रायगढ़ की सांसों पर सबसे बड़ा संकट! शहर से महज 5 किलोमीटर दूर 50 मेगावाट पावर प्लांट और विशाल स्टील परियोजना की जनसुनवाई
तमनार, पूंजीपथरा के उद्योगों ने पहले ही जिले की आबोहवा को प्रभावित किया, अब रायगढ़ शहर की दहलीज पर स्टील प्लांट, डीआरआई, फेरो अलॉय और 50 मेगावाट कैप्टिव पावर प्लांट का प्रस्ताव; प्रतिदिन 31 लाख लीटर पानी की खपत और सालाना 20 लाख टन से अधिक कच्चे माल के उपयोग ने बढ़ाई चिंता
डमरूआ न्यूज़ /रायगढ़।
रायगढ़ शहर के पर्यावरणीय भविष्य को लेकर एक ऐसी जनसुनवाई होने जा रही है जो आने वाले वर्षों में इस पूरे क्षेत्र की दिशा और दशा तय कर सकती है। मेसर्स रुंगटा संस प्राइवेट लिमिटेड द्वारा गढ़उमरिया और दर्रामुड़ा क्षेत्र में प्रस्तावित एकीकृत इस्पात एवं फेरो अलॉय परियोजना के विस्तार के लिए पर्यावरणीय जनसुनवाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट के अनुसार यह परियोजना रायगढ़ शहर से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यही तथ्य आज शहरवासियों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि जिस प्रकार के भारी उद्योग यहां स्थापित किए जाने का प्रस्ताव है, उनका प्रभाव केवल परियोजना क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे शहरी क्षेत्र की वायु गुणवत्ता, जल संसाधनों और जनस्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।

उद्योग प्रबंधन कमाएगा अरबो रुपए और रायगढ़ की जनता को मिलेगा प्रदूषण का गिफ्ट
परियोजना दस्तावेजों के अनुसार वर्तमान फेरो अलॉय इकाई का विस्तार करते हुए यहां 2.145 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता का डीआरआई संयंत्र, 2.24 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता की स्टील मेल्टिंग शॉप, 2 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता की रोलिंग मिल, 42,900 टन प्रतिवर्ष फेरो अलॉय उत्पादन इकाई, सिंटर प्लांट, मेटल रिकवरी प्लांट, प्रोड्यूसर गैस संयंत्र और 50 मेगावाट क्षमता का कैप्टिव पावर प्लांट स्थापित किया जाएगा। वर्तमान 2.513 हेक्टेयर भूमि का विस्तार कर कुल 11.029 हेक्टेयर क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियां संचालित की जाएंगी। परियोजना की अनुमानित लागत 814.5 करोड़ रुपये बताई गई है।
बढ़ेगा वाहनों का दबाव और औद्योगिक प्रदूषण
पर्यावरणीय दस्तावेजों में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि संयंत्र को प्रतिदिन 3125 किलोलीटर अर्थात लगभग 31.25 लाख लीटर पानी की आवश्यकता होगी। यह मात्रा किसी छोटे नगर की दैनिक जल आवश्यकता के बराबर मानी जाती है। इसके अतिरिक्त परियोजना के लिए प्रतिवर्ष लगभग 20.1 लाख टन कच्चे माल और ईंधन की आवश्यकता होगी, जिसमें लौह अयस्क, कोयला, डोलोमाइट, चूना पत्थर और अन्य औद्योगिक सामग्री शामिल है। इतनी बड़ी मात्रा में कच्चे माल की लगातार आवाजाही से क्षेत्र में भारी वाहनों का दबाव बढ़ने, धूल प्रदूषण में वृद्धि होने तथा परिवहन संबंधी समस्याएं उत्पन्न होने की आशंका भी व्यक्त की जा रही है।
पहले से ही औद्योगिक दबाव झेल रहे रायगढ़ की निकल रही जान
