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BS स्पंज @ प्रदूषण के दबाव में कराहते जिले में विशाल औद्योगिक परियोजना की जनसुनवाई की कलाबाजी

पहले से औद्योगिक प्रदूषण का दंश झेल रहे जिले में बी. एस. स्पंज की नई विशाल परियोजना, विकास के साथ हवा-पानी और पर्यावरण की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

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डमरूआ न्यूज़ /रायगढ़। औद्योगिक विकास की चमक में रायगढ़ की हवा, पानी और जमीन पर लगातार बढ़ते दबाव के बीच अब एक और विशाल औद्योगिक परियोजना ने पर्यावरणीय बहस को तेज कर दिया है। बी. एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा नवापारा, टेंडा एवं चारमार क्षेत्र में प्रस्तावित स्टील एवं पावर परियोजना की पर्यावरणीय जनसुनवाई से पहले सामने आए कार्यकारी सार के आंकड़े कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। करीब 1,755 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत, लगभग 35.37 हेक्टेयर भूमि, अनेक भारी औद्योगिक इकाइयों और बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता वाली इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ा सवाल केवल उद्योग लगने का नहीं है, बल्कि यह है कि पहले से औद्योगिक गतिविधियों का भारी दबाव झेल रहे रायगढ़ की हवा, पानी और पर्यावरण आखिर और कितना भार सहने की स्थिति में है।
परियोजना दस्तावेज के अनुसार प्रस्तावित संयंत्र के संचालन के लिए प्रतिदिन कुल 6,716 KLD अर्थात लगभग 67 लाख 16 हजार लीटर पानी की आवश्यकता होगी। यह पानी केवल एक इकाई के लिए नहीं बल्कि पेलेट प्लांट, प्रोसेस एयर प्लांट, डीआरआई फिल्म, इंडक्शन फर्नेस, रोलिंग मिल, कोल वॉशरी यूनिट, फेरो एलॉय यूनिट, पावर प्लांट तथा अन्य औद्योगिक प्रक्रियाओं में उपयोग किया जाना प्रस्तावित है। दस्तावेज के अनुसार पावर प्लांट की पानी की आवश्यकता ही 2,400 KLD बताई गई है, जिसमें कूलिंग टावर मेकअप, बॉयलर मेकअप और डीएम प्लांट रीजेनरेशन शामिल हैं। सवाल यह है कि जिस जिले में गर्मी के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में जलस्रोतों पर दबाव बढ़ने की शिकायतें सामने आती रही हैं, वहां प्रतिदिन करोड़ों लीटर के बराबर औद्योगिक जल उपयोग का दीर्घकालिक प्रभाव आखिर किस स्तर तक अध्ययन किया गया है?
परियोजना के दस्तावेज में पानी की आवश्यकता की पूर्ति के लिए छोटी नाला अथवा खर्रा नाला से पानी लिए जाने तथा जल संसाधन विभाग से जल निकासी की अनुमति प्राप्त करने के लिए आवेदन किए जाने का उल्लेख है। कंपनी ने यह भी कहा है कि पानी की बचत के लिए पावर प्लांट में एयर कूल्ड कंडेंसर लगाए जाएंगे। लेकिन पर्यावरणीय बहस का असली मुद्दा केवल यह नहीं है कि उद्योग पानी कहां से लेगा, बल्कि यह भी है कि जिस जलस्रोत से पानी लिया जाएगा, उसके आसपास रहने वाले ग्रामीणों, किसानों, पशुओं और स्थानीय पारिस्थितिकी पर उसका संचयी प्रभाव कितना होगा।

