जांजगीर-चांपा, जिले के नवागांव में एक दलित परिवार पर हुए हमले के दस दिन बाद भी प्राथमिकी दर्ज न हो पाने से न सिर्फ कानूनी प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं, बल्कि सामाजिक समरसता और सामुदायिक सौहार्द्र पर भी एक गहरी चिंता उभर रही है।
पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया है कि ग्राम सरपंच प्रतिनिधि और उसके समर्थकों ने दो बार, 13 और 15 जून को, उनके घर पर हमला किया, जातिसूचक गालियाँ दीं और जान से मारने की धमकी दी। आज पीड़ित परिवार भय के साए में है।
कानून के दायरे में देरी, सामाजिक तनाव की आहट
पीड़ित सतीश कुमार घोसले ने SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के तहत अजाक थाने में शिकायत दी है। यह अधिनियम स्पष्ट करता है कि ऐसे मामलों में सीधी FIR और तत्काल गिरफ्तारी अनिवार्य है, किंतु अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया गया।
पुलिस अधीक्षक विजय पांडे ने टीम डंरुआ से बातचीत में कहा:
“हम मामले की जांच कर रहे हैं। पीड़ित पक्ष के बयान लिए जा रहे हैं और कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होगी।”
लेकिन दस दिनों की यह देरी, संवैधानिक संरक्षण पाने वाले समुदायों में न्याय के प्रति भरोसे को प्रभावित कर रही है।
सामाजिक संगठनों की चेतावनी और सामाजिक ताने-बाने पर असर
भीम आर्मी और मूलनिवासी मुक्ति मोर्चा जैसे संगठनों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो राज्यव्यापी आंदोलन किया जाएगा।
भीम आर्मी के ज़िला उपाध्यक्ष सुरेन्द्र लहरे ने कहा:
“यह केवल एक परिवार की बात नहीं है, यह समाज के हर उस हिस्से की आवाज़ है जो आज भी हाशिए पर है। हमारी चुप्पी इस अन्याय को और बढ़ाएगी।”
मूलनिवासी मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक ऋषिकर भारतीय ने इसे संवैधानिक व्यवस्था की विफलता बताते हुए कहा:
“अगर हम अब नहीं बोले तो यह मौन पूरे समाज के भीतर असंतोष की ज्वाला बन जाएगा। आंदोलन अनिवार्य होगा।”
संभावित परिणाम: शांति से संघर्ष की ओर?
छत्तीसगढ़ जैसे सामाजिक दृष्टि से मिश्रित और संवेदनशील क्षेत्र में, यदि दलित समुदाय को न्याय मिलने में देर होती है या कार्रवाई पक्षपातपूर्ण दिखती है, तो इसका सीधा असर सामाजिक समरसता पर पड़ सकता है।
गांव-गांव में फैले असंतोष की चिंगारी किसी भी क्षण बड़ी लपट में बदल सकती है — और इसका असर केवल एक थाने या एक जिले तक सीमित नहीं रहेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक न्याय की अनदेखी भविष्य में प्रशासनिक अविश्वास, वर्गीय टकराव और सांप्रदायिक विभाजन की ज़मीन तैयार कर सकती है।
क्या प्रशासन समय रहते चेतेगा?
सवाल केवल कानून के पालन का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या राज्य व्यवस्था सामाजिक ताने-बाने को बिगड़ने से पहले रोक पाएगी?
इस घटना ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि संवैधानिक अधिकार और धरातली हकीकत के बीच एक गहरी खाई अब भी मौजूद है।
अब ज़रूरत इस बात की है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि त्वरित, निष्पक्ष और प्रभावी कदम उठाकर इस खाई को पाटें — वरना जो टूटेगा, वह केवल भरोसा नहीं, समाज की नींव भी हो सकती है।