रायगढ़ के पर्यावरण को लेकर चिंता इसलिए और गहरी हो जाती है क्योंकि जिला पहले से ही भारी औद्योगिक गतिविधियों का दबाव झेल रहा है। तमनार, पूंजीपथरा, घरघोड़ा और धर्मजयगढ़ क्षेत्रों में वर्षों से संचालित उद्योगों और ताप विद्युत संयंत्रों को लेकर समय-समय पर प्रदूषण संबंधी शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में शहर की सीमा से लगे क्षेत्र में एक और बड़े औद्योगिक परिसर की स्थापना को लेकर नागरिकों के बीच स्वाभाविक रूप से सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि दूरस्थ क्षेत्रों में स्थापित उद्योगों के प्रभावों की चर्चा वर्षों से होती रही है तो शहर से कुछ ही किलोमीटर दूर स्थापित होने वाले इस विशाल औद्योगिक परिसर के संभावित प्रभावों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
उद्योग एक दिन के लिए नहीं बल्कि सदैव के लिए स्थापित हो रहा है
परियोजना दस्तावेजों के अनुसार संयंत्र की कुल विद्युत आवश्यकता 62.57 मेगावाट होगी, जिसमें 50 मेगावाट का कैप्टिव पावर प्लांट स्वयं स्थापित किया जाएगा। यह तथ्य भी चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि पावर प्लांट, डीआरआई और स्टील उत्पादन इकाइयों को सामान्यतः प्रदूषण की दृष्टि से संवेदनशील औद्योगिक गतिविधियों की श्रेणी में रखा जाता है। पर्यावरणीय विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परियोजनाओं के प्रभावों का मूल्यांकन केवल कागजी प्रावधानों के आधार पर नहीं बल्कि दीर्घकालिक पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी दृष्टिकोण से भी किया जाना चाहिए।
….तो पीढ़ियां नहीं करेंगी माफ
इस परियोजना को लेकर अब जनसुनवाई का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है। पर्यावरणीय कानूनों के तहत जनसुनवाई वह मंच है जहां स्थानीय नागरिक, किसान, व्यापारी, विद्यार्थी, सामाजिक संगठन और जनप्रतिनिधि अपनी आपत्तियां, सुझाव और चिंताएं दर्ज करा सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का मानना है कि यह केवल एक औपचारिक सरकारी प्रक्रिया नहीं बल्कि रायगढ़ की आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य, स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल स्रोतों और पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ा विषय है।
औद्योगिक विकास शहर के भीतर होना खतरनाक
रायगढ़ के नागरिकों के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या शहर के इतने निकट इस प्रकार की विशाल औद्योगिक परियोजना स्थापित होने के संभावित प्रभावों पर पर्याप्त चर्चा हुई है। क्या प्रतिदिन लाखों लीटर पानी की आवश्यकता, भारी मात्रा में कोयला और लौह अयस्क की खपत, पावर प्लांट और स्टील इकाइयों के संचालन से उत्पन्न होने वाले संभावित प्रभावों का समुचित मूल्यांकन किया गया है। क्या भविष्य में शहर की वायु गुणवत्ता और जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को पर्याप्त महत्व दिया गया है। यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर जनसुनवाई के दौरान सामने आना आवश्यक है।
बाद में सिर्फ लकीर पीटने से कुछ हासिल नहीं होने वाला
रायगढ़ के पर्यावरणीय भविष्य को लेकर होने वाली यह जनसुनवाई अब केवल एक औद्योगिक परियोजना की स्वीकृति का मामला नहीं रह गई है। यह शहर की हवा, पानी, स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा विषय बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शहरवासी और आसपास के ग्रामीण इस मुद्दे पर कितना सक्रिय रुख अपनाते हैं और जनसुनवाई में उनके प्रश्नों तथा आपत्तियों का क्या जवाब दिया जाता है। क्योंकि एक बार उद्योग स्थापित हो जाने के बाद उसके प्रभावों पर बहस करने की तुलना में पहले से जागरूक होना कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।



























