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राष्ट्रपति पुरस्कार, कंधे पर सत्ता का गमछा और सरकारी जमीन का सवाल!

सम्बलपुरी में ‘बड़े झाड़ जंगल’ की जमीन पर सवालों का जंगल, दीपक डोरा की भूमिका चर्चा में, एसडीएम ने थमाया नोटिस

आवंटित जमीन की खरीद-बिक्री से लेकर 30 से अधिक पेड़ों की कथित कटाई तक जांच का दायरा बढ़ा, डोरा की बालाजी बिल्डकॉन समेत पांच नोटिसियों से 28 अक्टूबर को जवाब तलब

डमरूआ न्यूज़ /रायगढ़। शहर में रसूख की अपनी अलग परिभाषा है। किसी के पास दौलत है, किसी के पास सियासी पहुंच और किसी के नाम के साथ सम्मान का तमगा जुड़ा है। लेकिन जब सवाल सरकारी जमीन, राजस्व अभिलेखों और पर्यावरण से जुड़े नियमों का हो, तो असली कसौटी एक ही होनी चाहिए—कागजात क्या कहते हैं और कानून क्या अनुमति देता है? रायगढ़ के सम्बलपुरी में खसरा नंबर 251 से जुड़ा मामला अब इसी कसौटी पर खड़ा नजर आ रहा है। एक ओर सरकारी अभिलेख में ‘बड़े झाड़ जंगल’ मद की भूमि दर्ज होने का उल्लेख है, दूसरी ओर उसी मूल खसरे से निकले भूखंडों की खरीद-बिक्री और उन पर खड़े 30 से अधिक बहुमूल्य प्राकृतिक वृक्षों की कथित अनधिकृत कटाई का मामला सामने आया है। अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), रायगढ़ ने 21 अक्टूबर 2026 को पांच नोटिसियों को नोटिस जारी कर 28 अक्टूबर को सुबह 11 बजे दस्तावेजों सहित उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। इस प्रकरण में दीपक कुमार डोरा की भूमिका को लेकर शहर में चर्चाएं तेज हैं। डोरा को नेत्रदान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने की बात भी चर्चा में है। वहीं, उन्हें रायगढ़ के विधायक एवं मंत्री ओपी चौधरी के साथ सार्वजनिक रूप से घूमते-फिरते देखे जाने की चर्चा के बीच राजनीतिक गलियारों में भी इस प्रकरण को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, किसी के साथ दिखाई देना अपने आप में किसी की संलिप्तता या संरक्षण का प्रमाण नहीं है और न ही राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने से किसी व्यक्ति के विरुद्ध लगाए गए आरोप स्वतः सिद्ध हो जाते हैं। फिलहाल यह जांच का विषय है कि जमीन के अंतरण और वृक्षों की कटाई में किसकी क्या भूमिका रही तथा संबंधित अनुमतियां मौजूद हैं या नहीं।

‘बड़े झाड़ जंगल’ से बिल्डकॉन तक: जमीन के कागजों में आखिर कौन-सी कड़ी छूटी?

एसडीएम कार्यालय के नोटिस में दर्ज तथ्यों के अनुसार, ग्राम सम्बलपुरी स्थित मूल खसरा नंबर 251 का रकबा 8.79 एकड़ बताया गया है और अधिकार अभिलेख में इसे बड़े झाड़ जंगल मद की शासकीय भूमि के रूप में दर्ज होने का उल्लेख है। इसी अभिलेख की प्रविष्टि क्रमांक 89 के अनुसार, खसरा नंबर 251 के अंश खसरा नंबर 251/2, रकबा 2.023 हेक्टेयर, के संबंध में राजस्व प्रकरण क्रमांक 57/1-19/1981-82 में 8 फरवरी 1982 को मंगल सिंह के पक्ष में शासकीय पट्टा जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। नोटिस के मुताबिक, इसके बाद भूमि के हिस्सों का पंजीकृत विक्रय विलेखों के जरिए अंतरण हुआ। 2 जुलाई 1995 को 0.809 हेक्टेयर भूमि का विक्रय पार्वती देवी के पक्ष में होने तथा आगे लेखा लाठ और प्रद्युम कुमार लाठ के माध्यम से भूमि के अंतरण की जानकारी दर्ज है। 14 नवंबर 2022 के पंजीकृत विक्रय विलेख के तहत खसरा नंबर 251/2 के 1.213 हेक्टेयर, खसरा नंबर 251/3 के 0.405 हेक्टेयर और खसरा नंबर 251/4 के 0.202 हेक्टेयर भूखंड बालाजी बिल्डकॉन, रायगढ़ के पक्ष में अंतरित किए जाने का उल्लेख है। वर्तमान राजस्व अभिलेखों में ये भूखंड बालाजी बिल्डकॉन के नाम दर्ज बताए गए हैं। यहीं से सबसे अहम सवाल उठता है कि यदि जमीन वास्तव में शासकीय पट्टे से प्राप्त थी, तो उसके प्रत्येक अंतरण के लिए आवश्यक सक्षम प्राधिकारी की अनुमति कहां है? क्या मूल पट्टे की शर्तों का पालन हुआ? क्या जमीन के मूल स्वरूप और दर्ज मद के संबंध में सभी आवश्यक वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी की गईं? इन सवालों का उत्तर केवल रजिस्ट्री या नामांतरण की प्रविष्टि से नहीं, बल्कि मूल पट्टा, सक्षम प्राधिकारी की अनुमति और संबंधित राजस्व अभिलेखों के परीक्षण से ही मिलेगा।

