाम मौजूद, गीत को जन्म देने वाला गायब!

क्या यह महज एक चूक है? अगर है तो इतनी महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रस्तुति में ऐसी चूक क्यों?

सोशल मीडिया की भाषा का असर समझना जरूरी है। “मंत्री ने मस्तुरिया का गीत गाया” और “मंत्री का छत्तीसगढ़ी गीत” — दोनों का अर्थ बिल्कुल अलग है। जब सरकारी प्रचार तंत्र से निकली सामग्री आगे मीडिया और सोशल मीडिया पर पहुंचती है, तो रचनाकार की पहचान पीछे छूट जाती है और वर्तमान चेहरे के हिस्से में पूरा श्रेय चला जाता है।

लक्ष्मण मस्तुरिया कोई गुमनाम नाम नहीं थे। ‘चंदैनी गोंदा’ जैसे सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़े इस लोक कलाकार ने छत्तीसगढ़ी लोकभाषा और लोकजीवन को अपनी रचनाओं में आवाज दी। आज जिस “माटी की सुगंध” और “समृद्ध सांस्कृतिक विरासत” की बात सत्ता के मंचों से होती है, उस विरासत को मजबूत करने वाली पीढ़ी में मस्तुरिया जैसे कलाकारों का योगदान रहा है।

तो फिर मुख्यमंत्री की पोस्ट में एक पंक्ति क्यों नहीं लिखी गई—

“जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया की रचना, मंत्री टंकराम वर्मा की आवाज में।”

इससे मंत्री की प्रतिष्ठा कम नहीं होती। उलटे, उनकी संवेदनशीलता और सरकार की सांस्कृतिक समझ और बड़ी दिखाई देती।

मंत्री ने गाया—तालियां मिलीं।

मुख्यमंत्री ने पोस्ट किया—प्रचार मिला।

मीडिया ने खबर बनाई—मंत्री का नाम चमका।

लेकिन जिस गीत को जन्म देने वाले लक्ष्मण मस्तुरिया थे, उनका नाम कहानी से गायब हो गया।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति सत्ता की जागीर नहीं, लोक कलाकारों की विरासत है।

सरकार छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को संरक्षित करने की बात करती है।लक्ष्मण मस्तुरिया आज हमारे बीच नहीं हैं। उनके पास अपना नाम प्रचारित करने का कोई राजनीतिक मंच, सरकारी तंत्र या सोशल मीडिया टीम नहीं है।उनके पास केवल उनकी रचनाएं हैं। और अगर उन्हीं रचनाओं पर सत्ता की आवाज गूंजे, लेकिन रचनाकार का नाम खामोश रहे—तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

 

 

 

Facebook
WhatsApp
Twitter
Telegram
[metaslider id="1064"]