सारंगढ़।जिले के खनिज विभाग की कार्यप्रणाली इन दिनों केवल प्रशासनिक हलकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि गुडेली और कटंगपाली जैसे खनिज बहुल क्षेत्रों में भी चर्चा का विषय बनी हुई है। चर्चा का केंद्र कोई एक कार्रवाई नहीं, बल्कि वह अदृश्य व्यवस्था है, जिसके तहत विभागीय जिम्मेदारियाँ औपचारिक पदों से आगे निकलती दिखाई दे रही हैं।
जानकारी के अनुसार राजस्व विभाग में पदस्थ दीपक पटेल पिछले लगभग दो वर्षों से खनिज विभाग के कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाते देखे जा रहे हैं। हालांकि उनके इस अतिरिक्त दायित्व को लेकर कोई स्पष्ट व सार्वजनिक आदेश सामने नहीं आया है। स्वयं वे राजस्व विभाग के RI होने की बात कहते हैं और कलेक्टर के निर्देश पर अतिरिक्त कार्य करने का उल्लेख करते हैं।
जब पूरा विभाग एक नाम पर सिमट जाए
खनिज विभाग में सहायक खनिज अधिकारी के पद पर बजरंग पैकरा पदस्थ हैं, लेकिन विभागीय चर्चाओं में अक्सर यह सुनने को मिलता है कि अधिकांश निर्णय और मैदानी समन्वय एक ही अधिकारी के माध्यम से होता है। कई मामलों में सहायक खनिज अधिकारी से संपर्क करने पर यह जवाब सामने आता है कि संबंधित अधिकारी अन्य कार्यों में व्यस्त हैं।
यह स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि
क्या खनिज विभाग की औपचारिक जवाबदेही और वास्तविक संचालन में अंतर पैदा हो गया है?
गुडेली–कटंगपाली: चर्चा सिर्फ खनन की नहीं
इसी बीच गुडेली और कटंगपाली क्षेत्रों में अवैध खनन और क्रेशर संचालन को लेकर लंबे समय से चर्चाएँ चल रही हैं। स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जाता है कि कुछ प्रभावशाली समूहों को “अनदेखी की सुविधा” मिलती रही है।
औपचारिक चर्चाओं में यह शब्द खुलकर तो नहीं कहा जाता, लेकिन “संरक्षण” और “मैनेजमेंट” जैसे शब्द बार-बार सामने आते हैं।
इन चर्चाओं में यह भी जोड़ा जाता है कि
> जहाँ निगरानी सख्त होती है, वहाँ गतिविधियाँ रुकती हैं,
> और जहाँ संवाद सहज होता है, वहाँ काम निर्बाध चलता है।
वसूली नहीं, ‘समन्वय’ की चर्चाएँ
हालांकि कोई प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा का विषय है कि खनिज गतिविधियों के संचालन में महीने-दर-महीने चलने वाले ‘समन्वय तंत्र’ की भूमिका अहम हो सकती है।
इन्हीं चर्चाओं के कारण यह सवाल उठता है कि
क्या निगरानी का तंत्र अपने मूल उद्देश्य से भटक रहा है?
खबरें छप रहीं, असर क्यों नहीं?
दिलचस्प तथ्य यह है कि इन विषयों पर समाचार भी प्रकाशित हुए हैं, लेकिन संबंधित क्षेत्रों में कड़ी कार्रवाई की तस्वीर साफ़ नहीं दिखती। जानकारों का कहना है कि अत्यधिक कार्यभार, सीमित समय और जिम्मेदारियों के केंद्रीकरण के कारण बड़े मामलों पर फोकस कमजोर पड़ता है, जबकि छोटे-मोटे मामलों में कार्रवाई दिखाकर औपचारिकता पूरी हो जाती है।
औपचारिक चर्चाएँ, पर सवाल गंभीर
यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि यह समाचार किसी पर सीधा आरोप नहीं, बल्कि सार्वजनिक चर्चाओं और प्रशासनिक असंतुलन की ओर ध्यान दिलाने का प्रयास है।
लेकिन जब एक ही अधिकारी पर दो विभागों की जिम्मेदारी केंद्रित हो जाए और अवैध गतिविधियों की चर्चाएँ लगातार बनी रहें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्योंकि जब व्यवस्था जवाब नहीं देती,
तो चर्चा सवाल बन जाती है
और सवाल, अंततः जवाब मांगते हैं।