खनिज विभाग और मुख्यमंत्री स्तर तक शिकायत पहुंचने के बाद भी सर्वमंगला क्रेशर पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। क्षेत्र में चर्चा है कि अवैध खनन से निकाले गए पत्थरों का भंडारण और उसी के आधार पर क्रेशर का संचालन धड़ल्ले से जारी है, लेकिन जिम्मेदार विभाग अब तक निष्क्रिय नजर आ रहा है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, सर्वमंगला क्रेशर में लगातार ऐसे पत्थरों की सप्लाई हो रही है जिनकी वैधता पर सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह पत्थर बिना उचित रॉयल्टी और वैध खदान स्रोत के लाए जा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कच्चा माल ही अवैध है, तो क्रेशर का संचालन वैध कैसे माना जा सकता है।
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू रॉयल्टी से जुड़ा है। सामान्यतः रॉयल्टी केवल वैध खनन पर ही लागू होती है, लेकिन यदि पत्थर अवैध स्रोत से आ रहा है, तो उसकी रॉयल्टी कैसे जारी की जा रही है? विभाग किस आधार पर इसका आंकलन कर रहा है, यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। यही वजह है कि पूरे मामले में पारदर्शिता को लेकर संदेह गहराता जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार इस संबंध में शिकायतें की गई हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकता ही नजर आती है। इससे यह आशंका भी जताई जा रही है कि कहीं न कहीं विभागीय स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत की स्थिति हो सकती है।
हालांकि, इस मामले में संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है। यदि आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि शासन के राजस्व को भी सीधा नुकसान पहुंचाने वाला मामला बन सकता है।
अब देखना होगा कि शिकायतों के बाद प्रशासन इस पर गंभीरता दिखाता है या फिर मामला यूं ही ठंडे बस्ते में पड़ा रहता है। फिलहाल, सवाल यही है क्या सर्वमंगला क्रेशर को बचाने में कहीं कोई सिस्टम काम कर रहा है, या फिर जल्द ही सख्त कार्रवाई देखने को मिलेगी?