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चाम्पा की जनता से कड़ा सवाल – आखिर कब तक ये ढोंग चलता रहेगा?

चाम्पा की जनता से कड़ा सवाल – आखिर कब तक ये ढोंग चलता रहेगा

चाम्पा में बिजली की आँख-मिचौली से लोग हलकान हैं। पंखे बंद। मोटर बंद। बच्चों की नींद खराब। दुकानें अधेरी। घरों में घुटन।

और इस बीच पार्षद साहब लोग सड़कों पर उतर आए हैं। सीएसईबी के अधिकारियों पर दबाव बना रहे हैं। फोटो खिंचवा रहे हैं – “देखिए जनता के मसीहा आए हैं!”

पर असली सवाल कौन पूछेगा?

क्यों भाई? अब क्यों याद आई जनता?

जब पिछले 10 साल से सीएसईबी कह रहा था कि लोड बढ़ गया है – सब-स्टेशन बनना जरूरी है – तब ये पार्षद साहब कहां थे? कौनसी गुफा में समाधि लगा रहे थे?

योजना तो मंजूर हो गई थी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जीवन ज्योति योजना के तहत सब-स्टेशन स्वीकृत हुआ था। CSEB ने मंजूरी दिलवा दी थी।

तो अटका कहां?

नगर पालिका के पास।

क्यों? क्योंकि नगर पालिका जमीन ही नहीं दे रही थी!

और इन पार्षद साहबों की मजाल देखिए – चुनाव के समय प्रस्ताव पास हुआ। वाह! क्या ड्रामा था! सबने तालियां बजा दीं। अखबार में हेडलाइन छपवा ली। जनता को बेवकूफ बना दिया।

मगर उसके बाद?

फाइल दबा दी। महीनों तक।

आज तक जमीन दी? नहीं दी!

और अब बरसात आ गई है। अब कोई निर्माण नहीं होगा। सब-स्टेशन नहीं बनेगा। जनता को अंधेरे में तड़पना पड़ेगा। बच्चे रोएं – बूढ़े परेशान हों – दुकानदार घाटा झेले – इन्हें कोई फर्क नहीं।

क्योंकि इनका काम पूरा हो गया। फोटो आ गई। बयान चल गया। जनता को मूर्ख बना दिया।

और हद देखिए – अब वही लोग अधिकारियों पर चिल्ला रहे हैं। “तुम काम क्यों नहीं कर रहे?”

क्यों भाई? जमीन तुमने दी नहीं, सब-स्टेशन बना नहीं – और गलती अधिकारियों की?

चाम्पा की जनता से सवाल है –

कब तक इन ढोंगियों के हाथ में अपना भविष्य दोगे?

कब तक इनकी नौटंकी पर ताली बजाओगे?

कब इनसे पूछोगे – जमीन क्यों नहीं दी? फाइल क्यों दबाई?

कब इनके गले में जवाबदेही का पट्टा डालोगे?

ये लोग चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करते हैं। फिर सत्ता में बैठकर फाइल दबा देते हैं। और जब जनता की चीख निकलने लगती है तो अधिकारियों को गाली देकर खुद को नायक साबित करने लगते हैं।

यह चालाकी अब समझो।

ये जो आज अधिकारियों पर चिल्ला रहे हैं – कल यही अधिकारियों से जमीन न देने के बहाने बनवा रहे थे।

तो सवाल पूछो – क्यों नहीं दी जमीन? कौन जिम्मेदार है?

क्योंकि अगर जनता चुप रही तो अगली बार भी यही होगा।

पंखा बंद।

मोटर बंद।

अंधेरा।

और पार्षद साहब – फोटो खिंचवाते हुए।

फैसला आपका है – सवाल पूछना है या अंधेरे में रहना है

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