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28 को BS की जनसुनवाई या फ़रेब @ भ्रमित करने वाली कॉपी-पेस्ट ईआईए रिपोर्ट के सहारे उद्योग लगाने की तैयारी

28 सितंबर की प्रस्तावित जनसुनवाई से पहले जमीन की वास्तविक स्थिति, आबादी, जलस्रोत, वन सीमा और सामाजिक संस्थानों का स्वतंत्र भौगोलिक एवं राजस्व सर्वेक्षण कराने की नितांत आवश्यकताScreenshot 20260905 064805 2

डमरूआ न्यूज़ /रायगढ़। औद्योगिक प्रदूषण और पर्यावरणीय दबाव को लेकर लंबे समय से चर्चा में रहने वाले रायगढ़ जिले में अब बी. एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड की नवापारा (टेंडा) एवं चारमार, तहसील घरघोड़ा क्षेत्र में प्रस्तावित विशाल इस्पात एवं विद्युत परियोजना ने नए और गंभीर पर्यावरणीय सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रस्तावित परियोजना के पर्यावरण प्रभाव आकलन दस्तावेजों में दर्ज दूरियां और आंकड़े बताते हैं कि परियोजना क्षेत्र के आसपास आबादी, वन क्षेत्र और प्राकृतिक जलस्रोतों की वास्तविक स्थिति का अत्यंत सूक्ष्म एवं स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है। ऐसे समय में जब रायगढ़ पहले से अनेक औद्योगिक इकाइयों के कारण पर्यावरणीय दबाव झेल रहा है, एक और बहुआयामी भारी उद्योग की स्थापना से पहले यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि आखिर इस क्षेत्र की पर्यावरणीय वहन क्षमता कितनी बची है और क्या विकास की नई इमारत खड़ी करने से पहले आसपास की जमीन, जंगल, पानी और बसावट का पूरा सच सामने रखा गया है?
उपलब्ध पर्यावरण प्रभाव आकलन एवं कार्यपालक सारांश में दर्ज तथ्यों के अनुसार परियोजना स्थल के निकट डंगनीनार ग्राम की कुछ दुकानें मात्र 0.04 किलोमीटर अर्थात लगभग 40 मीटर की दूरी पर, वन क्षेत्र लगभग 0.08 किलोमीटर अर्थात केवल 80 मीटर, चारमार ग्राम लगभग 0.52 किलोमीटर तथा छिनी नाला लगभग 0.70 किलोमीटर की दूरी पर बताया गया है। ये आंकड़े अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इतनी निकटता वाले क्षेत्र में केवल कागज पर दर्ज दूरी को अंतिम सत्य मान लेने के बजाय वास्तविक स्थल स्थिति का स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक हो जाता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि 40 मीटर दूर बताई गई दुकानें किस राजस्व ग्राम और बसावट का हिस्सा हैं, आसपास वास्तविक आबादी की सीमा कहां तक फैली हुई है और प्रस्तावित परियोजना के 500 मीटर के दायरे में वास्तव में कितने मकान, दुकानें और अन्य सार्वजनिक या सामाजिक संस्थान मौजूद हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से यह मामला इसलिए भी अत्यंत गंभीर है क्योंकि प्रस्तावित बी. एस. स्पंज परियोजना केवल एक सीमित औद्योगिक इकाई नहीं है। दस्तावेजों के अनुसार इसमें स्पंज आयरन निर्माण भट्टियां, प्रेरण भट्टियां, विद्युत आर्क भट्टियां, रोलिंग मिल, कोयला धुलाई संयंत्र, लौह मिश्रधातु इकाई, सिंटर संयंत्र तथा अन्य औद्योगिक इकाइयों के साथ बड़े पैमाने पर विद्युत उत्पादन की व्यवस्था प्रस्तावित है। इतनी बड़ी और बहुआयामी परियोजना का प्रभाव केवल मुख्य संयंत्र की चारदीवारी तक सीमित नहीं माना जा सकता। कच्चे माल का विशाल भंडारण, कोयला प्रबंधन, परिवहन पट्टियां, सड़क परिवहन, राख प्रबंधन, धुआं उत्सर्जन चिमनियां, अपशिष्ट भंडारण, जल आपूर्ति और अन्य सहायक औद्योगिक गतिविधियां भी आसपास के पर्यावरण पर प्रभाव डालने की क्षमता रखती हैं। ऐसे में परियोजना के आसपास की दूरी केवल मुख्य संयंत्र भवन से मापना पर्याप्त होगा या प्रत्येक प्रस्तावित औद्योगिक घटक की सीमा से वास्तविक पर्यावरणीय और सामाजिक स्थिति का परीक्षण किया जाना चाहिए, यह बड़ा प्रश्न है।

