Damrua

हार्ट अटैक से हुई मौत को हत्या बता रही थी पुलिस, सेशन कोर्ट ने दी आरोपी को जमानत

हत्या के आरोप में बालको पुलिस द्वारा गिरफ्तार आरोपी अजय अग्रवाल को सत्र न्यायालय कोरबा से मिली जमानत ।

आरोपी की ओर से रायगढ़ के मिश्रा चेम्बर के वकील अशोक कुमार मिश्रा-आशीष कुमार मिश्रा और ईश्वर साहू ने की थी पैरवी

डमरूआ न्यूज़ /कोरबा !
पुलिस थाना बालको नगर द्वारा अपराध क्रमांक 202/2025 में गत 17 सितम्बर को रजगामार, जिला-कोरबा के एक व्यापारी अजय अग्रवाल वल्द टीकाराम अग्रवाल को अनिल यादव नामक व्यक्ति की हत्या के आरोप में गिरफ्तार करके कोरबा जेल में दाखिल कर दिया गया, जिसके पश्चात उसकी जमानत के लिये मिश्रा चेम्बर रायगढ़ के एडवोकेट अशोक कुमार मिश्रा-आशीष कुमार मिश्रा ने सत्र न्यायालय कोरबा में जमानत याचिका क्रमांक 574/2025 पेश किया ।
उपरोक्त जमानत याचिका की सुनवाई द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश कोरबा द्वारा गत 30 सितम्बर को की गई जिसमें मिश्रा चेम्बर रायगढ़ के सीनियर एडवोकेट अशोक कुमार मिश्रा और उनके असिस्टेन्ट ईश्वर साहू द्वारा न्यायालय को बताया गया कि बाल्को नगर पुलिस की पूरी थ्योरी बेबुनियाद और झूठी थ्योरी है क्योंकि चालान पेपर में संलग्न मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही यह प्रमाणित है कि मृतक अनिल यादव का लीवर खराब था एवं वह हृदय रोग से ग्रस्त था, जिसकी मौत का कारण ‘‘हार्ट अटैक‘‘ है न कि शारीरिक चोट।

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अशोक कुमार मिश्रा ने न्यायालय का ध्यान इस ओर विशेष रूप से आकर्षित किया कि इसी मामले में आरोपी के पुत्र अर्पित अग्रवाल को प्रमुख आरोपी होना बताकर बालको नगर की पुलिस ने 2 अप्रैल को गिरफ्तार किया था, जिसे माननीय उच्च न्यायालय द्वारा जमानत पर मुक्त कर दिया गया है ऐसी स्थिति में पुलिस की यह आपत्ति स्वीकार नहीं की जा सकती है कि उसी मामले के सह आरोपी को जमानत पर मुक्त न किया जाए जबकि प्रमुख आरोपी जमानत पर मुक्त हो चुका है।
विद्वान द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश कोरबा ने सभी पक्ष का तर्क सुनने एवं पूरे प्रकरण का अध्ययन करने के पश्चात अजय अग्रवाल का जमानत आवेदन पत्र स्वीकार कर लिया एवं उसे बीस हजार रूपये की जमानत पेश करने पर जमानत पर मुक्त करने का आदेश पारित किया, जिसके पश्चात अजय अग्रवाल जिला जेल कोरबा से रिहा कर दिया गया है।

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इस आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए एडवोकेट अशोक कुमार मिश्रा एवं एडवोकेट ईश्वर साहू ने कहा कि यह आदेश ‘‘सतर्क और निष्पक्ष न्याय‘‘ का ज्वलंत प्रमाण है ।
उन्होंने कहा कि प्रायः यह देखा गया है कि हत्या के अपराध की धारा लगाने के बाद पुलिस आश्वस्त हो जाती है कि हत्या के अपराध की धारा देखकर ही आरोपी का जमानत आवेदन पत्र विचारण न्यायालय से निरस्त कर दिया जाएगा लेकिन द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश कोरबा के आदेश को पढ़ने से यह जाहिर है कि अदालत में केवल धारा देखकर फैसला नहीं होता है बल्कि बारीकी से पूरे कागजात पढ़े जाते है एवं पूरे प्रकरण का बारीकी से अध्ययन करने के बाद ही न्याय किया जाता है ।

इस ‘‘सतर्क और निष्पक्ष‘‘ न्याय से ही आम आदमी के स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की रक्षा संभव हो पाती है एवं न्यायालय को न्याय का मंदिर कहे जाने की सार्थकता प्रमाणित होती है।

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