30 से अधिक पेड़ कटे? अब लकड़ी नहीं, अनुमति के कागज बोलेंगे!

नायब तहसीलदार की जांच रिपोर्ट के हवाले से एसडीएम के नोटिस में प्रश्नाधीन भूखंडों पर 30 से अधिक बहुमूल्य एवं महत्वपूर्ण प्रजातियों के प्राकृतिक वृक्षों को सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना काटे जाने का उल्लेख किया गया है। यह फिलहाल जांच प्रतिवेदन में दर्ज आरोप है, अंतिम निष्कर्ष नहीं। लेकिन यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो मामला केवल पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं रहेगा; तब यह भी जांचना होगा कि वृक्षों की अनुमति किसने दी, किस आधार पर दी और क्या निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया। विकास के नाम पर जमीन का उपयोग बदलना हो या व्यावसायिक परियोजना के लिए भूखंड तैयार करना, नियमों की अनदेखी की छूट किसी को नहीं मिल सकती। आखिरकार पेड़ काटने के बाद अनुमति के कागज तलाशना और पहले अनुमति लेकर काम करना—दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।

डोरा की भूमिका पर चर्चा, ओपी चौधरी की साख पर भी निगाहें

दीपक कुमार डोरा का नाम इस मामले में इसलिए चर्चा के केंद्र में है क्योंकि नोटिस में बालाजी बिल्डकॉन की ओर से भागीदार दीपक कुमार अग्रवाल का उल्लेख है, जबकि डोरा की भूमिका को लेकर शहर में अलग से चर्चाएं हो रही हैं। इन दोनों नामों और भूमिकाओं को बिना दस्तावेजी पुष्टि के एक मान लेना उचित नहीं होगा। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि जमीन के सौदे, निर्माण संबंधी गतिविधियों और कथित वृक्ष कटाई में किन व्यक्तियों ने क्या भूमिका निभाई। नेत्रदान जैसे सामाजिक कार्य के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार मिलना सम्मान की बात है। लेकिन सामाजिक सम्मान और कानूनी जवाबदेही दो अलग-अलग विषय हैं। यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई आरोप सामने आता है, तो उसकी जांच निष्पक्ष होनी चाहिए—न पुरस्कार जांच को रोक सकता है, न किसी प्रभावशाली व्यक्ति से निकटता किसी को दोषी सिद्ध कर सकती है।

एसडीएम ने मांगे तीन अहम दस्तावेज, पांच नोटिसियों को तलब किया

21 अक्टूबर 2026 को जारी नोटिस में मंगल सिंह, पार्वती देवी, लेखा लाठ, प्रद्युम कुमार लाठ और बालाजी बिल्डकॉन, रायगढ़ को 28 अक्टूबर 2026 को सुबह 11 बजे एसडीएम कार्यालय में लिखित स्पष्टीकरण सहित उपस्थित होने के निर्देश दिए गए हैं। प्रशासन ने मुख्य रूप से तीन प्रकार के दस्तावेज मांगे हैं—पहला, मूल खसरा नंबर 251 की शासकीय भूमि से संबंधित भूखंडों के निजी हक में अंतरण के आधार और समस्त अभिलेख; दूसरा, संबंधित भूखंडों की बिक्री के लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी अनुमति आदेश; और तीसरा, 30 से अधिक वृक्षों की कटाई के संबंध में एसडीएम (राजस्व), रायगढ़ से प्राप्त अनुमति की प्रति। नोटिस में यह भी कहा गया है कि निर्धारित तिथि पर अनुपस्थित रहने, जवाब या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करने अथवा असंतोषजनक जवाब देने की स्थिति में छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 के तहत वैधानिक कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही, तहसीलदार रायगढ़ से संबंधित विक्रय विलेखों के समय की बिक्री नकल उपलब्ध कराने वाले पटवारियों तथा नामांतरण आदेश पारित करने वाले तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों की पदस्थापना संबंधी जानकारी भी मांगी गई है। इससे स्पष्ट है कि जांच का दायरा केवल वर्तमान भू-स्वामी तक सीमित नहीं, बल्कि जमीन के अंतरण और राजस्व अभिलेखों से जुड़ी प्रक्रिया तक जा सकता है।

