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राजस्व विभाग में जारी हैं महा घोटाले @ राजस्व अधिकारियों पर FIR और उनकी सेवा समाप्ति की कार्यवाही क्यों नहीं…?

आवंटित जमीन घोटाले पर पर्दा: नामांतरण रद्द कर जिम्मेदारों को बचाने की कोशिशIMG 20260420 WA0018

रजिस्ट्री को शून्य घोषित करने की कार्रवाई ठंडे बस्ते में, नियमों की खुली अनदेखी के बाद भी जमीन वापस निजी नामों में दर्ज

डमरूआ न्यूज़ /रायगढ़.

भूमिहीन व्यक्तियों को सरकार द्वारा जो भूमिया आवंटित की गई है ऐसे लोगों ने बिना वैध प्रशासनिक  अनुमति प्राप्त किये, सेठ साहूकारों को अपनी जमीन जो आवंटित है अर्थात जो सरकारी दया पर मिली जमीन है और उसे दोबारा किसी और को बेचा जाना अवैध है, अर्थात ऐसी जमीनों को नहीं बेचा जा सकता है उन जमीनों को डंके की चोट पर अपनी बपौती समझते हुए बेच दिया गया ! यह खरीदी बिक्री पूर्णतः अवैध है, यह तो रहा खरीदने और बेचने वाले का रोल, अब जरा इसे भी समझिए कि प्रशासनिक अधिकारियों कर्मचारियों ने किस हद तक भ्रष्टाचार करते हुए उक्त जमीनों को सेठ साहूकारों के नाम पर चढ़ा दिया है और अब जबकि पूरा महा घोटाला सामने है उसके बावजूद ना तो किसी राजस्व अधिकारी कर्मचारी पर कोई FIR की गई है और ना ही उनकी सेवा समाप्त की गई है. दरअसल  किसी भी जमीन को खरीदी बिक्री करने के पूर्व पटवारी द्वारा बिक्री छांट नकल निकाला जाता है, स्वाभाविक है कि जिस भूमि को बेचा जा सकता हो अथवा सरकारी भूमि ना हो उसी भूमि की बिक्री छांट नकल पटवारी प्रदान कर सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया में पटवारी ने ऐसी सरकारी जमीन जिसे आवंटन पर किसी और को दिया गया था उसे बेचने के लिए एक तगड़ा बेस बना दिया और खरीदारों को बिक्री छठ नकल आसानी से उपलब्ध करा दी गई. इसी के आधार पर न केवल उन सरकारी आवंटित भूमियों का रजिस्ट्री कार्यालय से खरीदी बिक्री कर लिया गया बल्कि राजस्व अधिकारियों ने गांधी जी को ताक पर रखकर सेठ साहूकारों के नाम पर उक्त सरकारी जमीनों को दर्ज कर दिया. अब इस पूरे मामले में रायगढ़ का प्रशासनिक अमला मिले सुर मेरा तुम्हारा का राग अलाप रहा है, इस करोड़ों के महा भ्रष्टाचार को रायगढ़ का प्रशासनिक अमला सदाचार बताने में तुला हुआ है, सवाल तब और बड़ा खड़ा हो जाता है कि जब भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे कुछ राजस्व अधिकारियों पर रायगढ़ जैसे जागरुक एवं राजनीतिक रूप से प्रदेश में सबसे संपन्न व सूद्रढ़ जिले मैं भी उनके भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नहीं लग रहा है और ना ही इन पर कोई कार्रवाई हो रही है. 

