डमरुआ डेस्क।।गुडेली की धरती हर दिन हिलती जरूर है—but सवाल ये है कि पत्थर हिल रहे हैं… या पूरा सिस्टम? जमीन के नीचे से निकली हर एक चट्टान एक ऐसी कहानी कह रही है, जिसकी गूंज अब पूरे सारंगढ़ जिले में सुनाई देने लगी है।
सारंगढ़–बिलाईगढ़ जिले का गुडेली… एक ऐसा गांव, जिसकी मिट्टी में सिर्फ खनिज नहीं, बल्कि कई सालों से दबे हुए राज भी दफ्न हैं। डमरुआ की टीम ने जब इस इलाके की बारीकी से पड़ताल की, तो तस्वीर साफ़ हुई कि गुडेली सिर्फ खनन क्षेत्र नहीं—बल्कि एक अनियंत्रित आर्थिक तंत्र का केंद्र बन चुका है।
नमस्कार, आज हम आपको दिखाते हैं गुडेली के उस सच का चेहरा, जिसे देखने से कई लोग अब तक बचते रहे।
गुडेली में लगातार वर्षों से काले पत्थर का उत्खनन हो रहा है—कुछ वैध, कुछ अवैध, लेकिन दोनों के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो चुकी है कि खनिज विभाग की फाइलों से लेकर क्रेशर यार्ड तक एक अदृश्य नेटवर्क साफ नजर आता है। स्थानीय लोगों की मानें तो यहां खनन कोई काम नहीं… एक परंपरा बन चुका है।
डमरुआ की पड़ताल में सामने आया चौंकाने वाला आर्थिक अनुमान
गुडेली में कितनी मात्रा में पत्थर निकल रहा है—इसकी कोई आधिकारिक दैनिक रिपोर्ट सामने नहीं आती। लेकिन डमरुआ की टीम ने यहां मौजूद खदानों, मशीनरी, हाइवा ट्रैफिक और परिवहन पैटर्न का अध्ययन कर एक अनुमान तैयार किया:
प्रतिदिन अनुमानित पत्थर उत्खनन: 15,000 टन
प्रति टन बाजार मूल्य: लगभग 200 रुपये
एक दिन की संभावित वैल्यू: 30,00,000 रुपये (30 लाख)
ये आंकड़ा ही चौंका देने वाला है… लेकिन असली झटका तो तब लगता है जब इसे महीने भर पर देखा जाए—
महीने भर का अनुमानित आर्थिक परिदृश्य
30 लाख रुपये × 30 दिन = 9,00,00,000 रुपये
यानी सिर्फ 30 दिनों में लगभग 9 करोड़ रुपये का पत्थर गुडेली की धरती से बाहर जा सकता है।
अब सवाल खुद-ब-खुद उठने लगते हैं:
क्या 9 करोड़ की रॉयल्टी शासन तक पहुँचती है?
क्या विभाग के रिकॉर्ड इस अनुमान से मेल खाते हैं?
अगर नहीं… तो अंतर कहाँ पैदा हो रहा है?
चार कलेक्टर बदले, लेकिन गुडेली का ‘नियम’ नहीं बदला
रायगढ़ से अलग होकर सारंगढ़ जिला बने कई वर्ष हो गए। इस दौरान कलेक्टर से लेकर खनिज निरीक्षक तक पूरी टीम बदली… पर बदला क्या? गुडेली में खनन—जैसा था, वैसा ही आज भी है।
यह सवाल उठाता है—क्या प्रशासन को असल स्थिति की जानकारी नहीं? या जानकारी होते हुए भी कार्रवाई का असर नदारद है?
क्रेशर कनेक्शन — इस पूरे खेल का सबसे मजबूत लिंक
खदानों से निकले काले पत्थरों का बड़ा हिस्सा आसपास के क्रेशरों तक जाता है। पोकलेन मशीनें, विस्फोटक, और दर्जनों हाइवा ट्रेलर रोजाना इस चक्र को चलाते हैं। लेकिन क्या इनकी सोर्सिंग, वजन, परिवहन और रॉयल्टी की हर एंट्री विभागीय रिकॉर्ड से मेल खाती है? यह जांच का विषय है—और गंभीर विषय है।
क्या विभाग अनजान है या अनदेखी हो रही है?
डमरुआ किसी पर आरोप नहीं लगा रहा—हम सिर्फ सामने दिख रही स्थिति को दस्तावेज़ कर रहे हैं। लेकिन यह सवाल जरूर उठता है—इतना बड़ा आर्थिक चक्र यदि बिना पूर्ण निगरानी के चल रहा है, तो गड़बड़ी की संभावना कहाँ तक जा सकती है?
गुडेली का इतिहास — अवैध खनन का हॉटस्पॉट क्यों कहलाता है?
यह क्षेत्र लंबे समय से रॉयल्टी चोरी और अवैध उत्खनन के लिए कुख्यात रहा है। कभी कार्रवाई भी हुई, वाहन ज़ब्त हुए… लेकिन आज की तस्वीर बताती है कि समस्या की जड़ कहीं अधिक गहरी है।
यह सिर्फ शुरुआत है — डमरुआ की एथेंटिक पड़ताल जारी रहेगी
हमारा उद्देश्य किसी पर उंगली उठाना नहीं, बल्कि जमीनी स्थिति को तथ्य के साथ सामने लाना है। गुडेली खनन नेटवर्क पर यह पहली पड़ताल है। डमरुआ आने वाले अंकों में—रॉयल्टी पैटर्न, क्रेशर कनेक्शन, परिवहन नेटवर्क, विभागीय मॉनिटरिंग और संभावित लीकेज—इन सभी पहलुओं को क्रमवार उजागर करेगा।
बहरहाल …..
गुडेली में पत्थर नहीं निकल रहा—एक विशाल आर्थिक चक्र हर दिन घूम रहा है। जिसकी गूंज सरकार से लेकर विभाग तक पहुंचनी चाहिए। और जिसे पढ़कर हर जिम्मेदार नागरिक के मन में यह सवाल उठना चाहिए—“क्या गुडेली की धरती सिर्फ पत्थरों से खोखली हो रही है… या व्यवस्था भी?”