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जूटमिल : कुर्की की जमीन पर खुलेआम सौदे, प्रशासन की चुप्पी पर सवाल, निवेशकों को सता रही रूपए डूबने की आशंका

10 करोड़ की ईएसआईसी देनदारी के बीच मोहन जूट मिल परिसर में प्लाटिंग का दुस्साहसIMG 20260201 WA0016

हाई प्रोफाइल संभावित कॉलोनी निर्माण पर रोज हो रहे नए खुलासों से खटाई में पड़ सकता है पूरा प्रोजेक्ट 

डमरूआ न्यूज़/ रायगढ़।
मोहन जूट मिल की जमीन पर चल रहा खेल अब एक दिन की खबर नहीं रह गया है, बल्कि यह साफ संकेत दे रहा है कि रायगढ़ में कानून केवल फाइलों तक सीमित है और जमीन पर ताकत का राज है। जिस भूमि पर कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा 10 करोड़ 42 लाख रुपये से अधिक की वसूली की तलवार लटक रही है, उसी जमीन को कॉलोनाइजर खुलेआम प्लाटिंग के लिए तैयार कर रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि यह कैसे हो रहा है, सवाल यह है कि यह सब किसके संरक्षण में हो रहा है।
ईएसआईसी द्वारा निषेधात्मक आदेश जारी होने और बिक्री, हस्तांतरण व किसी भी प्रकार के लाभ पर रोक के बावजूद जूटमिल क्षेत्र में मशीनें चल रही हैं, जमीन समतल की जा रही है और संभावित निवेशकों को सुरक्षित भविष्य के सपने दिखाए जा रहे हैं। यह स्थिति प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित अनदेखी का प्रमाण बनती जा रही है।

कागजों में कुर्की, जमीन पर कब्जा

ईएसआईसी रायपुर ने रायगढ़ प्रोजेक्ट्स लिमिटेड के विरुद्ध आयकर अधिनियम की दूसरी अनुसूची के तहत कुर्की की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से दर्ज की है। आदेश की प्रतिलिपि संबंधित राजस्व अधिकारियों और पंजीयन कार्यालय को भेजी जा चुकी है। इसके बावजूद न तो जमीन पर कोई सील लगी, न कोई काम रुका। यह सीधा संदेश देता है कि आदेशों का भय अब भूमाफियाओं को नहीं रहा।

सरकारी तालाब जमीन पर बुलडोजर, पर्यावरण की खुले आम हत्या

जूटमिल क्षेत्र के कई खसरा नंबर दशकों से तालाब और जलभराव भूमि के रूप में दर्ज हैं। सरकारी अभिलेख, एसडीएम कार्यालय के पत्र और तहसील रिपोर्ट यह स्पष्ट करते हैं कि इन भूमियों का स्वरूप कभी बदला नहीं गया। इसके बावजूद तालाब पाटे जा रहे हैं, मिट्टी भराव हो रहा है और प्लाट काटे जा रहे हैं। यह केवल अवैध कब्जा नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति और पर्यावरण दोनों पर सीधा हमला है। हैरानी यह है कि इस विनाश पर किसी भी स्तर पर तत्काल कार्रवाई नजर नहीं आती।

10 करोड़ का ईएसआई बकाया, श्रमिकों का हक गायब

जिन श्रमिकों के पसीने से यह मिल खड़ी हुई, जिनका ईएसआई अंशदान वर्षों से बकाया है, उनके अधिकार आज भी अधर में हैं। ईएसआईसी की फाइलों में करोड़ों की रिकवरी दर्ज है, लेकिन जमीन पर उसका कोई असर नहीं दिखता। पूर्व कर्मचारी सवाल कर रहे हैं कि यदि जमीन बेचने की तैयारी है, तो पहले उनका हक क्यों नहीं चुकाया जा रहा। क्या श्रमिकों का हक इतना कमजोर है कि उसे रौंदकर मुनाफे की इमारत खड़ी की जाए।

समाजसेवी का मुखौटा, भीतर से प्लाटिंग का गणित

जिन लोगों को शहर में समाजसेवी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उन्हीं नामों पर जमीन सौदों और प्लाटिंग की चर्चा है। सेवा के मंच से भाषण और जमीन पर सौदेबाजी, यह दोहरा चरित्र अब उजागर हो रहा है। सवाल यह है कि क्या समाजसेवा की आड़ में सरकारी जमीन पर कब्जा और श्रमिकों के हक की अनदेखी भी सेवा कहलाएगी। यदि नहीं, तो प्रशासन ऐसे चेहरों पर अब तक मेहरबान क्यों है।

निवेशकों के लिए चेतावनी, कल कुर्की तो आज का सौदा बेकार

जिस जमीन पर कभी भी कुर्की की कार्रवाई हो सकती है, उस पर प्लाट खरीदना भविष्य को दांव पर लगाने जैसा है। जानकारों का कहना है कि यदि ईएसआईसी ने जमीन कुर्क की, तो खरीदार न जमीन के मालिक रहेंगे और न ही मुआवजे के हकदार। इसके बावजूद प्लाटिंग का प्रचार यह संकेत देता है कि जोखिम जानबूझकर दूसरों पर डाला जा रहा है।

