डमरूआ न्यूज़ /नई दिल्ली। 31 अगस्त सोमवार

सुप्रीम कोर्ट नें जिला दण्डाधिकारी, रायगढ़ द्वारा पारित किए गए उस आदेश को नागरिक के मौलिक अधिकार पर आघात होना दर्शाते हुए सोमवार 31 अगस्त को रद्द कर दिया, जिसके तहत् रायगढ़ के जिला दण्डाधिकारी नें दिनांक 04/11/2025 को सिंधी काॅलोनी, रायगढ़ में रहने वाले विजय कुमार उर्फ बिज्जू आत्मज स्व. मोहनलाल राजपूत को इस आधार पर रायगढ़ एवं सारंगढ़-बिलाईगढ़, सक्ती, बलौदाबाजार, महासमुंद, जांजगीर-चांपा, कोरबा एवं जशपुर जिला की सीमाओं से एक वर्ष के लिए निष्कासित कर दिया था कि उसके विरूद्ध अनेकों आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं तथा राज्य की सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए उसे रायगढ़ एवं समीपवर्ती जिलों की सीमा से बाहर रखना आवश्यक है।
इस मामलें में विजय राजपूत की ओर से पैरवी करने वाले मिश्रा चेम्बर, रायगढ़ के एडवोकेट आशीष कुमार मिश्रा नें बताया कि, जिला दण्डाधिकारी, रायगढ़ नें विजय राजपूत को नोटिस दिये बिना एवं सुनवाई का अवसर दिये बिना उसके विरूद्ध एकपक्षीय आदेश पारित करते हुए उसे रायगढ़ एवं सारंगढ़-बिलाईगढ़, सक्ती, बलौदाबाजार, महासमुंद, जांजगीर-चांपा, कोरबा एवं जशपुर जिला की सीमाओं से एक वर्ष के लिए निष्कासित कर दिया था एवं विजय राजपूत की गैर हाजिरी का फायदा उठाते हुए रायगढ़ की पुलिस नें विजय राजपूत को उन मामलों का भी आरोपी होना का दस्तावेज पेश कर दिया था, जिनमें वह दोषमुक्त हो चुका है।
प्रशासन के इस अन्याय का शिकार होने पर विजय राजपूत की ओर से छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में ॅच्ब्त् छवण्.16ध्2026 पेश की गई थी परन्तु छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट नें यह दर्शाते हुए गुणदोषों पर आदेश पारित करने से इंकार कर दिया कि, छत्तीसगढ़ राज्य सुरक्षा अधिनियम् की धारा 09 में जिला दण्डाधिकारी के आदेश के विरूद्ध राज्य शासन के समक्ष अपील करने का उपचार उपलब्ध है, इसलिए पीड़ित को इस आदेश के विरूद्ध राज्य शासन के समक्ष अपील करना चाहिए।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से गुणदोषों पर याचिका का निराकरण न होने पर पीड़ित के अधिवक्ता आशीष कुमार मिश्रा द्वारा पीड़ित की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका पेश कराया, जिसमें मिश्रा चेम्बर, रायगढ़ के एसोसिएट पल्लव मोंगिया द्वारा तर्क किया गया।
सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति शीलनागू द्वारा पूरे मामलें की सुनवाई की गई, जिसके पश्चात् सुप्रीम कोर्ट नें जिला दण्डाधिकारी, रायगढ़ के आदेश को भारतीय नागरिक के मौलिक अधिकार के प्रकाश में उचित होना न पाते हुए यह आदेश दिया कि किसी व्यक्ति के विरूद्ध अनेक आपराधिक प्रकरण लंबित होने के आधार पर उसे अनेक जिलों की सीमा से निष्कासित करने का आदेश एक ‘‘रूटीन आदेश‘‘ की तरह पारित नहीं किया जाना चाहिए एवं ऐसा आदेश अधिकारों का मनमाना उपयोग है।
सुप्रीम कोर्ट नें अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि, किसी व्यक्ति के विरूद्ध अनेक आपराधिक प्रकरण लंबित होना उसे जिला से बाहर निकालने का कारण नहीं बन सकता है। ऐसा आदेश तभी पारित किया जा सकता है, जब उस व्यक्ति को जिला की सीमाओं से बाहर करने का विशिष्ट कारण आदेश में दर्शाया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट नें अपने आदेश में दर्शाया कि, किसी व्यक्ति को अनेक जिलों की सीमा से बाहर रखने का आदेश तभी दिया जा सकता है, जब उस व्यक्ति की उपस्थिति से समीपवर्ती क्षेत्र की सुरक्षा खतरें में पड़नें का कारण हो। केवल इस आधार पर किसी का जिला बदर नहीं किया जा सकता है कि, उसके विरूद्ध अनेक आपराधिक प्रकरण लंबित हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पीड़ित के वकील आशीष कुमार मिश्रा नें इसे आम आदमी के मौलिक अधिकार की रक्षा की दिशा तय करने वाला अति महत्वपूर्ण फैसला बताया एवं कहा कि, इस आदेश से दशकों की वे भ्रान्तियाँ दूर हो गई हैं, जिसके आधार पर स्थानीय नागरिकों का जिला बदर होता रहा है।
पीड़ित विजय राजपूत नें सुप्रीम कोर्ट की इस फैसले को अपने लिए बहुत बड़ी राहत मिल जाना बताते हुए दर्शाया कि, सुप्रीम कोर्ट नें उसके मौलिक अधिकार और नागरिक अधिकार की जिस तरह रक्षा किया है, उससे न्याय व्यवस्था के प्रति उसका विश्वास बढ़ गया है एवं यह साबित हो गया है कि ‘‘देर है परन्तु अंधेर नहीं है।‘‘






