Damrua

जे पी नड्डा के दौरे के पूर्व प्रश्न,25 वर्षों की राजनीतिक निष्ठा और विकास का खाली पन्ना

   25 साल की वफ़ादारी, बदले में उपेक्षा : जांजगीर-चांपा का असहज सच

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद जांजगीर-चांपा जिले में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का पहुँचना कोई सामान्य राजनीतिक घटना नहीं है। नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा — यह तीसरा अवसर है जब पार्टी का सर्वोच्च नेतृत्व इस संसदीय क्षेत्र में आ रहा है। यह तथ्य अपने-आप में एक सवाल खड़ा करता है कि 25 वर्षों से लगातार भाजपा को जिताने वाला जांजगीर-चांपा आखिर पार्टी की प्राथमिकताओं में किस स्थान पर है।

प्रदेश नेतृत्व के शीर्ष नेताओं का आना-जाना यहाँ लगा ही रहता है। डॉ. रमन सिंह के तीन कार्यकाल गुजर गए और वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के शासन का दूसरा वर्ष चल रहा है, लेकिन जांजगीर-चांपा आज भी वही सवाल पूछ रहा है — हमें मिला क्या?

पिछले 25 वर्षों से जांजगीर-चांपा लोकसभा सीट भाजपा के खाते में जाती रही है, इसके बावजूद यह क्षेत्र आज भी किसी ऐसी बड़ी और पहचान देने वाली विकास परियोजना की प्रतीक्षा में है जिसे सरकार गर्व से अपनी उपलब्धि कह सके। यह केवल राजनीतिक असंतोष नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत है।

यदि विगत दो वर्षों के छत्तीसगढ़ सरकार के बजट पर नज़र डाली जाए, तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है। न बड़े उद्योग, न निर्णायक अधोसंरचना परियोजनाएँ, न कोई विशेष पैकेज — जांजगीर-चांपा बार-बार प्राथमिक सूची से बाहर दिखाई देता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जिले को भाजपा की विकास नीति में अक्सर दोयम दर्जे पर रखा गया है।

विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र की जनता भाजपा के प्रति सबसे अधिक वफ़ादार रही, उसी क्षेत्र के सांसद चुनाव जीतने के बाद न जनता से संवाद करते हैं और न ही पार्टी कार्यकर्ताओं को अपेक्षित सम्मान देते हैं। राजनीतिक जीत को निजी अधिकार समझ लेने की यह प्रवृत्ति आज जांजगीर-चांपा की सबसे बड़ी पीड़ा बन चुकी है।

साय शासन के दौरान एक और चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। जिले में धीरे-धीरे जनतंत्र की जगह प्रशासनिक तंत्र हावी होता जा रहा है। जनप्रतिनिधियों की भूमिका सीमित हो रही है और निर्णय प्रक्रिया में प्रशासनिक अधिकारियों का वर्चस्व बढ़ता दिख रहा है। इससे जनता और सत्ता के बीच की लोकतांत्रिक कड़ी कमजोर हुई है।

राजनीतिक दृष्टि से यह स्थिति भाजपा के लिए “मीठे ज़हर” से कम नहीं है। जब निर्णय प्रशासनिक होते हैं, लेकिन असंतोष राजनीतिक सत्ता के खाते में जुड़ता है, तो उसका असर देर-सवेर चुनावी परिणामों में दिखाई देता है।

अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा जांजगीर-चांपा आ रहे हैं। यह दौरा केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भरोसे की परीक्षा है। जनता अब भाषण नहीं, हिसाब चाहती है — ठोस घोषणाएँ, स्पष्ट बजट और समयबद्ध क्रियान्वयन।

सवाल सीधा है — क्या यह दौरा जांजगीर-चांपा के लिए वास्तविक विकास लेकर आएगा या फिर यह भी पहले की तरह आश्वासनों तक सीमित रह जाएगा? जांजगीर-चांपा आज भी भाजपा का भरोसेमंद गढ़ है, लेकिन राजनीति का इतिहास बताता है कि उपेक्षा पर भरोसा हमेशा कायम नहीं रहता।

Facebook
WhatsApp
Twitter
Telegram