कानून के सामने न धन्नासेठ बड़ा, न पुरस्कार की ढाल!

यदि सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना प्रतिबंधित या शर्तबद्ध भूमि का अंतरण हुआ है, तो संबंधित कानून के अनुसार उसकी जांच और कार्रवाई होनी चाहिए। यदि वृक्षों की कटाई बिना जरूरी अनुमति हुई है, तो उसके लिए जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। और यदि सभी अनुमतियां विधिवत मौजूद हैं, तो संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। न पुरस्कार दोषमुक्ति का प्रमाणपत्र है, न मंत्री से नजदीकी अपराध का सबूत और न दौलत कानून से ऊपर होने का लाइसेंस।

अब जांच बताएगी—गड़बड़ी जमीन में है या कागजों में?

इस मामले में अभी जांच जारी है। पांचों नोटिसियों का पक्ष, मूल पट्टे की शर्तें, सक्षम प्राधिकारी की अनुमतियां, राजस्व अभिलेखों की शुद्धता और कथित वृक्ष कटाई के तथ्य सामने आने के बाद ही जिम्मेदारी तय की जा सकेगी। यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो कार्रवाई बिना किसी दबाव के होनी चाहिए; और यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो किसी की प्रतिष्ठा को अनावश्यक नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना या उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को प्रभावित करना नहीं, बल्कि सरकारी भूमि, पर्यावरण और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े गंभीर सवालों को सार्वजनिक विमर्श में लाना है। क्योंकि कानून की असली परीक्षा तब नहीं होती जब सामने कोई कमजोर व्यक्ति हो उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब सवाल रसूख, संपत्ति और प्रभावशाली संपर्कों से जुड़े लोगों पर उठते हैं।

ग्रामीणों की शिकायतों पर कुंभकर्णी नींद, कलेक्टर की कथित फटकार के बाद प्रशासन में हलचल!

सरकारी जमीन पर कथित अनियमितता के आरोप हों, प्राकृतिक पेड़ों की कटाई का मामला हो या आवंटित भूमि के व्यावसायिक उपयोग का सवाल—प्रशासन की जिम्मेदारी शिकायत सामने आते ही तथ्यों की जांच करना और नियमानुसार कार्रवाई करना है। लेकिन रायगढ़ के सम्बलपुरी में खसरा नंबर 251 से जुड़े मामले में ग्रामीणों की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों और अब हुई प्रशासनिक कार्रवाई के बीच का घटनाक्रम कई सवाल खड़े कर रहा है। ग्रामीणों की शिकायतों के बावजूद यदि कार्रवाई समय पर नहीं हुई, तो इसकी वजह क्या थी? और यदि अब प्रशासन अचानक सक्रिय हुआ है, तो क्या यह सक्रियता पहले से लंबित शिकायतों का परिणाम है या हाल में पैदा हुए किसी प्रशासनिक दबाव का? इस पूरे मामले में चर्चा है कि कलेक्टर की कथित फटकार के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ी और इसके ठीक बाद 21 अक्टूबर 2026 को अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), रायगढ़ की ओर से पांच नोटिसियों को नोटिस जारी कर दिया गया। यह घटनाक्रम अपने आप में जांच का विषय है। हालांकि, कलेक्टर द्वारा फटकार लगाए जाने अथवा किसी विशेष व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई का निर्देश दिए जाने की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं है। इसलिए इन चर्चाओं को स्थापित तथ्य मानने के बजाय संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर परखना जरूरी है।

