कर्मचारियों का कब्जा प्रशासन की मदद से हटाया गया, अब खुद मालिक बन बैठा बिल्डर, सरकार मूक दर्शक
डमरूआ न्यूज़ / रायगढ़।
मोहन जूट मिल की जमीन अब सिर्फ विवादित संपत्ति नहीं, बल्कि मजदूरों के अधिकारों पर सुनियोजित हमले और प्रशासनिक पक्षपात की जीती-जागती मिसाल बन चुकी है। जिन पूर्व कर्मचारियों ने दशकों तक फैक्ट्री में पसीना बहाया, जिनका ईएसआई अंशदान आज भी बकाया है, वही कर्मचारी आज सबसे कमजोर और सबसे ज्यादा उपेक्षित स्थिति में खड़े नजर आ रहे हैं। दूसरी ओर रसूखदार बिल्डर न केवल उसी जमीन पर काबिज है, बल्कि खुद को मालिक की तरह स्थापित कर प्लाटिंग और बिक्री की तैयारी में जुटा हुआ है।
स्थिति यह है कि एक तरफ कर्मचारी राज्य बीमा निगम 10 करोड़ 42 लाख रुपये से अधिक की रिकवरी और 17.38 हेक्टेयर भूमि कुर्की की चेतावनी दे रहा है, वहीं दूसरी ओर उसी जमीन पर मजदूरों के हक को कुचलकर कॉलोनाइजर खुला खेल खेल रहे हैं। यह सब बिना प्रशासनिक सहयोग के संभव नहीं, यही आरोप अब खुलकर सामने आ रहे हैं।
बॉक्स–1 : मजदूरों का कब्जा हटाया, प्रशासन बना ढाल
पूर्व जूटमिल कर्मचारियों का आरोप है कि वर्षों से जिस जमीन पर उनका वैध और नैतिक दावा था, वहां से उन्हें हटाने में प्रशासन की सीधी भूमिका रही। कब्जा हटाने की कार्रवाई में कानून की आड़ ली गई, लेकिन उसी जमीन पर बाद में बिल्डर का कब्जा बन जाना यह साबित करता है कि कार्रवाई निष्पक्ष नहीं थी। मजदूरों का कहना है कि यदि वही जमीन अवैध थी, तो आज वहां प्लाटिंग और समतलीकरण कैसे हो रहा है। यह दोहरा मापदंड प्रशासन की नीयत पर सवाल खड़े करता है।
मालिक बदले, शोषण वही, अब बिल्डर की बारी
कर्मचारियों का कहना है कि पहले पूर्व मालिक और उसके परिजनों ने वर्षों तक उन्हें थकाया, वेतन और ईएसआई के हक से वंचित रखा। अब वही शोषण नए चेहरे के साथ लौट आया है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब फैक्ट्री मालिक की जगह रसूखदार बिल्डर बैठा है। कर्मचारियों के अनुसार पहले मालिक के बेटे से न्याय की उम्मीद थी, अब बिल्डर से, लेकिन दोनों ही मोर्चों पर मजदूरों को केवल निराशा ही मिली है।
10 करोड़ की रिकवरी बनाम प्लाटिंग का खेल
ईएसआईसी का निषेधात्मक आदेश साफ कहता है कि जमीन की बिक्री, हस्तांतरण और लाभ पर रोक है। इसके बावजूद प्लाटिंग की तैयारी और निवेशकों को लुभाने की चर्चाएं जोरों पर हैं। जानकारों का कहना है कि जिस जमीन पर कभी भी कुर्की हो सकती है, वहां प्लाट बेचने की कोशिश सीधे तौर पर भविष्य के खरीदारों के साथ धोखा है। सवाल यह भी है कि प्रशासन इस खुले विरोधाभास को देखकर भी कार्रवाई से क्यों बच रहा है।
सरकार और प्रशासन बिल्डर की तरफ झुके हुए
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर सवाल सरकार और प्रशासन की भूमिका को लेकर है। मजदूरों का आरोप है कि हर स्तर पर व्यवस्था का झुकाव बिल्डर की ओर दिखाई देता है। शिकायतें दर्ज हैं, दस्तावेज मौजूद हैं, फिर भी कार्रवाई ठंडी है। दूसरी ओर बिल्डर के लिए रास्ते खुलते जा रहे हैं। यह संदेश साफ जा रहा है कि रसूख के आगे मजदूरों का हक, कानून और सरकारी रिकॉर्ड सब बौने साबित हो रहे हैं।
प्रशासन रसूखदारों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है
मोहन जूट मिल का मामला अब केवल जमीन या प्लाटिंग का नहीं रहा। यह इस बात की कसौटी बन चुका है कि क्या इस व्यवस्था में मजदूर के अधिकार की कोई कीमत है या फिर ताकतवर हमेशा कानून को अपने हिसाब से मोड़ता रहेगा। अगर अब भी पूर्व कर्मचारियों के हक में ठोस और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो यह माना जाएगा कि सरकार और प्रशासन ने खुलकर मजदूरों के बजाय बिल्डर का पक्ष चुन लिया है।