लैलूंगा का आश्रम शिकायतों और जांच रिपोर्ट के खुलासों के बीच, कार्रवाई से बचते रहे जिम्मेदार
डमरूआ न्यूज़ /रायगढ़।
रायगढ़ जिले की लैलूंगा तहसील में संचालित एक आश्रम अब सिर्फ शिकायतों का नहीं बल्कि दस्तावेजी जांच रिपोर्ट में उजागर हुए गंभीर वित्तीय घोटालों का केंद्र बन चुका है। धर्म, सेवा और बच्चों के कल्याण के नाम पर संचालित इस आश्रम को सरकार से वर्षों से नियमित अनुदान, छात्रावास संचालन की अनुमति और तमाम सुविधाएं मिल रही हैं, लेकिन जांच प्रतिवेदन और शिकायतों से सामने आई सच्चाई इसके ठीक उलट है। स्थिति यह है कि आश्रम से जुड़ी शिकायतें प्रशासन और शासन के उच्च स्तर तक पहुंचने के बावजूद सालों से फाइलों में दबी रहीं, जिससे अब पूरे तंत्र की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई है।
सरकारी अनुदान से 100 सीटों का छात्रावास, फिर भी छात्रों से अवैध वसूली
आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा इस आश्रम को 100 सीटों के छात्रावास के संचालन हेतु नियमित अनुदान स्वीकृत है। नियमानुसार छात्रों के भोजन, आवास, वस्त्र और अन्य आवश्यकताओं के लिए शासन अलग से राशि देता है। इसके बावजूद शिकायतों और जांच रिपोर्ट में यह गंभीर तथ्य सामने आया है कि छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों से प्रति छात्र 5 हजार से 6 हजार रुपए तक की अवैध वसूली की जा रही है।
जांच प्रतिवेदन में दर्ज तथ्यों के अनुसार यह वसूली किसी एक सत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि कई वर्षों से लगातार चल रही है। यही नहीं, भोजन सामग्री की खपत में भी भारी गड़बड़ी सामने आई है। वास्तविक छात्र संख्या से कहीं अधिक मात्रा में तेल, दाल, मसाले और अन्य सामग्री की खरीद कागजों में दर्शाई गई, जबकि मौके पर छात्रों की उपस्थिति और व्यवस्था उससे मेल नहीं खाती पाई गई।
जांच रिपोर्ट ने खोली पोल, स्टॉक और भुगतान में भारी हेराफेरी
जांच अधिकारियों द्वारा तैयार प्रतिवेदन में छात्र उपस्थिति रजिस्टर, स्टॉक रजिस्टर और भुगतान अभिलेखों में गंभीर विरोधाभास दर्ज किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार भोजन और अन्य मदों में खर्च को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। निरीक्षण के समय जमीनी हालात कागजी रिकॉर्ड से पूरी तरह अलग पाए गए। यह स्थिति साफ तौर पर संकेत देती है कि मामला साधारण लापरवाही का नहीं बल्कि सुनियोजित वित्तीय अनियमितता और सरकारी धन के दुरुपयोग का है।
अनाथ बताकर बच्चों के नाम पर दान वसूली का आरोप
शिकायतों में एक और चौंकाने वाला आरोप सामने आया है। आश्रम प्रबंधन पर आरोप है कि छात्रावास में रह रहे करीब 30 बच्चों को अनाथ बताकर दानदाताओं से चंदा वसूला जा रहा है। बताया गया है कि जिन बच्चों को अनाथ बताया जाता है, उनके माता-पिता जीवित हैं, लेकिन सहानुभूति और अधिक दान प्राप्त करने के उद्देश्य से उन्हें अनाथ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। दानदाताओं से यह कहकर राशि ली जाती है कि वे बच्चों को गोद लेकर उनके भविष्य को संवार रहे हैं, जबकि एकत्र की गई राशि के उपयोग और लेखा-जोखा को लेकर कोई पारदर्शिता नहीं है।
सबूत देने के बाद भी विभागीय चुप्पी, संरक्षण के आरोप गहराए
शिकायतकर्ताओं द्वारा इस पूरे मामले से जुड़े दस्तावेज, बयान और साक्ष्य विभागीय अधिकारियों और शासन को सौंपे जाने के बावजूद न तो स्वतंत्र जांच समिति गठित की गई और न ही छात्रावास प्रबंधन से सख्त जवाब-तलब हुआ। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद भी कार्रवाई न होना इस आशंका को बल देता है कि इस आश्रम को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते वर्षों से नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है।
