जनता पूछ रही: पहले पुराना हिसाब या पहले नया विस्तार?
जांजगीर-चांपा। एक तरफ उद्योग पर 85.74 लाख रुपये जलकर बकाया होने का सरकारी पत्र सामने आया है, दूसरी तरफ वही उद्योग अपनी कोल वॉशरी का विस्तार कर 88 KLD से 498 KLD प्रतिदिन पानी उपयोग करने की तैयारी में है। जनसुनवाई से पहले यह मामला पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है।

EIA रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान में उद्योग को 88 KLD पानी की आवश्यकता है। लेकिन प्रस्तावित विस्तार के बाद यही आवश्यकता बढ़कर 498 KLD हो जाएगी। यानी प्रतिदिन 4,98,000 लीटर पानी। यह वर्तमान जल उपयोग से लगभग 466 प्रतिशत अधिक है।
अब सवाल यह है कि जब 88 KLD के दौर में ही 85.74 लाख रुपये का बकाया खड़ा हो गया, तो 498 KLD के दौर में क्या होगा?
पानी का बिल बकाया, फिर भी पानी और चाहिए?
जल संसाधन विभाग का पत्र बताता है कि उद्योग पर लाखों रुपये की देनदारी लंबित है। ऐसे में ग्रामीण पूछ रहे हैं कि क्या विस्तार से पहले बकाया राशि की वसूली नहीं होनी चाहिए?
लोगों का कहना है कि यदि कोई आम किसान या नागरिक सरकारी देनदारी जमा न करे तो कार्रवाई होती है, फिर उद्योगों के मामले में अलग नियम क्यों दिखाई देते हैं?
पांच लाख लीटर प्रतिदिन किस कीमत पर?
498 KLD का अर्थ है प्रतिदिन लगभग 5 लाख लीटर पानी।
यह वही इलाका है जहाँ गर्मियों में जलाशयों का स्तर घटने, भूजल नीचे जाने और पेयजल संकट की आशंकाएँ समय-समय पर उठती रही हैं। ऐसे में सवाल केवल उद्योग का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जल अधिकार का भी है।
जनसुनवाई में गूंज सकता है यह सवाल
“क्या पहले 85.74 लाख रुपये का बकाया चुकाया जाएगा या पहले 498 KLD पानी की नई मांग मंजूर होगी?”
जनता जानना चाहती है
– 85.74 लाख रुपये का बकाया आखिर कब जमा होगा?
– 498 KLD पानी का स्थायी स्रोत क्या है?
– जल संकट की स्थिति में प्राथमिकता उद्योग को मिलेगी या जनता को?
– क्या क्षेत्र के किसानों और ग्रामीणों की जल सुरक्षा पर स्वतंत्र अध्ययन हुआ है?
– क्या विस्तार की मंजूरी से पहले जलकर बकाया की समीक्षा की जाएगी?
जनसुनवाई से पहले अब बहस केवल उद्योग विस्तार की नहीं, बल्कि “पानी किसका और प्राथमिकता किसे?” इस मूल प्रश्न पर आकर टिक गई है। क्योंकि उद्योग का विस्तार कुछ वर्षों का विषय हो सकता है, लेकिन जल संसाधनों पर उसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक महसूस किया जा सकता है।



