67 लाख लीटर पानी प्रतिदिन: रायगढ़ के जल संसाधनों पर कितना बढ़ेगा दबाव?

प्रस्तावित परियोजना से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय पहलू पानी का है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार परियोजना की कुल जल आवश्यकता 6,716 हजार लीटर प्रतिदिन अर्थात लगभग 67 लाख 16 हजार लीटर प्रतिदिन बताई गई है। यह मात्रा किसी छोटे औद्योगिक संयंत्र की नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर संचालित होने वाली औद्योगिक गतिविधि की ओर संकेत करती है। परियोजना के लिए पानी छिनी नाला अथवा संबंधित जल स्रोत से प्राप्त करने का प्रस्ताव दर्शाया गया है और जल संसाधन विभाग से अनुमति की प्रक्रिया का उल्लेख है। ऐसी स्थिति में यह जानना अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि संबंधित जल स्रोत की वास्तविक क्षमता कितनी है, गर्मी के मौसम में उसका जलस्तर और प्रवाह क्या रहता है, मानसून के दौरान उसका प्राकृतिक मार्ग कैसा है तथा प्रस्तावित जल दोहन का आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों, कृषि और प्राकृतिक पारिस्थितिकी पर दीर्घकालिक प्रभाव क्या हो सकता है। छिनी नाला को परियोजना स्थल से लगभग 0.70 किलोमीटर की दूरी पर बताया गया है, लेकिन केवल दूरी बताना पर्याप्त नहीं है। नाले की वास्तविक सीमा, जलग्रहण क्षेत्र, प्राकृतिक जल निकासी, मानसून के दौरान जल प्रवाह, आसपास के तालाब, डबरी और अन्य जल स्रोतों की स्थिति का वास्तविक स्थल परीक्षण आवश्यक है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि परियोजना की भूमि अथवा उसके आसपास से कोई प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली गुजरती है या नहीं और औद्योगिक निर्माण के बाद प्राकृतिक जल प्रवाह की दिशा में कोई परिवर्तन तो नहीं होगा। विकास के नाम पर प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था में छोटा सा हस्तक्षेप भी भविष्य में बड़े जलभराव अथवा जल संकट का कारण बन सकता है।

12 लाख लीटर से अधिक अपशिष्ट जल का अनुमान, शून्य तरल अपशिष्ट व्यवस्था की वास्तविक प्रभावशीलता भी अहम

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार परियोजना से कुल लगभग 1,228 हजार लीटर प्रतिदिन अपशिष्ट जल उत्पन्न होने का अनुमान है। अर्थात प्रतिदिन 12 लाख लीटर से अधिक औद्योगिक अपशिष्ट जल के प्रबंधन का प्रश्न भी परियोजना के पर्यावरणीय मूल्यांकन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दस्तावेजों में विभिन्न इकाइयों के अपशिष्ट जल के उपचार, पुनर्चक्रण, अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र तथा शून्य तरल अपशिष्ट व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। तकनीकी रूप से ऐसी व्यवस्थाएं पर्यावरणीय जोखिम को कम करने के उद्देश्य से प्रस्तावित की जाती हैं, लेकिन जनहित का सवाल यह है कि प्रस्तावित व्यवस्था की वास्तविक क्षमता क्या होगी, विभिन्न इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट की प्रकृति क्या होगी और संयंत्र की दीर्घकालिक संचालन अवधि में इन प्रणालियों की निगरानी एवं प्रभावी अनुपालन किस प्रकार सुनिश्चित किया जाएगा। रायगढ़ जैसे पहले से औद्योगिक दबाव वाले जिले में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं हो सकता कि अपशिष्ट जल का उपचार किया जाएगा। वास्तविक सवाल यह भी है कि उपचार संयंत्र की क्षमता, उसके नियमित संचालन, तकनीकी खराबी की स्थिति, निगरानी व्यवस्था और दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों को किस स्तर पर सार्वजनिक निगरानी के दायरे में रखा जाएगा। क्योंकि कागज पर शून्य तरल अपशिष्ट व्यवस्था और जमीन पर उसका लगातार प्रभावी संचालन, दोनों अलग-अलग प्रश्न हैं।

