जांजगीर-चांपा -पड़ोसी जिला बिलासपुर में हुए भयानक रेल हादसे ने पूरे अंचल को हिला दिया।ll
कोरबा-बिलासपुर मेमू ट्रेन की इस दुर्घटना में घायल और मृतक यात्री क्षेत्र के लोग थे जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जांजगीर-चांपा जिले के आम लोग के बीच थे — मजदूर, छात्र और रोज़ाना सफर करने वाले नागरिक।
हादसे की खबर मिलते ही जिले में मातम और चिंता का माहौल बन गया, हर गली-मोहल्ले में लोग अपने परिचितों की खबर लेने में जुटे थे।
लेकिन इसी बीच, जिले का प्रशासनिक अमला और मंत्री महोदय राज्योत्सव के मंच पर संगीत की थाप पर थिरकते नजर आए।
हादसे के समय भी मंच पर चल रहे मनोरंजन कार्यक्रमों और मंत्रियों की मौजूदगी ने आम जनता को झकझोर दिया।
लोगो को टिस इस बात का हैँ की
“जब अपने लोग रेल हादसे में तड़प रहे थे, तब हमारे जिम्मेदार लोग तालियों और गीतों के बीच मुस्कुरा रहे थे — इससे ज्यादा अमानवीय दृश्य और क्या होगा?”
क्या संवेदना अब सरकारी भाषणों का हिस्सा भर रह गई है?
क्या शासन-प्रशासन का दायित्व केवल उत्सव मनाना भर रह गया है?
राज्योत्सव की चमक और शोरगुल के बीच जांजगीर-चांपा की संवेदनाएं कहीं खो गईं।
जिस वक्त जिले के परिवार अपने परिजनों के हालात जानने को बेचैन थे, उसी वक्त मंच पर मंत्री और अफसर माइक थामे आनंद ले रहे थे।
यह दृश्य मानवीय संवेदना के साथ सबसे बड़ा मज़ाक नहीं था?
“क्या प्रशासन की संवेदना मर चुकी है, या फिर अब यह भी समारोहों की तरह ‘प्रोटोकॉल’ बन गई है?”