प्रशासन की अग्निपरीक्षा अब टली नहीं

मोहन जूट मिल की जमीन अब केवल एक विवाद नहीं, बल्कि यह तय करने वाली कसौटी है कि रायगढ़ में कानून का राज है या प्रभावशाली लोगों का। यदि कुर्की आदेश के बावजूद प्लाटिंग और कब्जा जारी रहता है, तो यह मानना गलत नहीं होगा कि इस पूरे खेल में चुप्पी भी एक भूमिका निभा रही है। अब सवाल यह नहीं है कि कार्रवाई होगी या नहीं, सवाल यह है कि कार्रवाई किस पर होगी और कब होगी।

रोज़ नए खुलासे, निवेशकों में हड़कंप, प्रोजेक्ट खटाई में पड़ने की आशंका

मोहन जूट मिल की जमीन को लेकर सामने आ रहे रोज़ नए खुलासों ने इस कथित प्रोजेक्ट को लेकर निवेशकों की नींद उड़ा दी है। कभी ईएसआईसी की करोड़ों की बकाया वसूली सामने आ रही है, तो कभी सरकारी तालाब और जलभराव भूमि पर अवैध कब्जे के तथ्य उजागर हो रहे हैं। इन खुलासों के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि प्रशासन या ईएसआईसी ने सख्त कार्रवाई की, तो पूरा प्रोजेक्ट किसी भी समय ठप हो सकता है। जिन लोगों ने एडवांस बुकिंग या निवेश की प्रक्रिया शुरू की है, वे अब अपने पैसे के डूबने की आशंका से परेशान हैं। निवेशकों का कहना है कि उन्हें जमीन को सुरक्षित और विवादमुक्त बताकर आकर्षित किया गया, लेकिन अब स्थिति यह बन रही है कि न जमीन का भविष्य स्पष्ट है और न ही प्रोजेक्ट की वैधानिकता। कई निवेशक यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि जमीन कुर्क हो गई या सरकारी भूमि साबित हुई, तो उनके दिए गए पैसे की जिम्मेदारी कौन लेगा। लगातार बढ़ते विवाद, जांच और संभावित कार्रवाई की चर्चाओं के बीच यह प्रोजेक्ट अब भरोसे का नहीं, बल्कि जोखिम का प्रतीक बनता जा रहा है। निवेशकों में यह डर गहराता जा रहा है कि कहीं ऐसा न हो कि आज जो प्लाट सपने बेच रहे हैं, कल वही लोग हाथ खड़े कर लें और पूरा मामला कानूनी पचड़े में फंस जाए।

कुर्की वाली जमीन पर सौदा कानूनन शून्य, खरीदार सबसे बड़ा पीड़ित

कानूनी दृष्टि से मोहन जूट मिल की जमीन पर प्रस्तावित प्लाटिंग अत्यंत जोखिमपूर्ण ही नहीं, बल्कि कई स्थितियों में अवैधानिक भी मानी जा सकती है। यदि कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा जारी निषेधात्मक आदेश प्रभावी है और संपत्ति पर बिक्री व हस्तांतरण पर रोक दर्ज है, तो उस अवधि में किया गया कोई भी समझौता कानून की नजर में अमान्य हो सकता है। ऐसी स्थिति में न तो रजिस्ट्री वैध मानी जाएगी और न ही खरीदार को स्वामित्व का संरक्षण मिलेगा।
कानून विशेषज्ञों के अनुसार यदि भूमि का कोई हिस्सा सरकारी तालाब, जलभराव क्षेत्र या शासकीय भूमि सिद्ध होता है, तो उस पर निजी स्वामित्व या प्लाटिंग का प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसे मामलों में प्रशासन द्वारा भूमि को अपने कब्जे में लेकर सभी अवैध निर्माण हटाए जा सकते हैं। इसका सीधा असर उन निवेशकों पर पड़ेगा, जिन्होंने बिना पूर्ण जांच के पैसा लगाया है।
इसके अलावा, यदि यह प्रमाणित होता है कि निवेशकों को भूमि की स्थिति छिपाकर या विवादमुक्त बताकर राशि ली गई है, तो यह केवल दीवानी विवाद नहीं रहेगा, बल्कि धोखाधड़ी की श्रेणी में भी आ सकता है। ऐसी स्थिति में खरीदारों के पास उपभोक्ता कानून, दीवानी व आपराधिक प्रक्रिया के तहत अलग-अलग कानूनी विकल्प होंगे, लेकिन अनुभव बताता है कि ऐसे मामलों में पैसा वापस मिलना लंबी और जटिल कानूनी लड़ाई बन जाता है।
कानूनी जानकार साफ तौर पर चेतावनी दे रहे हैं कि कुर्की, सरकारी भूमि और बकाया वसूली जैसे मामलों से घिरी जमीन पर निवेश करना स्वयं जोखिम मोल लेने के समान है। यदि कल को कुर्की या बेदखली की कार्रवाई होती है, तो सबसे पहले नुकसान निवेशकों को ही उठाना पड़ेगा, जबकि प्लाटिंग कराने वाले लोग कानूनी दांव-पेंच में उलझाकर जिम्मेदारी से बच निकलते हैं।

 

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