40 मीटर की दूरी ने खड़े किए सबसे गंभीर सवाल

पूरे मामले में सबसे संवेदनशील तथ्य परियोजना स्थल से लगभग 40 मीटर की दूरी पर दुकानें होने का उल्लेख है। यदि यह दूरी वास्तविक स्थल स्थिति में भी इसी प्रकार पाई जाती है तो निकटवर्ती क्षेत्र की सामाजिक और मानवीय गतिविधियों का सूक्ष्म सर्वेक्षण अत्यंत आवश्यक हो जाता है। सवाल यह है कि इन दुकानों के पीछे अथवा आसपास आवासीय बसावट कहां तक फैली हुई है, स्थानीय लोगों का दैनिक आवागमन किस प्रकार होता है और प्रस्तावित औद्योगिक गतिविधियों के संभावित प्रभाव क्षेत्र में कौन-कौन से सामाजिक संस्थान आते हैं। इसी प्रकार लगभग 80 मीटर की दूरी पर वन क्षेत्र का उल्लेख भी स्वतंत्र सत्यापन की आवश्यकता को मजबूत करता है। वन क्षेत्र की वास्तविक सीमा, उसका राजस्व एवं वन अभिलेखों में दर्ज स्वरूप और आसपास के जैविक संसाधनों की स्थिति का संयुक्त परीक्षण किए बिना केवल दूरी के आंकड़े के आधार पर पर्यावरणीय संवेदनशीलता का निष्कर्ष निकालना कठिन हो सकता है। यह जांच आवश्यक है कि परियोजना के आसपास मौजूद वन क्षेत्र केवल मानचित्र पर अंकित भूखंड है या स्थानीय पारिस्थितिकी, वन्यजीवों और प्राकृतिक हरित आवरण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सिर्फ 10 किलोमीटर का अध्ययन नहीं, पहले 500 मीटर का पूरा सच सामने आना चाहिए

पर्यावरण प्रभाव आकलन में 10 किलोमीटर के दायरे में आधारभूत पर्यावरणीय अध्ययन का उल्लेख है, लेकिन परियोजना के सबसे निकट स्थित क्षेत्र की वास्तविक स्थिति अलग महत्व रखती है। किसी भी बड़े उद्योग का सर्वाधिक प्रत्यक्ष प्रभाव उसके आसपास के क्षेत्रों पर पड़ने की संभावना रहती है। इसलिए 0 से 500 मीटर, 500 मीटर से 1 किलोमीटर और 1 से 2 किलोमीटर के दायरे में मौजूद सभी पर्यावरणीय एवं सामाजिक विशेषताओं का पृथक-पृथक नक्शा तैयार किया जाना जनहित में आवश्यक प्रतीत होता है। इस सूक्ष्म सर्वेक्षण में ग्राम आबादी, मकान, दुकानें, विद्यालय, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, पंचायत भवन, धार्मिक स्थल, सार्वजनिक उपयोग के स्थान, तालाब, डबरी, कुएं, नाले, प्राकृतिक जल निकासी, नदी, वन क्षेत्र और अन्य संवेदनशील स्थानों की वास्तविक स्थिति भौगोलिक निर्देशांक आधारित सर्वेक्षण के माध्यम से सामने आनी चाहिए। केवल इतना बताना पर्याप्त नहीं है कि कोई गांव अथवा जलस्रोत कितनी दूरी पर है। वास्तविक प्रश्न यह है कि परियोजना की सीमा और स्थानीय जनजीवन के बीच वास्तविक भौगोलिक संबंध क्या है।

