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गुडेली में बेलगाम खनन, क्या खनिज विभाग ही मुख्यमंत्री की मंशा पर सवाल खड़े कर रहा है?

मुद्दा अब सीधे खनिज विभाग से जुड़ चुका है

 

सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले का गुडेली क्षेत्र अब केवल अवैध खनन की शिकायत तक सीमित नहीं रहा। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि सवाल सीधे जिला खनिज विभाग की कार्यप्रणाली और उसकी भूमिका पर उठने लगे हैं। जिस विभाग की जिम्मेदारी अवैध खनन रोकने की है, उसी के रहते गतिविधियों का जारी रहना गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

 

 

सूचनाएं थीं, शिकायतें थीं, फिर भी विभाग मौन

 

स्थानीय स्तर पर अवैध खनन को लेकर लगातार सूचनाएं सामने आती रहीं। जानकारियां खनिज विभाग तक पहुंचने की बात भी कही जाती रही, लेकिन इसके बावजूद न तो प्रभावी निरीक्षण नजर आया और न ही ऐसी कार्रवाई, जिससे यह लगे कि विभाग ने मामले को गंभीरता से लिया है।

 

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सब कुछ खुले में, फिर खनिज विभाग देख क्या रहा था?

 

गुडेली क्षेत्र में भारी वाहनों की आवाजाही, खनिज का नियमित परिवहन और इलाके में साफ दिखाई देने वाले बदलाव इस बात की ओर इशारा करते हैं कि खनन गतिविधियां किसी गुप्त तरीके से नहीं चल रही थीं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि खनिज विभाग की निगरानी व्यवस्था आखिर किस स्तर पर काम कर रही थी।

 

निरीक्षण और कार्रवाई सिर्फ कागजों में?

 

खनिज विभाग का मूल दायित्व नियमित निरीक्षण, जांच और नियमों के उल्लंघन पर त्वरित कार्रवाई करना है। लेकिन गुडेली की स्थिति यह संकेत देती है कि या तो निरीक्षण हुए ही नहीं, या फिर निरीक्षण केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गए।

 

 

राजस्व नुकसान की आशंका, फिर भी विभाग बेपरवाह

 

खनन विशेषज्ञों के अनुसार गुडेली जैसे क्षेत्रों में अवैध खनन से शासन को लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये तक के राजस्व नुकसान की आशंका बनती है। इसके बावजूद खनिज विभाग की ओर से सख्त रुख न दिखाई देना उसकी प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

 

खनिज विभाग की निष्क्रियता किसे फायदा पहुंचा रही है?

 

जब अवैध खनन लंबे समय तक चलता रहे और उस पर कार्रवाई न हो, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि इस निष्क्रियता से फायदा किसे मिल रहा है। खनिज विभाग की चुप्पी अब केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संदेह की वजह भी बनती जा रही है।

 

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ऊपर नीति साफ, नीचे विभाग क्यों फेल?

 

छत्तीसगढ़ में खनिज संसाधन विभाग की जिम्मेदारी स्वयं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के पास है। शासन स्तर पर अवैध खनन को लेकर सख्त नीति और स्पष्ट संदेश माना जाता है। इसके बावजूद यदि गुडेली जैसे क्षेत्रों में हालात नहीं बदलते, तो सवाल नीति पर नहीं, बल्कि खनिज विभाग के अमल पर उठता है।

 

क्या खनिज विभाग ही ऊपर की मंशा को कमजोर कर रहा है?

 

प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि जमीनी स्तर पर खनिज विभाग की निष्क्रियता अनजाने में ही सरकार की सख्ती और मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर देती है। जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए, क्योंकि विभाग का काम ही नीति को जमीन पर उतारना है।

 

कलेक्टर की निगरानी में भी खनिज विभाग फिसला

 

जिले में खनिज विभाग कलेक्टर के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करता है। ऐसे में लंबे समय तक अवैध खनन का जारी रहना यह सवाल भी खड़ा करता है कि खनिज विभाग की रिपोर्टिंग, निगरानी और फीडबैक सिस्टम में कहां कमी रह गई।

 

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अगर विभाग सक्रिय होता, तो तस्वीर अलग होती

 

यदि खनिज विभाग समय पर निरीक्षण करता, अवैध खनन की पहचान कर कार्रवाई करता और दोषियों पर दंडात्मक कदम उठाता, तो न केवल अवैध गतिविधियां रुकतीं, बल्कि शासन के राजस्व की भी सुरक्षा होती।

 

आरोप नहीं, लेकिन जिम्मेदारी तय होना जरूरी

 

यह रिपोर्ट किसी अधिकारी पर सीधा आरोप नहीं लगाती, लेकिन यह जरूर स्पष्ट करती है कि गुडेली में अवैध खनन की जिम्मेदारी से खनिज विभाग खुद को अलग नहीं कर सकता। विभाग की भूमिका और कार्यशैली की गंभीर समीक्षा अब जरूरी हो चुकी है।

 

गुडेली बना खनिज विभाग की कार्यप्रणाली का आईना

 

गुडेली का मामला अब खनिज विभाग के लिए एक चेतावनी और परीक्षा दोनों बन चुका है। यहां की स्थिति यह दिखाने के लिए काफी है कि विभाग का जमीनी अमल उसकी जिम्मेदारियों के अनुरूप है या नहीं।

 

बहरहाल: अब खनिज विभाग को जवाब देना होगा

गुडेली में अवैध खनन का मामला साफ संकेत देता है कि समस्या नीति में नहीं, बल्कि खनिज विभाग के क्रियान्वयन में है। अब यह विभाग पर निर्भर करता है कि वह समय रहते ठोस कार्रवाई कर यह साबित करे कि मुख्यमंत्री की मंशा और विभागीय कामकाज के बीच कोई दूरी नहीं है।

 

 

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