12.28 लाख लीटर प्रतिदिन अपशिष्ट जल, कंपनी का दावा यह कि बाहर नहीं जाएगा एक बूंद

परियोजना दस्तावेज का एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा है प्रस्तावित उद्योग से प्रतिदिन उत्पन्न होने वाला 1,228 KLD अपशिष्ट जल, अर्थात लगभग 12 लाख 28 हजार लीटर प्रतिदिन। इतनी बड़ी मात्रा में औद्योगिक अपशिष्ट जल का उत्पादन अपने आप में गंभीर पर्यावरणीय विषय है। हालांकि कंपनी ने दस्तावेज में दावा किया है कि डीआरआई फिल्म एवं कोल वॉशरी यूनिट में क्लोज्ड सर्किट कूलिंग सिस्टम अपनाया जाएगा और वहां से कोई अपशिष्ट जल का निर्वहन नहीं होगा। रोलिंग मिल से उत्पन्न अपशिष्ट जल को ऑयल सेपरेटर के माध्यम से उपचारित कर ईटीपी में भेजने, पेलेट प्लांट, इंडक्शन फर्नेस, रोलिंग मिल, फेरो एलॉय तथा पावर प्लांट से उत्पन्न अपशिष्ट जल को उपचार के बाद पुनः उपयोग में लेने की योजना बताई गई है।
कंपनी का दावा है कि कोल गैसीफायर से निकलने वाले एफ्लुएंट का डीआरआई यूनिट में एबीसी बेड में कूलिंग के लिए उपयोग किया जाएगा, पावर प्लांट में एयर कूल्ड कंडेंसर लगने से पानी की खपत में कमी आएगी, आरओ रिजेक्ट का उपयोग विभिन्न औद्योगिक जरूरतों में किया जाएगा और घरेलू अपशिष्ट जल को एसटीपी में उपचारित कर ग्रीनबेल्ट विकास में उपयोग किया जाएगा। परियोजना में जीरो लिक्विड डिस्चार्ज यानी ZLD प्रणाली अपनाने का भी दावा किया गया है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इतने बड़े औद्योगिक परिसर में घोषित जल प्रबंधन प्रणाली चौबीसों घंटे उसी दक्षता के साथ संचालित होगी, जैसी पर्यावरणीय दस्तावेज में दिखाई गई है? यदि किसी तकनीकी खराबी, रखरखाव की कमी या मानवीय लापरवाही से प्रणाली प्रभावित होती है तो आसपास के जलस्रोतों को बचाने की जवाबदेही किसकी होगी?

कागजों में प्रदूषण सीमा के भीतर, लेकिन रायगढ़ का ‘कुल प्रदूषण’ कौन मापेगा?

पर्यावरणीय दस्तावेज में मार्च से मई 2025 के बीच आठ स्थानों पर PM2.5, PM10, SO₂, NOx और CO की बेसलाइन निगरानी किए जाने का उल्लेख किया गया है। प्रस्तावित परियोजना के कारण वायु गुणवत्ता पर होने वाले प्रभाव का अनुमान लगाते हुए दस्तावेज में बताया गया है कि परियोजना के संचालन के दौरान अनुमानित प्रदूषक सांद्रता राष्ट्रीय परिवेशीय वायु गुणवत्ता मानकों के भीतर रहेगी और प्रस्तावित परियोजना के कारण वायु पर्यावरण पर कोई महत्वपूर्ण प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
लेकिन यहीं से रायगढ़ के पर्यावरण का सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है। किसी एक परियोजना के प्रदूषण को मानक के भीतर बताना और पूरे औद्योगिक जिले की संचयी प्रदूषण स्थिति को समझना दो अलग बातें हैं। रायगढ़ में पहले से अनेक औद्योगिक इकाइयां संचालित हैं। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि क्या पर्यावरणीय आकलन में केवल प्रस्तावित परियोजना के उत्सर्जन को देखा गया है या जिले में पहले से मौजूद उद्योगों, भारी परिवहन, कोयला गतिविधियों और अन्य औद्योगिक स्रोतों से होने वाले कुल पर्यावरणीय दबाव को भी गंभीरता से शामिल किया गया है? रायगढ़ की समस्या एक चिमनी की नहीं, बल्कि चिमनियों के लगातार बढ़ते जंगल की है।

बेतुके दावे : शोर भी बढ़ेगा, लेकिन दावा—मानकों के भीतर रहेगा

परियोजना में डीजी सेट, ब्लोअर, कंप्रेसर, डीआरआई यूनिट, इंडक्शन फर्नेस और अन्य भारी मशीनरी का उपयोग प्रस्तावित है। दस्तावेज में कहा गया है कि शोर नियंत्रण के लिए उपकरणों का चयन और रखरखाव किया जाएगा तथा परियोजना से उत्पन्न शोर निर्धारित मानकों के भीतर रखा जाएगा। इसके बावजूद सवाल उठना स्वाभाविक है कि दिन-रात चलने वाले भारी औद्योगिक संयंत्र के आसपास स्थित ग्रामीण बस्तियों तक शोर और कंपन का वास्तविक प्रभाव कितना पहुंचेगा। दस्तावेज में 12.15 हेक्टेयर क्षेत्र में ग्रीनबेल्ट विकसित करने की बात कही गई है, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों के सामने यह सवाल हमेशा बना रहता है कि पौधारोपण और ग्रीनबेल्ट का वास्तविक स्वरूप क्या होगा, कितने पौधे जीवित रहेंगे और क्या हरित पट्टी वास्तव में औद्योगिक उत्सर्जन एवं धूल के प्रभाव को कम करने में पर्याप्त साबित होगी?

