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चाम्पा : अधेड हों चूकि भाजपा पर सत्ता की खुमारी दिखने लगी

‎भारत में एक सशक्त लोकतांत्रिक परंपरा रही है—15 अगस्त और 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के सर्वोच्च पद से देश को संदेश दिया जाता है। यह संदेश केवल औपचारिक शब्द नहीं होते, बल्कि राष्ट्र के चरित्र, अनुशासन और मूल्यों की याद दिलाते हैं। वे हमें बताते हैं कि आदर्श केवल मंच से बोलने के लिए नहीं, बल्कि आचरण में उतारने के लिए होते हैं।

इसी दृष्टि से हम चाम्पा में 4 अप्रैल और 6 अप्रैल को साथ रखकर देखें, तो एक गहरी विडंबना सामने आती है।

4 अप्रैल— चाम्पा में स्थानीय स्तर पर सत्ता से जुड़े कुछ लोगों द्वारा पुलिस के साथ विवाद, दबाव और दुर्व्यवहार की खबरें सामने आयी थी |

6 अप्रैल—भारतीय जनता पार्टी अपना स्थापना दिवस मनाती है, और स्वयं को एक अनुशासित, संस्कारवान और राष्ट्रहित में समर्पित संगठन के रूप में प्रस्तुत करती है।

यह केवल दो अलग-अलग दिन नहीं हैं, बल्कि विचार और व्यवहार के बीच खड़े दो आईने हैं।

यदि 6 अप्रैल का दिन आदर्शों का उद्घोष है, तो 4 अप्रैल की घटना उन आदर्शों की पूर्व संध्या पर दिया गया “व्यवहारिक संदेश” बन जाती है। एक संदेश भाषणों से आता है, दूसरा जमीनी हकीकत से—और लोकतंत्र में जनता अक्सर दूसरे को ज्यादा सच्चा मानती है।

चार दशकों से अधिक की यात्रा के बाद, एक राष्ट्रीय दल के रूप में स्थापित हो चुकी भाजपा से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उसके कार्यकर्ताओं में परिपक्वता, संयम और कानून के प्रति सम्मान स्पष्ट रूप से दिखाई दे। संगठन की उम्र और विस्तार जितना बढ़ता है, उसके आचरण की जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ती है। ऐसे में यदि स्थानीय स्तर पर “पहचान का प्रभाव” कानून से ऊपर दिखने लगे, तो यह केवल व्यक्तिगत चूक नहीं, बल्कि संगठनात्मक संस्कारों पर प्रश्नचिह्न बन जाता है।

राजनीतिक दलों का विकास भी मनुष्य की तरह होता है—संघर्ष से शुरू होकर विस्तार और फिर परिपक्वता तक। प्रारंभिक वर्षों की आक्रामकता को “युवा ऊर्जा” कहा जा सकता है, लेकिन वही व्यवहार यदि परिपक्व अवस्था में भी बना रहे, तो वह ऊर्जा नहीं, बल्कि असंयम कहलाता है। और जब यह असंयम सत्ता के संरक्षण में दिखाई दे, तो उसे “सत्ता की खुमारी” कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

यह भी सत्य है कि किसी भी बड़े संगठन में कुछ व्यक्तियों का व्यवहार पूरे दल का प्रतिनिधित्व नहीं करता। लेकिन यह तर्क तभी तक टिकता है, जब तक संगठन ऐसे मामलों में स्पष्ट, निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई करता हुआ दिखे। अनुशासन केवल विचारधारा का हिस्सा नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यवहार में भी परिलक्षित होना चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि स्थापना दिवस जैसे अवसर केवल उत्सव न बनकर आत्ममंथन का भी माध्यम बनें। कार्यकर्ताओं को यह समझाया जाए कि सत्ता सेवा का माध्यम है, विशेषाधिकार का नहीं। कानून का सम्मान करना केवल आम नागरिक का कर्तव्य नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि की पहली जिम्मेदारी है।

अंततः, यह प्रश्न केवल एक दल का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का है। यदि पूर्व संध्या का संदेश और अगले दिन का व्यवहार एक-दूसरे के विपरीत खड़े हों, तो यह संयोग नहीं, बल्कि संकेत है—इस बात का कि संगठन को अपने दावों और धरातल के बीच की दूरी कम करनी होगी।

क्योंकि इतिहास गवाह है—संगठन भाषणों से नहीं, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं के आचरण से पहचाने जाते 

उनकी पहचान कर यदि संगठन अनुशासनत्मक कार्यवाही नहीं करती दिखे तो पार्टी की यही छवि जनता के बीच स्थाई हों जाती हैँ |

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