लंबे समय तक शिकायतें दबी रहीं, ग्रामीणों की आवाज पर प्रशासन मौन क्यों रहा…

ग्रामीणों के अनुसार, सम्बलपुरी की संबंधित जमीन को लेकर वे लंबे समय से अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) और वन विभाग के समक्ष शिकायतें प्रस्तुत करते रहे हैं। शिकायतों में कथित तौर पर आवंटित भूमि के व्यावसायिक उपयोग, प्राकृतिक वृक्षों की अनधिकृत कटाई और संबंधित गतिविधियों पर आपत्ति जताई गई थी। ग्रामीणों ने इस विषय को ग्रामसभा में भी उठाया और संबंधित गतिविधियों के विरोध में प्रस्ताव पारित किए जाने की बात कही है। यदि ग्रामीणों की शिकायतें और ग्रामसभा का प्रस्ताव आधिकारिक अभिलेखों से प्रमाणित होते हैं, तो प्रशासन के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है—शिकायतें मिलने के बाद जांच कब शुरू हुई, मौके का निरीक्षण किसने किया और कार्रवाई की स्थिति क्या रही? क्या शिकायतों पर समयबद्ध जांच हुई थी या फाइलें दफ्तरों में घूमती रहीं? यदि शिकायतें लंबे समय तक लंबित रहीं, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा होनी चाहिए। ग्रामसभा का प्रस्ताव अपने आप में भूमि के स्वामित्व या किसी व्यक्ति के दोष का अंतिम न्यायिक प्रमाण नहीं है। लेकिन यदि ग्रामसभा ने संबंधित गतिविधियों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की थी, तो उस प्रस्ताव और उससे जुड़ी शिकायतों को प्रशासनिक जांच में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। ग्रामीणों की शिकायतें पुरानी और प्रशासनिक कार्रवाई नई है, तो यह भी जांच का विषय है कि बीच के समय में जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या किया।

कलेक्टर की कथित फटकार के बाद ही क्यों जागा प्रशासन?

शहर में चर्चा है कि मामले की गंभीरता कलेक्टर तक पहुंचने और कथित फटकार के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हुई। इसके तुरंत बाद 21 अक्टूबर 2026 को एसडीएम कार्यालय से नोटिस जारी होने को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या पहले से लंबित शिकायतों पर कार्रवाई के लिए किसी उच्चस्तरीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ गई थी? यदि शिकायतें पहले ही संबंधित कार्यालयों तक पहुंच चुकी थीं, तो प्रशासनिक कार्रवाई का आधार शिकायतों में दर्ज तथ्य और कानून होना चाहिए था। किसी वरिष्ठ अधिकारी की नाराजगी के बाद कार्रवाई शुरू होना अपने आप में अनुचित साबित नहीं होता, लेकिन इससे पहले शिकायतों पर हुई कार्रवाई और देरी के कारणों की समीक्षा करने की जरूरत जरूर पैदा होती है। इसी संदर्भ में राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि रायगढ़ के विधायक एवं राजस्व मंत्री ओपी चौधरी तक मामले की जानकारी पहुंचने के बाद कलेक्टर को कथित तौर पर संकेत दिए गए कि संबंधित मामले में सख्ती बरती जाए। हालांकि, इस कथित निर्देश की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि नोटिस जारी करने का आधार क्या था, शिकायतें कब प्राप्त हुई थीं और जांच की प्रक्रिया किस तारीख से आगे बढ़ी। यदि कार्रवाई शिकायतों के आधार पर हुई है, तो प्रशासन को उसका रिकॉर्ड सामने रखने में संकोच नहीं होना चाहिए। और यदि कार्रवाई में देरी हुई है, तो उस देरी का हिसाब भी होना चाहिए।

‘बड़े झाड़ जंगल’ की जमीन से बालाजी बिल्डकॉन तक कैसे पहुंचे भूखंड?

एसडीएम के 21 अक्टूबर 2026 के नोटिस में दर्ज तथ्यों के अनुसार, ग्राम सम्बलपुरी स्थित मूल खसरा नंबर 251 का रकबा 8.79 एकड़ है और अधिकार अभिलेख में इसे बड़े झाड़ जंगल मद की शासकीय भूमि के रूप में दर्ज होने का उल्लेख किया गया है। नोटिस के अनुसार, अधिकार अभिलेख की प्रविष्टि क्रमांक 89 में खसरा नंबर 251 के अंश खसरा नंबर 251/2, रकबा 2.023 हेक्टेयर, के संबंध में राजस्व प्रकरण क्रमांक 57/1-19/1981-82 में 8 फरवरी 1982 को मंगल सिंह पिता भुजबल के पक्ष में शासकीय पट्टा जारी होने की जानकारी दर्ज है। इसके बाद 2 जुलाई 1995 को 0.809 हेक्टेयर भूमि का पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से पार्वती देवी के पक्ष में अंतरण हुआ। आगे भूमि के अंतरण की कड़ियों में लेखा लाठ और प्रद्युम कुमार लाठ के नाम सामने आए। नोटिस में 14 नवंबर 2022 के पंजीकृत विक्रय विलेख के तहत खसरा नंबर 251/2 के 1.213 हेक्टेयर, खसरा नंबर 251/3 के 0.405 हेक्टेयर और खसरा नंबर 251/4 के 0.202 हेक्टेयर भूखंड बालाजी बिल्डकॉन, रायगढ़ के पक्ष में अंतरित किए जाने का उल्लेख है। वर्तमान राजस्व अभिलेखों में ये भूखंड बालाजी बिल्डकॉन के नाम दर्ज बताए गए हैं। अब प्रशासन को यह जांचना है कि मूल पट्टे की शर्तें क्या थीं, संबंधित भूमि के अंतरण के लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति ली गई थी या नहीं और नामांतरण की प्रक्रिया नियमानुसार पूरी हुई थी या नहीं। केवल विक्रय विलेख और नामांतरण प्रविष्टि के आधार पर सभी कानूनी प्रश्नों का समाधान नहीं हो सकता। मूल पट्टा, सक्षम प्राधिकारी के आदेश और संबंधित राजस्व अभिलेखों का परीक्षण ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट करेगा।