मंदिर, देवगुड़ी और सांस्कृतिक स्थलों का भी स्वतंत्र सत्यापन जरूरी

औद्योगिक परियोजनाओं के पर्यावरणीय मूल्यांकन में केवल हवा, पानी और मिट्टी ही महत्वपूर्ण नहीं होते। स्थानीय समुदायों के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्थल भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। परियोजना क्षेत्र के आसपास मंदिर, देवगुड़ी, सामुदायिक स्थल, मड़ई स्थल, पुरानी समाधियां, स्मारक अथवा स्थानीय आस्था से जुड़े प्राकृतिक स्थान मौजूद हैं या नहीं, इसकी स्वतंत्र जांच भी आवश्यक है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐसे स्थल होते हैं जो बड़े सरकारी अभिलेखों या डिजिटल मानचित्रों में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं होते, लेकिन स्थानीय समुदायों के लिए उनका सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा होता है। इसलिए केवल व्यापक क्षेत्र के आंकड़ों के आधार पर किसी सांस्कृतिक अथवा ऐतिहासिक विशेषता के अभाव का निष्कर्ष निकालने के बजाय राजस्व अभिलेखों, स्थानीय निकायों और संबंधित विभागों के माध्यम से स्वतंत्र सत्यापन किया जाना चाहिए।

जनसुनवाई औपचारिकता नहीं, जनता को पूरा सच जानने का अधिकार

पर्यावरणीय जनसुनवाई का मूल उद्देश्य केवल निर्धारित तिथि पर लोगों को एकत्र कर उनकी राय दर्ज करना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य प्रभावित क्षेत्र की जनता को परियोजना के संभावित प्रभावों की पर्याप्त और सही जानकारी उपलब्ध कराना है, ताकि स्थानीय लोग पूरी जानकारी के आधार पर अपने प्रश्न, सुझाव और आपत्तियां रख सकें। यदि जनसुनवाई से पहले परियोजना के आसपास की वास्तविक आबादी, जलस्रोत, वन सीमा, सामाजिक संस्थान और सांस्कृतिक स्थल ही पूरी तरह स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हैं, तो जनभागीदारी की प्रक्रिया कितनी प्रभावी होगी, यह गंभीर प्रश्न है। ऐसी स्थिति में परियोजना के प्रत्येक प्रस्तावित घटक की सीमा से कम से कम 500 मीटर तक का भौगोलिक सूचना प्रणाली आधारित एवं राजस्व अभिलेखों से प्रमाणित परिधि मानचित्र तैयार किया जाना चाहिए। इस मानचित्र में सभी संवेदनशील स्थलों को स्पष्ट रूप से दर्शाया जाना चाहिए और स्थल निरीक्षण की रिपोर्ट, वास्तविक भौगोलिक निर्देशांक तथा फोटोग्राफ सार्वजनिक किए जाने चाहिए। इससे न केवल पर्यावरणीय प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी बल्कि भविष्य में तथ्यों को लेकर विवाद की स्थिति भी कम होगी।

रायगढ़ के सामने असली सवाल: विकास की सीमा कौन तय करेगा?

रायगढ़ में उद्योगों का विकास कोई नई बात नहीं है। जिले की पहचान देश के महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों में होती है और उद्योग रोजगार एवं आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं। लेकिन इसके साथ दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब किसी क्षेत्र में लगातार नए उद्योग स्थापित होते हैं तो प्रश्न केवल प्रत्येक उद्योग के व्यक्तिगत उत्सर्जन मानकों का नहीं रहता, बल्कि सभी औद्योगिक गतिविधियों के संयुक्त प्रभाव का हो जाता है। रायगढ़ की हवा पर पहले से मौजूद औद्योगिक दबाव, जल संसाधनों की सीमित क्षमता और प्राकृतिक क्षेत्रों के संरक्षण की चुनौती के बीच एक और विशाल इस्पात एवं विद्युत परियोजना की स्थापना से पहले यह जानना आवश्यक है कि क्षेत्र की संयुक्त पर्यावरणीय वहन क्षमता कितनी है। क्या किसी नए उद्योग को मंजूरी देने से पहले यह व्यापक रूप से आकलन किया जा रहा है कि पहले से संचालित औद्योगिक इकाइयों के साथ मिलकर नया संयंत्र हवा, पानी, भूमि और स्थानीय जीवन पर कितना अतिरिक्त दबाव डालेगा?

