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MRP Loot: पुराने स्टॉक पर नया रेट, सारंगढ़ में गुटखा,सिगरेट से काली कमाई

सारंगढ़।
शहर में इन दिनों गुटखा, पान मसाला और सिगरेट की बिक्री को लेकर उपभोक्ताओं के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है। स्थानीय बाजारों में कई उत्पाद ऐसे दामों पर बेचे जा रहे हैं, जो पैकेट पर छपे अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से अधिक बताए जा रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि यह अतिरिक्त वसूली किसी नए स्टॉक पर नहीं, बल्कि पुराने प्रिंटेड रेट वाले पैकेट्स पर की जा रही है।

ग्राहकों का कहना है कि जब वे दुकानदारों से इस बढ़े हुए दाम को लेकर सवाल करते हैं, तो जवाब मिलता है कि “होलसेल से ही रेट बढ़ाकर दिया जा रहा है, इसलिए मजबूरी में ज्यादा लेना पड़ रहा है।” लेकिन यहीं से मामला गंभीर हो जाता है, क्योंकि जिन पैकेट्स पर बढ़े हुए पैसे वसूले जा रहे हैं, उन पर कंपनी द्वारा छपा MRP पहले जैसा ही है।

पुराने स्टॉक पर नया रेट क्यों?

उदाहरण के तौर पर, ₹120 प्रिंट रेट वाले गुटखा को ₹140 में बेचे जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इसी तरह ₹90–95 के सिगरेट पैकेट पर ₹10–15 अतिरिक्त लिए जाने की बात कही जा रही है। सवाल यह उठता है कि यदि कंपनी ने वास्तव में कीमत बढ़ाई है, तो फिर बाजार में नए रेट और नए MRP के साथ स्टॉक क्यों नहीं उतारा गया?

नियमों के अनुसार, किसी भी पैकेज्ड उत्पाद को उसके प्रिंटेड MRP से अधिक कीमत पर बेचना गैरकानूनी है। यदि कीमत बढ़ाई जाती है, तो उसका स्पष्ट उल्लेख पैकेट पर होना अनिवार्य है। पुराने स्टॉक पर मनमाने ढंग से दाम बढ़ाना उपभोक्ताओं के साथ सीधा अन्याय माना जाता है।

GST और काले धन की आशंका

इस पूरे मामले में एक और गंभीर पहलू टैक्स से जुड़ा है। जानकारों के अनुसार, जब प्रिंटेड MRP ₹120 है और GST भी उसी पर अदा किया गया है, तो ऊपर से वसूले गए ₹20 पर न तो टैक्स दिया जा रहा है और न ही उसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड। ऐसे में यह अतिरिक्त रकम काले धन की श्रेणी में आती है, जिससे राजस्व को भी नुकसान होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

कानून क्या कहता है

* Legal Metrology Act, 2009 के तहत MRP से अधिक वसूली दंडनीय अपराध है।
* Consumer Protection Act, 2019 इसे “अनुचित व्यापार व्यवहार” मानता है।
* GST कानून के अनुसार बिना टैक्स के अतिरिक्त वसूली कर चोरी की श्रेणी में आती है।

इन नियमों के बावजूद यदि खुलेआम ऐसा हो रहा है, तो यह केवल रिटेल दुकानदारों का मामला नहीं माना जा सकता। सप्लाई चेन के ऊपरी स्तर—होलसेल और कंपनी डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम—की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

रिटेलर भी फंसा, ग्राहक भी

इस स्थिति का असर सिर्फ ग्राहक पर ही नहीं पड़ रहा, बल्कि छोटे दुकानदार भी असमंजस में हैं। एक ओर उन्हें महंगे दाम पर माल मिल रहा है, दूसरी ओर ग्राहक नाराज होकर दुकान बदल रहे हैं। ऐसे में सबसे ज्यादा फायदा उस स्तर को हो रहा है, जहां से बिना लिखित आदेश या सार्वजनिक सूचना के कीमतें बढ़ाई जा रही हैं।

पारदर्शिता की मांग

यदि कीमतों में वास्तविक बढ़ोतरी हुई है, तो उसका आधिकारिक नोटिस, नया स्टॉक और संशोधित MRP सार्वजनिक रूप से सामने आना चाहिए। पुराने स्टॉक पर चुपचाप रेट बढ़ाकर बेचने से न सिर्फ उपभोक्ता ठगा जा रहा है, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

अब जरूरत है कि संबंधित विभाग इस पूरे मामले की जांच करे और यह स्पष्ट करे कि

* कीमतें किस स्तर पर बढ़ाई गईं,
* क्या यह बढ़ोतरी नियमों के अनुरूप है,
* और MRP से ऊपर वसूली के लिए जिम्मेदार कौन है।

तब तक उपभोक्ताओं के मन में यही सवाल रहेगा क्या बाजार में नियम चल रहे हैं या मनमानी?

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