उद्योग का आकार छोटा नहीं, कई भारी इकाइयों का संयुक्त परिसर

प्रस्तावित परियोजना में केवल एक उत्पादन इकाई नहीं बल्कि बड़े औद्योगिक ढांचे का प्रावधान है। दस्तावेज में डीआरआई फर्नेस, इंडक्शन फर्नेस, इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस, रोलिंग मिल, कोल गैसीफायर, कोल वॉशरी, फेरो एलॉय यूनिट और पावर प्लांट सहित अनेक इकाइयों का उल्लेख है। डीआरआई उत्पादन, स्टील निर्माण और रोलिंग मिल की उत्पादन क्षमता लाखों टन प्रतिवर्ष के स्तर पर प्रस्तावित है। कोल वॉशरी की क्षमता भी 22.50 लाख टन प्रतिवर्ष तक बताई गई है। इतनी विशाल औद्योगिक गतिविधि के साथ कच्चे माल का परिवहन, तैयार उत्पादों की ढुलाई, कोयले और लौह अयस्क का आवागमन तथा भारी वाहनों की संख्या में वृद्धि स्वाभाविक है। दस्तावेज में परियोजना के आसपास सड़क संपर्क उपलब्ध होने का उल्लेख जरूर है, लेकिन ग्रामीण सड़कों, स्थानीय यातायात, सड़क किनारे धूल और दुर्घटनाओं के जोखिम पर इस अतिरिक्त औद्योगिक परिवहन का वास्तविक असर जनसुनवाई में गंभीर चर्चा का विषय होना चाहिए।

67 लाख लीटर पानी इस उद्योग को, तो गांवों के जलस्रोतों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?

बी. एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड की प्रस्तावित परियोजना में प्रतिदिन 6,716 KLD पानी की आवश्यकता बताई गई है। यह मात्रा अपने आप में इतनी बड़ी है कि इसके स्रोत और दीर्घकालिक प्रभाव पर सार्वजनिक चर्चा आवश्यक हो जाती है। कंपनी ने जल संरक्षण के लिए एयर कूल्ड कंडेंसर सहित विभिन्न उपाय प्रस्तावित किए हैं, लेकिन स्थानीय जनता को यह जानने का अधिकार है कि जल निकासी के बाद नालों और स्थानीय जलस्रोतों में कितना प्रवाह शेष रहेगा, गर्मी के मौसम में जल उपलब्धता की स्थिति क्या होगी और यदि भविष्य में औद्योगिक विस्तार बढ़ता है तो जल संकट का जोखिम किस स्तर तक पहुंच सकता है।

1,228 KLD गंदा पानी—ZLD का दावा, लेकिन निगरानी कौन करेगा?

कंपनी ने जीरो लिक्विड डिस्चार्ज प्रणाली अपनाने और अधिकांश अपशिष्ट जल को उपचारित कर पुनः उपयोग करने की योजना प्रस्तुत की है। यह पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण दावा है, लेकिन केवल तकनीक का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि उपचार संयंत्रों की वास्तविक क्षमता, उनके निरंतर संचालन और किसी खराबी की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था की स्वतंत्र निगरानी हो। जनता यह जानना चाहती है कि क्या ईटीपी और एसटीपी के आउटलेट की ऑनलाइन मॉनिटरिंग होगी और क्या उसके आंकड़े सार्वजनिक किए जाएंगे?

‘प्रदूषण नहीं बढ़ेगा’ के दावे पर जनता का सवाल—रायगढ़ का कुल हिसाब कहां है?

दस्तावेज में प्रस्तावित परियोजना के संचालन के बाद वायु प्रदूषकों की सांद्रता राष्ट्रीय मानकों के भीतर रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है। लेकिन रायगढ़ जैसे औद्योगिक जिले में सवाल केवल एक नई परियोजना का नहीं है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि जिले में पहले से मौजूद उद्योगों के साथ इस नई परियोजना के जुड़ने पर कुल PM2.5, PM10, SO₂ और NOx का संचयी प्रभाव क्या होगा। क्या रायगढ़ की हवा को टुकड़ों में बांटकर हर परियोजना अलग-अलग ‘मानकों के भीतर’ घोषित की जाएगी या पूरे जिले की सांसों का एक साथ हिसाब भी होगा?

