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डमरुआ पड़ताल: बोन्दा में फ्लाईएश डस्ट के बहाने अवैध डोलोमाइट खदानों को पाटने का ‘खतरनाक खेल’

Damrua डेस्क!बोन्दा क्षेत्र में फ्लाईएश डस्ट डाले जाने की खबर सामने आने के बाद अब मामला साज़िश की तह तक पहुँचता दिख रहा है। जो जानकारी सामने आई है, वह यह संकेत दे रही है कि यह सिर्फ फ्लाईएश निस्तारण का मामला नहीं, बल्कि अवैध डोलोमाइट खदानों को नियम विरुद्ध तरीके से पाटकर लाखों कमाने की बड़ी तैयारी है।

डमरुआ पड़ताल में पता चला है कि कुछ खदानें ऐसी हैं जहाँ कभी वैध खनन हुआ ही नहीं, फिर भी उनके नाम पर माइनिंग क्लोजर प्लान तैयार करवा लिया गया**। यह सबसे बड़ा सवाल है कि:

 

❗जब खनन हुआ ही नहीं… तो क्लोजर प्लान जारी कैसे हुआ?

 

यह बिंदु सीधे तौर पर खनिज विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाता है।

 

* क्लोजर प्लान उन्हीं खदानों का बन सकता है जहाँ वैध खनन हुआ हो।

* यदि खदान में खनन नहीं हुआ, फिर भी क्लोजर प्लान बन गया, तो या तो रिकॉर्ड फर्जी है, या विभाग की नज़रें बंद थीं, या किसी बड़े स्तर पर सेटिंग हुई।

 

यह संदेह और गहराता है कि क्या इन खदानों में गुपचुप अवैध खनन भी हुआ था, जिसे अब फ्लाईएश डस्ट डालकर छिपाने की कोशिश की जा रही है?

 

 

🔥 माइनिंग विभाग का रोल सबसे संदिग्ध

 

कानून बहुत स्पष्ट है:

 

🚨 बिना अनुमोदित क्लोजर प्लान के किसी भी खदान में मिट्टी, मलबा, या फ्लाईएश डालना अपराध है।

 

फिर भी बोन्दा में जिस तेजी से फ्लाईएश ट्रक पहुँच रहे हैं, वह कई सवाल खड़े करता है—

 

* किसने अनुमति दी?

• क्या निरीक्षण हुआ?

* क्या खदान को पाटने की प्रक्रिया पारदर्शिता से की जा रही है या अंधेरे में सौदे हो रहे हैं?अगर खदान अवैध थी तो विभाग ने कार्रवाई क्यों नहीं की?

 

यह स्पष्ट इशारा है कि या तो विभाग अनजान है (जो संभव नहीं), या पूरा खेल विभाग की नाक के नीचे चल रहा है।

 

 

🔥 पर्यावरण विभाग की चुप्पी भी संदेह को मजबूत करती है

 

डोलोमाइट खदानों को पाटने के लिए पर्यावरण मंजूरी अनिवार्य है।

 

* फ्लाईएश की गुणवत्ता,

* भूजल पर असर,

* आसपास की आबादी पर स्वास्थ्य प्रभाव,

* परिवहन से फैलने वाला प्रदूषण—

 

इन सबका अध्ययन जरूरी होता है।

 

लेकिन यहाँ पर्यावरणीय परीक्षण से पहले ही ट्रक दौड़ रहे हैं।

यह सवाल उठना लाजिमी है कि:

 

🚨क्या पर्यावरण विभाग ने भी आँख मूंद ली है?

 

 

🔥 ठेकेदारों की ‘लाखों कमाने’ की जुगत

 

सूत्र बताते हैं कि खदानों को पाटने के नाम पर ठेकेदारों का लक्ष्य सिर्फ एक है—

 

🚨 कम से कम खर्च और ज्यादा से ज्यादा कमाई।

 

इसमें फ्लाईएश सबसे आसान माध्यम है:

 

* यह लगभग मुफ्त मिलता है

* परिवहन की लागत कम

* खदान पाटने में टन भर पैसा बचता है

* ऊपर से कागज़ों में दिखाया जाता है कि बड़ी मात्रा में मिट्टी डाली गई

 

यह सीधा आर्थिक खेल लगता है जिसमें विभाग और ठेकेदारों की मिलीभगत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

 

 

🔥 जमीन मालिक भी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं

 

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिस प्राइवेट जमीन या जिस पट्टे की खदान को पाटा जा रहा है, उसकी जिम्मेदारी मालिक की भी बनती है।

अगर खदान अवैध है या क्लोजर प्लान फर्जी निकला तो:

 

जमीन मालिक,

ठेकेदार,

और अनुमति देने वाला विभाग—

 

तीनों पर कार्रवाई की सीधी ज़द बनती है।

 

 

🔥 मामला बेहद गंभीर… और डमरुआ की पड़ताल जारी है

 

यह सिर्फ खदान पटाने का मामला नहीं है।

यह उन गंभीर अनियमितताओं की कड़ी है जिनसे करोड़ों का खनिज नुकसान, पर्यावरणीय प्रदूषण और विभागीय सेटिंग का नेटवर्क उजागर हो सकता है।

 

बोन्दा में हो रही फ्लाईएश डंपिंग अब एक अवैध खदानों के सफाए में बदलती दिख रही है।

डमरुआ पड़ताल इस पूरे मामले के सभी दस्तावेज, विभागीय आदेश, अनुमति प्रक्रिया और ठेकेदारों के रोल की जांच मे जूटा है।

 

🚨 अगले खुलासे में कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं।

 

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