शिक्षा परिशिष्ट विशेष
जांजगीर चाम्पा : शासन की घोषणा के अनुसार 16 जून से नया शिक्षण सत्र प्रारंभ हो चुका है। प्रदेश भर में हजारों अभिभावक अपने बच्चों के प्रवेश, नई कक्षाओं और बेहतर भविष्य की तैयारियों में जुटे हैं। हर माता-पिता की यही इच्छा होती है कि उनका बच्चा ऐसे विद्यालय में पढ़े जहाँ उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुरक्षित वातावरण, योग्य शिक्षक और ईमानदार शैक्षणिक व्यवस्था मिले।
इसके लिए अभिभावक लाखों रुपये फीस पर खर्च करते हैं, परिवहन, किताबें, यूनिफॉर्म, गतिविधियों और अतिरिक्त कोचिंग पर अलग से राशि खर्च करते हैं। प्रवेश के समय विद्यालय की ऊँची इमारतें, वातानुकूलित कक्षाएँ, आकर्षक विज्ञापन, सोशल मीडिया प्रचार, अंग्रेज़ी माध्यम का दावा और शत-प्रतिशत बोर्ड परिणाम देखकर प्रभावित भी हो जाते हैं।
लेकिन इसी प्रक्रिया में एक ऐसा महत्वपूर्ण पहलू है, जिससे अधिकांश अभिभावक आज भी अनजान हैं।
वह है MPD (Mandatory Public Disclosure) – अर्थात विद्यालय का अनिवार्य सार्वजनिक प्रकटीकरण।
CBSE ने प्रत्येक संबद्ध विद्यालय के लिए यह अनिवार्य किया है कि वह अपनी वेबसाइट पर अपनी मान्यता, शिक्षकों की योग्यता, विषयवार फैकल्टी, शुल्क संरचना, सुरक्षा प्रमाणपत्र, प्रबंधन समिति, आधारभूत सुविधाओं, बोर्ड परीक्षा परिणाम और अन्य आवश्यक जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करे। इसका उद्देश्य केवल एक औपचारिक वेबपेज बनाना नहीं, बल्कि अभिभावकों को यह अधिकार देना है कि वे अपने बच्चे के भविष्य का निर्णय तथ्यों के आधार पर लें, केवल दावों के आधार पर नहीं।
अब स्वयं से कुछ प्रश्न पूछिए—
क्या आपने कभी अपने बच्चे के स्कूल का MPD देखा है?
क्या विद्यालय की वेबसाइट पर MPD उपलब्ध भी है?
क्या उसमें शिक्षकों की योग्यता, विषयवार फैकल्टी, शुल्क संरचना और अन्य अनिवार्य जानकारी पूर्ण एवं अद्यतन है?
क्या MPD में जिन शिक्षकों को PGT या विषय विशेषज्ञ बताया गया है, वास्तव में वही आपके बच्चे को प्रतिदिन पढ़ा रहे हैं?
क्या विद्यालय द्वारा ली जा रही फीस वही है जो सार्वजनिक रूप से घोषित की गई है?
क्या MPD में दर्शाई गई प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय, खेल सुविधाएँ और अन्य संसाधन वास्तव में मौजूद हैं?
क्या आपने कभी पिछले वर्ष के विद्यार्थियों या उनके अभिभावकों से बात करके यह जानने का प्रयास किया कि पूरे सत्र में वास्तविक स्थिति क्या थी?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर “नहीं” है, तो संभव है कि आप अपने बच्चे का भविष्य केवल विज्ञापनों, होर्डिंग्स, सोशल मीडिया पोस्ट और रिजल्ट के प्रतिशत के आधार पर तय कर रहे हों।
दुर्भाग्य से शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता पर चर्चा बहुत कम होती है। अधिकांश अभिभावक प्रवेश के समय केवल सुविधाओं का प्रदर्शन देखते हैं, जबकि शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता का निर्धारण उन शिक्षकों, शैक्षणिक प्रक्रियाओं, नियमों के पालन और जवाबदेही से होता है जो प्रतिदिन कक्षा के भीतर दिखाई देती हैं।
यदि किसी विद्यालय में कागज़ों पर नियमों का पालन दिखाया जाए और वास्तविकता कुछ और हो, तो सबसे बड़ा नुकसान न विद्यालय का होता है और न ही प्रबंधन का। सबसे बड़ी कीमत उस विद्यार्थी को चुकानी पड़ती है जिसका एक पूरा शैक्षणिक वर्ष वापस नहीं लौट सकता।
विद्यालय बाद में अपनी वेबसाइट अपडेट कर सकता है, रिकॉर्ड संशोधित कर सकता है, नए शिक्षक नियुक्त कर सकता है या व्यवस्थाएँ बदल सकता है, लेकिन विद्यार्थी का खोया हुआ समय और उसका शैक्षणिक नुकसान कभी पूरी तरह वापस नहीं आता।
इसलिए अब समय आ गया है कि अभिभावक केवल फीस जमा करने वाले ग्राहक नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के सजग सहभागी बनें। प्रश्न पूछना आपका अधिकार है और पारदर्शिता सुनिश्चित करना प्रत्येक विद्यालय की जिम्मेदारी।
हम भी अपनी सामाजिक और पत्रकारिक जिम्मेदारी निभाते हुए जिले के निजी विद्यालयों के MPD (Mandatory Public Disclosure) का क्रमवार अध्ययन और तथ्यात्मक विश्लेषण आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित जानकारी और वास्तविक व्यवस्था में कितना सामंजस्य है, ताकि अभिभावक जागरूक होकर अपने बच्चों के भविष्य से जुड़ा निर्णय ले सकें।
हम किसी संस्था को कटघरे में खड़ा करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक विद्यालय के MPD का अध्ययन करेंगे और उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखों के आधार पर तथ्य आपके सामने रखेंगे।
क्योंकि शिक्षा केवल भवन, विज्ञापन और बोर्ड परिणाम का नाम नहीं है। शिक्षा विश्वास का विषय है, और विश्वास की पहली शर्त है पारदर्शिता। यदि नियम केवल कागज़ों और वेबसाइटों तक सीमित रह जाएँ, तो सबसे बड़ी कीमत हमारे बच्चों का भविष्य चुकाता है।



























