रायगढ़ (सारंगढ़-बिलाईगढ़).
जिले के कटंगपाली और बोंदा मुड़ा क्षेत्र में पिछले 2–3 महीनों से एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसे सुनकर कोई भी सामान्य नागरिक चौक जाए। यहाँ खदानों में खनन का काम नहीं चल रहा। ये खदानें पहले से ही खाली, गहरी और अनुपयोगी थीं।लेकिन अब इन्हीं खदानों को फ्लाईएश डस्ट (थर्मल पावर प्लांट की जहरीली राख) से भरा जा रहा है — और वो भी ऐसी शैली में जो सभी नियमों को ध्वस्त कर देती है।
स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चाएँ बेहद गंभीर हैं। सूत्र बताते हैं कि यह पूरा कार्य नियमों को मोड़कर, दस्तावेज़ों को मिलाकर, खसरा-रकबा में भ्रम फैलाकर और विभागों को गुमराह कर अंजाम दिया जा रहा है।
🔶 असली मुद्दा: खाली खदानों को जहरीली फ्लाईएश से पाटना — नियमों का सीधा उल्लंघन
सरकार की गाइडलाइन साफ कहती है कि—
* फ्लाईएश को केवल वैज्ञानिक प्रक्रिया से ही निस्तारित किया जा सकता है।
* बिना पर्यावरणीय स्वीकृति (Environmental Clearance) और बिना Geo-Technical Test के किसी भी खदान में फ्लाईएश नहीं डाली जा सकती।
* खदान को भरने से पहले Soil Stability Test, Water Percolation Test और Grading Approval अनिवार्य है।
सबसे महत्वपूर्ण — स्थानीय पंचायत की NOC सिर्फ प्रक्रिया का एक छोटा हिस्सा है, न कि अंतिम अनुमति।
लेकिन कटंगपाली-बोंदा मुड़ा में जो हो रहा है वह इन सभी नियमों के बिल्कुल उलट दिखाई देता है।
जहरीली फ्लाईएश डस्ट को ट्रैक्टर-ट्रेलर और हाइवा गाड़ियों से खाली खदानों में रात-दिन गिराया जा रहा है, जिससे हवा में महीन राख उड़ रही है और जमीन में रासायनिक घुलाव की आशंका बढ़ रही है।
🔶 राजनीतिक पकड़ + धनवान व्यक्तियों का दबदबा = विभाग मौन?
स्थानीय चर्चा में एक ही बात बार-बार सामने आ रही है —
“यह काम कोई साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता।”
सूत्र बताते हैं कि:
* इस पूरी गतिविधि के पीछे राजनीतिक पहुंच वाले धनवान व्यक्तियों का गठजोड़ सक्रिय है।
* खदानों में फ्लाईएश डालने का काम सत्ता-धारी प्रभाव और हाई-लेवल बैकअप के कारण निर्बाध चलता दिख रहा है।
* कई बार शिकायतें प्रशासन तक पहुंची, लेकिन जांच की फाइलें शायद महज काग़ज़ों में घूमकर शांत हो गईं।
* पंचायत स्तर पर एक ही भूमि को लेकर बार-बार NOC जारी करने की चर्चा, सिस्टम की सच्चाई पर कई परतों का पर्दा डालती है।
ऐसा माहौल बनाया गया है कि क्षेत्र के छोटे लोग और स्थानीय ग्रामीण आवाज़ उठाने से डरते हैं, क्योंकि जिन लोगों के खिलाफ आवाज़ उठेगी, उनकी पहुँच जिले से ऊपर तक बताई जा रही है।
🔶 जहरीली राख का खतरा — पर्यावरण को गंभीर चोट
फ्लाईएश डस्ट कोई साधारण मिट्टी नहीं है।
यह इलेक्ट्रिक पावर प्लांट की राख है, जिसमें—
* सिलिका
* आयरन ऑक्साइड
* एल्यूमिनियम ऑक्साइड
* हेवी मेटल्स (क्रोमियम, आर्सेनिक, लेड)
जैसे जहरीले तत्व मौजूद होते हैं।
अगर इसे बिना अनुमति खदान में डाला जाए, तो—
* हवा में PM 2.5 और PM 10 का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ता है,
* भूजल स्रोत जहरीले रसायनों से प्रभावित होते हैं,
* आसपास के गांवों में सांस-सम्बंधी बीमारियाँ बढ़ सकती हैं,
* जमीन की उर्वरता नष्ट हो सकती है।
यह केवल “अनियमितता” नहीं, यह संभावित पर्यावरणीय आपदा (Environmental Disaster) का बीज है।
🔶 खसरा-रकबा खेल — विभाग भ्रमित, माफिया लाभ में
सूत्र बताते हैं कि:
* खसरा नंबर एक बताया जाता है, काम दूसरे में होता है।
* अनुमति एक जगह की लगती है, डंपिंग दूसरी जगह हो रही है।
* NOC के लिए बार-बार एक ही भूमि का नाम, जबकि जमीनी स्थिति अलग।
यह पूरा ‘खसरा-रकबा भ्रम’ सिस्टम को गुमराह करने का एक सुनियोजित तरीका बताया जा रहा है।
🔶 जिला कलेक्टर के संज्ञान की तत्काल आवश्यकता
स्थिति इतनी गंभीर है कि जिला कलेक्टर को इस मामले की उच्च-स्तरीय जांच निर्देशित करनी चाहिए।
जांच में स्पष्ट होना चाहिए—
1. किस NOC पर, किस भूमि में फ्लाईएश गिराई जा रही है?
2. क्या इस पाटने के लिए पर्यावरणीय मंजूरी ली गई?
3. क्या खसरा-रकबा दस्तावेज़ों में धोखे का खेल चल रहा है?
4. क्या राजनीतिक प्रभाव के कारण विभागीय कार्रवाई रुकी पड़ी है?
5. क्या फ्लाईएश डस्ट के नमूने लेकर प्रदूषण मानकों की जांच की गई?
यदि जांच आगे बढ़ती है तो इस पूरे “फ्लाईएश नेटवर्क” के कई चेहरे सामने आ सकते हैं।
🔶 बहरहाल
कटंगपाली-बोंदा मुड़ा क्षेत्र में, खाली खदानों को फ्लाईएश से भरने का यह कथित ‘बड़ा खेल’ सिर्फ अवैध डंपिंग नहीं, बल्कि—
राजनीति + धनबल + विभागीय चुप्पी का खतरनाक मेल है।
यह मुद्दा खनिज, पर्यावरण, पंचायत और जिला प्रशासन — सभी के अधिकार क्षेत्र में आता है।अब समय आ गया है कि प्रशासन इस नेटवर्क को पहचानकर, नियमों की रोशनी में पूरे मामले की पारदर्शी रूप से जांच करे।
To Be Continue……………