बंटवारे के बिना पैतृक जमीन की खरीद का आरोप, ईआईए के आंकड़ों पर भी आपत्ति; 28 सितंबर की जनसुनवाई रोकने की मांग
90 एकड़ में इतना बड़ा संयंत्र कैसे, पानी आएगा कहां से और जाएगा कहां? वन्यजीव व हाथियों के संरक्षण की योजना पर भी सवाल
Damrua /रायगढ़। औद्योगिक विस्तार की लगातार बढ़ती रफ्तार के बीच रायगढ़ जिले के घरघोड़ा क्षेत्र में प्रस्तावित बीएस इस्पात परियोजना को लेकर ग्रामीणों का विरोध अब केवल जमीन के विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। परियोजना के संबंध में जिला प्रशासन को दिए गए शिकायत आवेदन में ग्रामीणों ने जमीन की खरीद, राजस्व अभिलेखों, पानी की उपलब्धता, प्रदूषण के आंकड़ों, अपशिष्ट प्रबंधन, सड़क यातायात, जंगल, वन्यजीव और हाथियों के संरक्षण से लेकर स्थानीय रोजगार तक करीब दो दर्जन गंभीर सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों ने इन बिंदुओं की जांच पूरी होने तक 28 सितंबर को प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई स्थगित करने की मांग की है।

पैतृक जमीन के बंटवारे से पहले ही बिक्री का आरोप
शिकायतकर्ता सरधाकर गुप्ता उर्फ सरधाराम, पिता स्व. उसतो गुप्ता, का कहना है कि वर्ष 1979 में उनके पिता के नाम संयुक्त खाते में लगभग 58.543 हेक्टेयर भूमि दर्ज थी, जिसमें उनके पिता का हिस्सा लगभग आधा बताया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि बाद के राजस्व अभिलेखों में जमीन का रकबा और उसकी प्रविष्टियों में काफी बदलाव हुआ तथा मूल खसरा नंबर 86 को कई उप-खसरों में विभाजित किया गया। शिकायतकर्ता ने 86/1 से 86/42 तक के उप-खसरों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया है कि परिवार के सभी सह-खातेदारों के अधिकारों का विधिवत निर्धारण और बंटवारा हुए बिना जमीन के हिस्सों की बिक्री और नामांतरण किए गए। ग्रामीणों ने वर्ष 1979 से अब तक के राजस्व रिकॉर्ड, फौती नामांतरण, सीमांकन, रजिस्ट्री और नामांतरण की जांच की मांग की है।
एक तरफ बंटवारा नहीं, दूसरी तरफ जमीन की रजिस्ट्री कैसे?
राजस्व प्रक्रिया पर भी सवाल
आवेदक का कहना है कि जब उन्होंने अपने पिता के हिस्से के विधिवत बंटवारे के लिए आवेदन किया तो रिकॉर्ड में दर्ज कुछ व्यक्तियों की मृत्यु का हवाला देकर प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। ऐसे में शिकायतकर्ता का सवाल है कि यदि उत्तराधिकार और फौती की प्रक्रिया पूरी किए बिना बंटवारा संभव नहीं था, तो उसी जमीन के हिस्सों की पूर्व में रजिस्ट्री और नामांतरण किस आधार पर हुए? ग्रामीणों ने वर्ष 2012 में रेलवे के लिए अधिग्रहित भूमि और उसके मुआवजे से संबंधित रिकॉर्ड की भी जांच की मांग की है।
90 एकड़ में करीब दो लाख टन क्षमता—जमीन के हिसाब पर सवाल
शिकायत में परियोजना के लिए प्रस्तावित लगभग 90 एकड़ जमीन और उस पर करीब दो लाख टन क्षमता के इस्पात संयंत्र की स्थापना को लेकर सवाल उठाया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना में प्रस्तावित विभिन्न इकाइयों और सुविधाओं के लिए आवश्यक भूमि तथा पर्यावरणीय स्वीकृतियों का स्पष्ट विवरण सामने आना चाहिए।
परियोजना के प्रोजेक्ट कॉस्ट को भी शिकायतकर्ता ने वास्तविक आवश्यकताओं की तुलना में कम बताया है और जमीन, पानी तथा अन्य संसाधनों के आकलन की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
इतना पानी आएगा कहां से?
ग्रामीणों ने परियोजना के जल उपयोग के अनुमान पर भी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि क्षेत्र पहले से ही गर्मी और जल संकट से प्रभावित रहता है। ऐसे में उद्योग को बड़ी मात्रा में पानी उपलब्ध कराने के बाद गांवों और कृषि के लिए कितना पानी बचेगा, इसका स्पष्ट अध्ययन आवश्यक है। शिकायत में नदी-नालों, तालाबों और बांधों के जलस्रोतों पर ग्रामीणों तथा वन्यजीवों की निर्भरता का उल्लेख करते हुए आशंका जताई गई है कि अत्यधिक जल दोहन से बरसात के कुछ महीनों बाद पूरे इलाके में गंभीर जल संकट पैदा हो सकता है।
ईआईए के आंकड़ों पर ग्रामीणों ने उठाई उंगली
शिकायतकर्ताओं ने परियोजना की EIA / Environmental Impact Assessment रिपोर्ट में वर्तमान पर्यावरणीय स्थिति के आंकड़ों पर भी गंभीर आपत्ति दर्ज की है। उनका आरोप है कि क्षेत्र में वर्तमान प्रदूषण स्तर को लेकर प्रस्तुत आंकड़ों की वास्तविकता की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। विशेष रूप से धूल, PM, SO₂ और NOx सहित वायु गुणवत्ता के आंकड़ों का पुनः परीक्षण कराने की मांग की गई है। ग्रामीणों ने वायु, जल और मिट्टी की गुणवत्ता की स्वतंत्र निगरानी कराने तथा ईआईए के लिए नमूने कहां, कब और किस परिस्थितियों में लिए गए, इसकी भी जांच की मांग की है।
22 लाख टन कोयले की वाशरी से निकलने वाले अपशिष्ट का क्या होगा?