30 से अधिक पेड़ों की कथित कटाई: अनुमति के दस्तावेज कहां हैं?

नायब तहसीलदार की जांच रिपोर्ट के हवाले से एसडीएम के नोटिस में प्रश्नाधीन भूखंडों पर 30 से अधिक बहुमूल्य एवं महत्वपूर्ण प्रजातियों के प्राकृतिक वृक्षों को सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना काटे जाने का उल्लेख किया गया है। यह फिलहाल जांच प्रतिवेदन में दर्ज आरोप है, अंतिम निष्कर्ष नहीं।यदि वृक्ष कटाई बिना आवश्यक अनुमति के हुई है, तो संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और लागू कानूनों के तहत संभावित कार्रवाई की जांच होनी चाहिए। यदि अनुमति ली गई थी, तो उसके आदेश, शर्तें और अनुपालन की स्थिति सामने आनी चाहिए। ग्रामीणों की शिकायतों में कथित वृक्ष कटाई और भूमि के व्यावसायिक उपयोग का विषय भी शामिल होने की बात कही जा रही है। ऐसे में जांच केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि पेड़ काटे गए या नहीं, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि किसने कटाई कराई, किस उद्देश्य से कराई, भूमि के उपयोग की अनुमति क्या थी और संबंधित अधिकारियों ने पहले की शिकायतों पर क्या कार्रवाई की।

पुराने पटवारी और राजस्व अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में

एसडीएम ने तहसीलदार रायगढ़ से निर्देशित किया है कि संबंधित विक्रय विलेखों के समय बिक्री नकल उपलब्ध कराने वाले ग्राम पटवारियों तथा नामांतरण आदेश पारित करने वाले तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों की पदस्थापना संबंधी जानकारी उपलब्ध कराई जाए। यह निर्देश महत्वपूर्ण है, क्योंकि भूमि के अंतरण और नामांतरण की प्रक्रिया में केवल वर्तमान भू-स्वामी की भूमिका ही नहीं, बल्कि संबंधित समय पर उपलब्ध अभिलेखों और प्रशासनिक कार्यवाही की भी जांच आवश्यक हो सकती है। हालांकि, किसी अधिकारी का नाम फाइल में दर्ज होना या उसका उस समय पदस्थ होना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है। वास्तविक जिम्मेदारी दस्तावेजों, आदेशों और उस समय लागू नियमों की जांच के बाद ही निर्धारित की जा सकती है। यदि पहले की शिकायतें संबंधित कार्यालयों तक पहुंची थीं, तो यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उन पर कौन-सी कार्रवाई हुई, निरीक्षण कराया गया या नहीं और शिकायतों के निस्तारण में कितना समय लगा। इससे यह पता चल सकेगा कि वर्तमान कार्रवाई नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया का परिणाम है या पहले हुई देरी की समीक्षा की भी जरूरत है।

अब असली परीक्षा कि कार्रवाई कितनी पारदर्शी होती है?

21 अक्टूबर को नोटिस जारी होने के बाद अब संबंधित पक्षों को अपना जवाब और दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया है। इसके बाद प्रशासन को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करनी होगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि जांच केवल नोटिस जारी करने तक सीमित रहती है या शिकायतों के पुराने रिकॉर्ड, ग्रामसभा के प्रस्ताव, भूमि अंतरण की अनुमति, कथित वृक्ष कटाई और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी पूरी पड़ताल होती है या केवल कागजी खानापूर्ति होगी.

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