कानूनी नजरिए से क्या बनता है मामला
जांच रिपोर्ट और शिकायतों में सामने आए तथ्यों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, कूटरचना और सरकारी धन के दुरुपयोग जैसे गंभीर अपराध बनते हैं। यदि लोक सेवकों की मिलीभगत या लापरवाही सिद्ध होती है तो उनके विरुद्ध भी आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान है। अनाथ बताकर दान वसूली के आरोप सामाजिक और आर्थिक अपराध की श्रेणी में आते हैं, जिनकी अलग से गहन जांच आवश्यक है।
प्रशासन की चुप्पी अब सबसे बड़ा सवाल
लगातार शिकायतें, जांच रिपोर्ट के खुलासे, अवैध वसूली और सरकारी अनुदान के कथित दुरुपयोग के बावजूद प्रशासन की चुप्पी अब खुद कटघरे में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई होती तो इतने बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां नहीं पनपतीं। अब देखना यह है कि शासन इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह फाइलों में दबाकर छोड़ दिया जाएगा।
जांच में उजागर हुई गड़बड़ियां और अनियमितताओं का पूरा खाका
जांच प्रतिवेदन और शिकायतों में सामने आए तथ्यों के अनुसार लैलूंगा स्थित आश्रम एवं उससे संचालित छात्रावास में अनियमितताएं एक-दो मद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक निरंतर और प्रणालीगत गड़बड़ी का मामला है। छात्रावास की स्वीकृत क्षमता 100 विद्यार्थियों की है, जबकि जांच के समय वास्तविक उपस्थिति लगभग 60 से 65 छात्रों की पाई गई। इसके बावजूद भोजन सामग्री की खपत, खरीद और भुगतान का रिकॉर्ड पूरे 100 छात्रों के अनुरूप दर्शाया गया। इस प्रकार 35 से 40 छात्रों के बराबर अतिरिक्त भोजन सामग्री केवल कागजों में खपाई गई।
तेल की खपत निर्धारित मानकों से लगातार अधिक दर्शाई गई। स्टॉक रजिस्टर में दर्ज मात्रा और मौके पर उपलब्ध सामग्री के बीच स्पष्ट अंतर पाया गया। इसी तरह दाल, चावल, मसाले और अन्य खाद्य पदार्थों की खपत भी छात्र उपस्थिति से मेल नहीं खाती। बिल भुगतान, स्टॉक शेष और भोजन वितरण रजिस्टर के आंकड़ों में गंभीर विरोधाभास दर्ज किए गए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि खर्च जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया।
छात्रावास संचालन के लिए शासन से नियमित अनुदान प्राप्त होने के बावजूद विद्यार्थियों से प्रति छात्र 5 हजार से 6 हजार रुपए तक की अवैध वसूली किए जाने के आरोप सामने आए हैं। शिकायतों के अनुसार यह वसूली कई वर्षों से लगातार की जा रही है, जिससे यह छात्रावास कथित रूप से निजी कमाई का साधन बन गया। यह स्थिति शासन द्वारा प्रदत्त सुविधाओं के दोहरे लाभ का स्पष्ट मामला बनती है।
जांच और शिकायतों में यह भी सामने आया है कि लगभग 30 बच्चों को अनाथ बताकर दानदाताओं से चंदा वसूला गया, जबकि उनके माता-पिता जीवित पाए गए। दान राशि के संग्रह, उपयोग और लेखा-जोखा को लेकर कोई पारदर्शी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। सहानुभूति के नाम पर दान जुटाकर उसके उपयोग को अस्पष्ट रखना गंभीर सामाजिक और आर्थिक अनियमितता की श्रेणी में आता है।
दस्तावेजी स्तर पर छात्र उपस्थिति रजिस्टर, भोजन वितरण रजिस्टर, स्टॉक रजिस्टर और भुगतान वाउचर के बीच कोई तालमेल नहीं पाया गया। एक ही अवधि के लिए अलग-अलग अभिलेखों में अलग-अलग आंकड़े दर्ज हैं। जांच रिपोर्ट में इन सभी तथ्यों को साधारण प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि सुनियोजित और लंबे समय से चली आ रही अनियमितता के संकेत के रूप में दर्ज किया गया है।
जांच में दर्ज मदों, अतिरिक्त खपत, अवैध वसूली और दान की अपारदर्शी व्यवस्था को देखते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि मामला विस्तृत वित्तीय ऑडिट और आपराधिक कार्रवाई योग्य है।