अमलीभौना की बहुमूल्य आवंटित भूमि की अवैध खरीद-बिक्री के मामले में राजस्व विभाग की कार्रवाई अब सवालों के घेरे में आ गई है। सतही तौर पर नामांतरण निरस्त कर देने को ही पूरा समाधान मान लिया गया है, जबकि असल गड़बड़ी की जड़ यानी अवैध रजिस्ट्री को शून्य घोषित करने की प्रक्रिया जानबूझकर आगे नहीं बढ़ाई जा रही। इससे पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर संदेह गहराता जा रहा है और यह आशंका भी बलवती हो रही है कि कहीं न कहीं मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है।
राजस्व अभिलेख बताते हैं कि ग्राम अमलीभौना स्थित खसरा नंबर 282/3, जो मूल रूप से शासकीय भूमि थी, का आवंटन विभिन्न लोगों को किया गया था। नियमों के तहत इस प्रकार की भूमि का बिना सक्षम अनुमति के विक्रय पूर्णतः प्रतिबंधित है, इसके बावजूद फरवरी 2025 में तत्कालीन पटवारी द्वारा बिना कलेक्टर की अनुमति के बिक्री नकल जारी कर दी गई। इसी आधार पर राजकुमार अग्रवाल के नाम पर रजिस्ट्री हुई और तत्पश्चात तत्कालीन तहसीलदार ने नामांतरण भी कर दिया।
मामला उजागर होने के बाद उच्च अधिकारियों के निर्देश पर नामांतरण तो निरस्त कर दिया गया, लेकिन सबसे अहम कार्रवाई—रजिस्ट्री को शून्य घोषित करने—पर अब तक कोई पहल नहीं की गई है। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि प्रशासनिक स्तर पर केवल औपचारिकता निभाई गई है, जबकि वास्तविक सुधार से दूरी बनाए रखी जा रही है।
भूमि आवंटन की शर्तों में स्पष्ट प्रावधान है कि नियमों का उल्लंघन होने पर आवंटन स्वतः निरस्त होकर भूमि शासन के खाते में दर्ज की जानी चाहिए। लेकिन यहां उल्टा खेल हुआ है। नामांतरण रद्द होने के बाद भी जमीन को शासन के खाते में दर्ज करने के बजाय पुनः मूल आवंटितों के नाम पर दर्ज कर दिया गया है, जो पूरी प्रक्रिया को संदिग्ध बनाता है।
इसी तरह लामीदरहा क्षेत्र में भी आवंटित भूमि की अवैध खरीद-बिक्री के मामलों में अधूरी कार्रवाई सामने आ चुकी है। वहां भी कई प्रकरणों में नामांतरण निरस्त करने की कार्रवाई लंबित है और जहां निरस्त किया गया है, वहां भी जमीन शासन के खाते में दर्ज नहीं की गई। इससे यह साफ होता है कि पूरे जिले में एक ही पैटर्न के तहत कार्रवाई को अधूरा छोड़ दिया जा रहा है।
तहसीलदार शिव डनसेना का कहना है कि अमलीभौना प्रकरण में नामांतरण निरस्त कर दिया गया है और उच्च अधिकारियों के निर्देश पर आगे की कार्रवाई की जाएगी, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट दिखाई दे रही है।
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कहां हुई सबसे बड़ी चूक

बिना कलेक्टर की अनुमति के पटवारी द्वारा बिक्री नकल जारी करना इस पूरे मामले की सबसे गंभीर त्रुटि है। इसके बाद तहसीलदार द्वारा बिना अभिलेखों की समुचित जांच के नामांतरण करना प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि नियमों की खुली अनदेखी को दर्शाता है।
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नियम क्या कहते हैं

आवंटित शासकीय भूमि का बिना अनुमति विक्रय पूरी तरह प्रतिबंधित है। शर्तों के उल्लंघन पर आवंटन निरस्त कर भूमि को शासन के खाते में दर्ज किया जाना अनिवार्य होता है। इसके साथ ही अवैध रजिस्ट्री को शून्य घोषित करना भी जरूरी प्रक्रिया का हिस्सा है।
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कार्रवाई क्यों मानी जा रही अधूरी

केवल नामांतरण निरस्त करना पर्याप्त नहीं है। जब तक रजिस्ट्री को शून्य घोषित कर जमीन को शासन के खाते में दर्ज नहीं किया जाता, तब तक अवैध लेन-देन का प्रभाव बना रहता है और भविष्य में फिर से विवाद या हेरफेर की संभावना बनी रहती है।

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