बी. एस. स्पंज परियोजना से जुड़े वे तथ्य जिन पर चाहिए स्पष्ट जवाब

परियोजना के आसपास की संवेदनशीलता को लेकर उपलब्ध पर्यावरण प्रभाव आकलन में डंगनीनार की कुछ दुकानें लगभग 40 मीटर और वन क्षेत्र लगभग 80 मीटर दूरी पर दर्शाया गया है। इन दूरियों और वास्तविक स्थल सीमा का स्वतंत्र भौगोलिक एवं राजस्व सर्वे आवश्यक है। परियोजना के लिए 6,716 हजार लीटर प्रतिदिन अर्थात लगभग 67 लाख 16 हजार लीटर पानी की आवश्यकता बताई गई है। जल स्रोत की क्षमता और स्थानीय जल संसाधनों पर प्रभाव का विस्तृत स्वतंत्र परीक्षण महत्वपूर्ण है। लगभग 1,228 हजार लीटर प्रतिदिन अपशिष्ट जल उत्पादन का अनुमान दर्शाया गया है। अपशिष्ट जल उपचार, पुनर्चक्रण और शून्य तरल अपशिष्ट व्यवस्था की दीर्घकालिक प्रभावशीलता एवं निगरानी महत्वपूर्ण प्रश्न है। परियोजना के आसपास वन क्षेत्र और छिनी नाला जैसे प्राकृतिक संसाधनों का उल्लेख है। उनकी वास्तविक सीमा, पारिस्थितिक महत्व और संभावित प्रभाव क्षेत्र का स्वतंत्र सर्वे आवश्यक है। 500 मीटर के भीतर वास्तविक आबादी, मकान, स्कूल, आंगनबाड़ी, धार्मिक एवं सार्वजनिक स्थलों का भौगोलिक निर्देशांक आधारित मानचित्र सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

पहले जमीन का सच या पहले औपचारिकता?

बी. एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड की प्रस्तावित परियोजना अब केवल एक नए औद्योगिक निवेश का विषय नहीं रह गई है। उपलब्ध पर्यावरणीय दस्तावेजों में दर्ज 40 मीटर, 80 मीटर और अन्य निकटवर्ती दूरियों ने यह आवश्यक प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या परियोजना क्षेत्र की वास्तविक स्थिति का पर्याप्त स्वतंत्र सत्यापन हो चुका है। यदि सभी तथ्य और दूरियां सही हैं तो स्वतंत्र संयुक्त भौगोलिक एवं राजस्व सर्वेक्षण से उनकी पुष्टि होने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि वास्तविक स्थल स्थिति और दस्तावेजों में दर्ज तथ्यों के बीच कोई महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है तो जनता को इसकी जानकारी जनसुनवाई से पहले मिलनी चाहिए।
रायगढ़ को उद्योग चाहिए, रोजगार चाहिए और विकास भी चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास की कीमत हवा, पानी, जंगल और आने वाली पीढ़ियों की सेहत से तय की जाएगी? बी. एस. स्पंज की इस विशाल परियोजना पर अंतिम निर्णय से पहले टेंडा-चारमार क्षेत्र की जमीन का पूरा सच सामने आना जरूरी है। क्योंकि एक बार चिमनियां खड़ी हो जाने के बाद सवाल पूछने से बेहतर है कि चिमनियां उठने से पहले हर पर्यावरणीय तथ्य की निष्पक्ष जांच कर ली जाए।

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