जनसुनवाई में सिर्फ तालियां नहीं, तीखे सवाल जरूरी

प्रस्तावित परियोजना रोजगार और औद्योगिक निवेश के अवसर पैदा कर सकती है। विकास की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन विकास का अधिकार केवल उद्योगों का नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा और सुरक्षित पानी का अधिकार स्थानीय जनता का भी है। पर्यावरणीय जनसुनवाई का वास्तविक उद्देश्य यही है कि प्रभावित और संभावित रूप से प्रभावित लोग अपने सवाल सीधे परियोजना प्रबंधन और प्रशासन के सामने रख सकें। इसलिए जनसुनवाई में यह पूछा जाना चाहिए कि प्रतिदिन 67.16 लाख लीटर पानी की आवश्यकता का स्थानीय जल व्यवस्था पर क्या प्रभाव होगा, 12.28 लाख लीटर प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट जल का वास्तविक प्रबंधन कैसे सुनिश्चित किया जाएगा, प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों की स्वतंत्र निगरानी कौन करेगा, भारी वाहनों के बढ़ते दबाव से गांवों की सड़कों और लोगों की सुरक्षा कैसे होगी तथा यदि भविष्य में पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन होता है तो स्थानीय लोगों को तत्काल शिकायत और कार्रवाई की कौन सी व्यवस्था उपलब्ध होगी।

रायगढ़ को निवेश चाहिए, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं

रायगढ़ को उद्योगों की जरूरत है, रोजगार की जरूरत है और आर्थिक विकास की भी जरूरत है। लेकिन रायगढ़ को ऐसी विकास नीति की जरूरत है जिसमें हर नई परियोजना से पहले यह सवाल पूछा जाए कि इस जिले की पर्यावरणीय क्षमता आखिर कितनी बची है? किसी कंपनी के लिए 1,755 करोड़ रुपये का निवेश आर्थिक उपलब्धि हो सकता है, लेकिन रायगढ़ के नागरिकों के लिए हवा और पानी का मूल्य किसी निवेश राशि से कम नहीं है। बी. एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड की प्रस्तावित परियोजना के दस्तावेज में जल संरक्षण, अपशिष्ट जल उपचार, वायु प्रदूषण नियंत्रण, शोर नियंत्रण और ग्रीनबेल्ट विकास के अनेक उपाय प्रस्तावित किए गए हैं। अब असली परीक्षा इन वादों की जमीन पर होगी। क्योंकि पर्यावरणीय दस्तावेज में लिखा हर आश्वासन तभी सार्थक है, जब वह प्लांट शुरू होने के बाद भी उसी कठोरता से लागू हो और उसकी निगरानी केवल विभागीय फाइलों में नहीं बल्कि सार्वजनिक रूप से हो।

आखिर रायगढ़ की सांसों का हिसाब कौन रखेगा?

रायगढ़ के सामने अब सवाल उद्योग लगाने या न लगाने का भर नहीं है। सवाल यह है कि विकास की दिशा क्या होगी और उसकी कीमत कौन चुकाएगा? यदि उद्योग मुनाफा कमाएंगे, उत्पादन बढ़ेगा और निवेश आएगा, लेकिन बदले में स्थानीय लोगों को प्रदूषित हवा, दबावग्रस्त जलस्रोत और पर्यावरणीय जोखिम मिलेगा, तो विकास का संतुलन अधूरा रहेगा। जनसुनवाई में अब सिर्फ परियोजना की खूबियां सुनने का समय नहीं है। यह पूछने का समय है कि रायगढ़ की हवा में और कितना धुआं समाएगा, पानी पर और कितना औद्योगिक कब्जा होगा और पर्यावरणीय सुरक्षा के दावे कितने वर्षों तक जमीन पर कायम रहेंगे।
रायगढ़ की जनता को उद्योगों के खिलाफ नहीं, बल्कि प्रदूषण के खिलाफ खड़ा होना होगा। विकास का स्वागत हो, लेकिन बिना जवाबदेही के नहीं। उद्योग लगें, लेकिन रायगढ़ की सांसों को गिरवी रखकर नहीं। क्योंकि 1,755 करोड़ रुपये की परियोजना का आंकड़ा बड़ा जरूर है, मगर रायगढ़ की हवा, पानी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य उससे कहीं ज्यादा बड़ा है।अब जनसुनवाई में सवाल सिर्फ इतना होना चाहिए कि क्या रायगढ़ के पास एक और विशाल उद्योग का पर्यावरणीय बोझ उठाने की क्षमता सचमुच बची है, या फिर विकास के नाम पर हम धीरे-धीरे अपने ही जिले की सांसें कम कर रहे हैं?

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