सिंघल स्टील के खिलाफ 20 गांवों का बिगुल, बोले किसान- अब नहीं लुटेगी जमीन, पहले पुरानी लूट का हिसाब दो
जेएसडब्ल्यू और वीजा स्टील का उदाहरण देकर ग्रामीणों ने उठाए सवाल; कहा- हजारों एकड़ जमीन वर्षों से पड़ी बंधक, अब लिखित गारंटी के बिना नहीं देंगे एक इंच भी भूमि
डमरूआ न्यूज़ /रायगढ़. रायगढ़ जिले में प्रस्तावित सिंघल स्टील प्राइवेट लिमिटेड के ग्रीनफील्ड स्टील प्लांट के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा अब खुलकर सड़कों पर उतरने लगा है। पतरापाली, कोतरलिया सहित लगभग 20 गांवों के किसानों, ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कंपनी प्रबंधन को दो टूक संदेश देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जिले को उद्योगों की कब्रगाह और किसानों की जमीन को कॉरपोरेट कंपनियों की जागीर नहीं बनने दिया जाएगा। 6 जुलाई को प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई से पहले ही क्षेत्र में विरोध की लहर तेज हो गई है।
कंपनी प्रबंधन के साथ हुई बैठक में ग्रामीणों ने तीखे सवालों की झड़ी लगा दी। उनका कहना था कि रायगढ़ पहले ही उद्योगों के प्रदूषण का दंश झेल रहा है। जिले में संचालित सौ से अधिक बड़े उद्योगों ने खेती, जलस्रोतों और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। खेतों की उर्वरा शक्ति घट रही है, भूजल प्रदूषित हो चुका है और ग्रामीणों का स्वास्थ्य लगातार प्रभावित हो रहा है। ऐसे में एक और स्टील प्लांट स्थापित करने से पहले प्रशासन और सरकार को यह बताना होगा कि पुराने उद्योगों की जवाबदेही कब तय होगी।
बैठक के दौरान सबसे बड़ा सवाल जमीन अधिग्रहण को लेकर उठा। ग्रामीणों ने पूछा कि यदि कंपनी किसानों की भूमि ले लेती है तो इसकी क्या गारंटी है कि परियोजना वास्तव में धरातल पर उतरेगी। लोगों ने आरोप लगाया कि जिले में पहले भी कई कंपनियां बड़े-बड़े वादों के साथ आईं, जमीनें अधिग्रहित कीं और फिर वर्षों तक परियोजनाएं शुरू नहीं हो सकीं। परिणामस्वरूप किसान अपनी जमीन से भी हाथ धो बैठे और रोजगार के वादे भी अधूरे रह गए।
ग्रामीणों ने उदाहरण देते हुए कहा कि वीजा स्टील द्वारा अधिग्रहित सैकड़ों एकड़ तथा जेएसडब्ल्यू द्वारा अधिग्रहित लगभग एक हजार एकड़ भूमि आज भी प्रभावी उपयोग का इंतजार कर रही है। इन जमीनों पर न उद्योग स्थापित हुए और न ही किसान दोबारा खेती कर सके। प्रभावित परिवार आज भी रोजगार, पुनर्वास और न्याय की राह देख रहे हैं।
सिंघल स्टील की प्रस्तावित परियोजना के लिए लगभग एक हजार एकड़ भूमि की आवश्यकता बताई जा रही है। इस पर ग्रामीणों ने स्पष्ट मांग रखी कि यदि कंपनी निर्धारित समयावधि में परियोजना शुरू नहीं कर पाती है तो अधिग्रहित भूमि अधिकतम दो वर्ष के भीतर मूल भू-स्वामियों को वापस लौटाने का कानूनी प्रावधान किया जाए। इसके साथ ही रोजगार, पुनर्वास, आवास, मुआवजा और सामाजिक सुरक्षा की लिखित एवं कानूनी गारंटी भी अनिवार्य की जाए।
बैठक के बाद ग्रामीणों ने निर्णय लिया कि वे अपनी मांगों को लेकर कलेक्टर और राज्य शासन को ज्ञापन सौंपेंगे। उनका कहना है कि जनसुनवाई केवल औपचारिकता नहीं हो सकती। कंपनी और प्रशासन को पहले यह स्पष्ट करना होगा कि परियोजना कब शुरू होगी, कितने स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और किसानों के अधिकारों की रक्षा किस प्रकार सुनिश्चित की जाएगी।
ग्रामीणों ने चेतावनी देते हुए कहा कि रायगढ़ अब और प्रदूषण तथा भूमि अधिग्रहण की कीमत नहीं चुकाएगा। पहले अधूरी परियोजनाओं, बंधक पड़ी जमीनों और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों का हिसाब दिया जाए, उसके बाद ही नए उद्योगों की बात की जाए। किसानों ने साफ शब्दों में कहा कि उनकी जमीन कोई व्यापारिक वस्तु नहीं है और न ही किसी कंपनी की निजी संपत्ति। यदि उनकी आशंकाओं का समाधान नहीं हुआ तो विरोध आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।

वीजा और जेएसडब्ल्यू का नाम लेकर उठे सवाल
ग्रामीणों ने बैठक में दावा किया कि क्षेत्र में पहले से बड़ी मात्रा में भूमि विभिन्न औद्योगिक परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित की जा चुकी है। उनका कहना है कि वीजा स्टील द्वारा अधिग्रहित लगभग 500 एकड़ और जेएसडब्ल्यू द्वारा अधिग्रहित करीब 1000 एकड़ भूमि का बड़ा हिस्सा आज भी किसानों के उपयोग में नहीं है। ग्रामीणों ने पूछा कि जब पुरानी अधिग्रहित भूमि का उपयोग और प्रभावित परिवारों का पुनर्वास अब तक संतोषजनक ढंग से नहीं हो पाया, तब नई परियोजना के लिए भूमि लेने का औचित्य क्या है।
जनसुनवाई से पहले गांवों का अल्टीमेटम
ग्रामीणों ने साफ कहा है कि अब केवल मौखिक आश्वासन स्वीकार नहीं किए जाएंगे। उनका कहना है कि उद्योग स्थापना के नाम पर किसानों की जमीन लेकर उसे वर्षों तक खाली छोड़ देने की प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए। ग्रामीणों के अनुसार पहले अधूरी परियोजनाओं, बंधक पड़ी जमीनों और प्रदूषण से जुड़े सवालों का समाधान किया जाए, उसके बाद ही नई परियोजनाओं पर आगे बढ़ा जाए। यही कारण है कि 6 जुलाई की जनसुनवाई अब महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया न रहकर भूमि, पर्यावरण और ग्रामीण अधिकारों के बड़े मुद्दे में बदलती दिखाई दे रही है।
ग्रामीणों के इस उग्र रुख के बाद अब 6 जुलाई को प्रस्तावित जनसुनवाई पर पूरे जिले की नजरें टिक गई हैं। यह जनसुनवाई केवल एक औद्योगिक परियोजना का मसला नहीं बल्कि जमीन, पर्यावरण और ग्रामीण अधिकारों की बड़ी लड़ाई बनती जा रही है।



