शिकायत में परियोजना में प्रस्तावित कोयला वाशरी से निकलने वाले अपशिष्ट को लेकर भी सवाल उठाया गया है। ग्रामीणों ने पूछा है कि बड़ी मात्रा में निकलने वाले वेस्ट कोयला और अन्य अपशिष्ट का अंतिम उपयोग अथवा निपटान किस प्रकार किया जाएगा। इसी तरह पावर प्लांट से उत्पन्न होने वाली फ्लाई ऐश के उपयोग और सुरक्षित निपटान की स्पष्ट व्यवस्था बताने की मांग की गई है।
दूषित जल को लेकर भी ग्रामीणों ने कहा है कि कोलवाशरी सहित विभिन्न इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट जल की मात्रा और उसकी गुणवत्ता का पर्याप्त आकलन होना चाहिए। उद्योग में पानी के पुनः उपयोग और Zero Liquid Discharge (ZLD) व्यवस्था की वास्तविक क्षमता भी स्पष्ट की जानी चाहिए।
कागज पर नियंत्रण, जमीन पर निगरानी कितनी?
परियोजना के दस्तावेजों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए ESP, बैग फिल्टर, PTFE बैग फिल्टर, स्टैक मॉनिटरिंग और अन्य नियंत्रण प्रणालियों का उल्लेख होने के बावजूद ग्रामीणों का कहना है कि केवल उपकरणों का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि ये प्रणालियां वास्तव में कितनी प्रभावी होंगी और इनके संचालन की लगातार निगरानी कौन करेगा।
परियोजना के दस्तावेजों में धूल एवं अन्य प्रदूषकों के नियंत्रण के लिए मानक निर्धारित किए जाने की बात है, लेकिन ग्रामीण वास्तविक परिस्थितियों में इन मानकों की निगरानी और अनुपालन सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं।
गांव 500 मीटर से भी कम दूरी पर, बफर जोन पर सवाल
शिकायत में कहा गया है कि प्रस्तावित उद्योग की जमीन डंगनीनार और चारमार गांवों से लगी हुई है तथा गांव और परियोजना स्थल के बीच की दूरी 500 मीटर से भी कम बताई गई है। ग्रामीणों ने आसपास की आबादी को संभावित प्रभावों से बचाने के लिए परियोजना स्थल की दूरी और बफर जोन का पुनर्मूल्यांकन कराने की मांग की है।
सड़क पर बढ़ेंगे ट्रक, प्रदूषण और दुर्घटना का खतरा?
शिकायत में परियोजना के कारण भारी वाहनों की आवाजाही बढ़ने की आशंका भी जताई गई है। ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना शुरू होने के बाद सड़कों पर ट्रैफिक कितना बढ़ेगा, इससे धूल और वायु प्रदूषण में कितनी वृद्धि होगी तथा दुर्घटनाओं की संभावना कितनी बढ़ेगी—इसका स्पष्ट अध्ययन सामने आना चाहिए।
जंगल और वन्यजीवों पर भी नजर डालने की मांग
परियोजना के आसपास सघन वन क्षेत्र और वन्यजीवों की मौजूदगी का उल्लेख करते हुए ग्रामीणों ने पेड़-पौधों की कटाई तथा उसके लिए आवश्यक अनुमति की जानकारी मांगी है। वन्यजीवों, विशेषकर हाथियों के संरक्षण के लिए ठोस योजना का अभाव होने का आरोप लगाते हुए इस पहलू की भी स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि औद्योगिक परियोजना के दस्तावेजों में रोजगार और आर्थिक विकास की बात तो की जाती है, लेकिन छत्तीसगढ़ के कितने स्थानीय लोगों को वास्तविक रोजगार मिलेगा, इसका स्पष्ट आंकड़ा और योजना क्यों नहीं बताई जाती।
‘विकास’ के नाम पर जमीन, पानी और जंगल की कीमत कौन चुकाएगा?
ग्रामीणों के सवालों का मूल केंद्र यही है कि औद्योगिक विकास का लाभ यदि क्षेत्र को मिलना है तो उसके साथ जमीन, पानी, जंगल, खेती, वन्यजीव और स्थानीय आबादी की सुरक्षा की ठोस गारंटी भी होनी चाहिए। शिकायतकर्ताओं ने परियोजना से जुड़े दस्तावेजों, ईआईए आंकड़ों, राजस्व रिकॉर्ड और पर्यावरणीय दावों की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
जनसुनवाई से पहले प्रशासन के सामने परीक्षा
बीएस इस्पात परियोजना को लेकर 28 सितंबर की प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई से पहले ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने कई सवाल रख दिए हैं। उनका कहना है कि जब तक जमीन संबंधी विवाद, राजस्व रिकॉर्ड, जल उपलब्धता, पर्यावरणीय आंकड़े, अपशिष्ट प्रबंधन, वन क्षेत्र और वन्यजीव संरक्षण जैसे मुद्दों की जांच पूरी नहीं होती, तब तक जनसुनवाई आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा। अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं कि ग्रामीणों द्वारा उठाए गए इन सवालों पर दस्तावेजी जांच और स्थल परीक्षण कराया जाता है या फिर औद्योगिक विकास की प्रक्रिया में उठ रही आपत्तियां महज जनसुनवाई की औपचारिकता बनकर रह जाती हैं।







