बलौदा, जांजगीर-चांपा। प्रस्तावित औद्योगिक विस्तार परियोजना के लिए ठाड़गबहारा जलाशय को जल स्रोत के रूप में दर्शाए जाने के बाद स्थानीय स्तर पर कई गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। ग्रामीणों और नागरिक संगठनों का कहना है कि जलाशय मूल रूप से सिंचाई और स्थानीय जल आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ है, ऐसे में उद्योग को दी जाने वाली जल आपूर्ति के दीर्घकालिक प्रभावों का स्पष्ट आकलन सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

परियोजना दस्तावेजों के अनुसार विस्तार के बाद कुल जल आवश्यकता 498 KLD होगी तथा जल की व्यवस्था भूजल एवं ठाड़गबहारा जलाशय से की जानी प्रस्तावित है। वहीं जल आवंटन हेतु किया गया आवेदन WA00586 अभी स्वीकृति प्रक्रिया में लंबित बताया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि जलाशय के कुछ हिस्सों की प्रतिवर्ष कृषि उपयोग हेतु नीलामी होती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वर्ष के विभिन्न मौसमों में जल उपलब्धता में उतार-चढ़ाव आता है। स्थानीय स्तर पर यह भी दावा किया जा रहा है कि वर्तमान में जलाशय में सीमित जल भंडारण उपलब्ध है।
इस बीच एक नया प्रश्न भी सामने आया है। नागरिकों का कहना है कि उद्योग को जल आपूर्ति वर्षभर निरंतर जारी रहेगी, चाहे वह वर्षा ऋतु हो, ठंड का मौसम हो या गर्मी का समय। ऐसे में यदि गर्मी के दिनों में जलाशय का जलस्तर अत्यधिक घट जाता है और आसपास के क्षेत्रों का भूजल स्तर भी नीचे चला जाता है, तो स्थानीय आबादी, किसानों तथा पशुधन की जल आवश्यकताओं के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था की गई है?
ग्रामीणों ने मांग की है कि जनसुनवाई में निम्न बिंदुओं पर स्पष्ट जवाब दिया जाए:
सूखे या अल्पवर्षा की स्थिति में जल आवंटन की प्राथमिकता क्या होगी?
उद्योग, सिंचाई और पेयजल के बीच जल वितरण का आधार क्या है?
जलाशय के न्यूनतम जलस्तर पर पहुँचने की स्थिति में स्थानीय जनजीवन के लिए क्या आकस्मिक (Contingency) योजना तैयार की गई है?
भूजल स्तर में गिरावट की स्थिति में प्रभावित गांवों के लिए वैकल्पिक पेयजल स्रोत कौन से होंगे?
स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास और उद्योग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जल सुरक्षा, सिंचाई और ग्रामीण जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का समुचित आकलन और सार्वजनिक खुलासा भी उतना ही आवश्यक है। जनसुनवाई में इन सवालों के उत्तर पर क्षेत्रवासियों की नजर रहेगी।



























