करोड़ों टन फ्लाई ऐश का खेल: कागजों में पर्यावरण सुरक्षित, जमीन पर राख का साम्राज्य; बरपाली नाला बना जहरीले कचरे का कॉरिडोर, केलो नदी तक पहुंच रहा प्रदूषण
डमरूआ न्यूज़ /रायगढ़। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए चिता की राख तक के विसर्जन पर सख्त आपत्ति जताता है, लेकिन रायगढ़ के औद्योगिक क्षेत्र में हर दिन एनजीटी की भावना और पर्यावरणीय नियमों की खुलेआम चिता जलाई जा रही है। करोड़ों टन फ्लाई ऐश पैदा करने वाले उद्योगों के बीच कागजों में 100 प्रतिशत निपटान के दावे किए जा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर बरपाली नाला, बरदे नाला, केलो नदी और आसपास के जलस्रोतों तक फ्लाई ऐश पहुंचने के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। हाल ही में सामने आए वीडियो और स्थानीय लोगों के आरोपों ने एक बार फिर इस सवाल को जिंदा कर दिया है कि आखिर कागजों में निपटाई गई करोड़ों टन फ्लाई ऐश जमीन पर और नदियों में कैसे दिखाई दे रही है।

अप्रैल 2024 से मार्च 2025 की फ्लाई ऐश उपयोगिता रिपोर्ट के अनुसार रायगढ़ जिले में स्थित ताप विद्युत संयंत्रों और उद्योगों से एक वर्ष में लगभग 1 करोड़ 97 लाख 18 हजार 330.69 मीट्रिक टन फ्लाई ऐश उत्पन्न हुई। रिपोर्ट में अधिकांश उद्योगों ने 99 से 100 प्रतिशत तक फ्लाई ऐश उपयोग का दावा किया है। सबसे अधिक उत्पादन जिंदल पावर तमनार, एनटीपीसी लारा, अडानी पावर, जिंदल स्टील एंड पावर, टीआरएन एनर्जी तथा सरडा एनर्जी सहित अन्य उद्योगों से हुआ। दस्तावेजों में दावा किया गया है कि फ्लाई ऐश का उपयोग सीमेंट संयंत्रों, ईंट निर्माण, खदान भराई, सड़क निर्माण और अन्य कार्यों में किया गया, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की तस्वीरें और शिकायतें इन दावों से बिल्कुल उलट कहानी बयां कर रही हैं।
बरपाली नाले का ताजा मामला पूरे जिले की पर्यावरणीय व्यवस्था पर बड़ा सवाल बनकर सामने आया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नाले के दोनों किनारों को फ्लाई ऐश से पाट दिया गया, जिससे बरसात के दौरान राख पानी के साथ बहकर सीधे केलो नदी की ओर जा रही है। यह केवल एक नाले का मामला नहीं बल्कि पूरे जलग्रहण क्षेत्र के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। यदि फ्लाई ऐश का यह बहाव लगातार जारी रहता है तो इसका असर भूजल, सिंचाई, पेयजल और जलीय जैव विविधता पर भी पड़ सकता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि इस बार नाले में डंप किया गया फ्लाई ऐश रूपानाधाम और नवदुर्गा प्लांट से जुड़ा है तथा परिवहन का कार्य एक निजी ट्रांसपोर्ट फर्म द्वारा कराया गया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी शेष है, लेकिन यदि जांच में यह सही पाया जाता है तो यह केवल पर्यावरणीय लापरवाही नहीं बल्कि जलस्रोतों के साथ सुनियोजित खिलवाड़ माना जाएगा। प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के लिए यह मामला निष्पक्ष जांच की कसौटी बन गया है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह बताया जा रहा है कि लगभग आठ महीने पहले भी इसी नाले में फ्लाई ऐश डंपिंग की शिकायत हुई थी। आरोप है कि उस समय संबंधित विभागों ने स्थायी समाधान के बजाय राख के ऊपर केवल मिट्टी डलवाकर मामले को शांत कर दिया और सीमित कार्रवाई के बाद फाइल बंद कर दी गई। अब बरसात ने मिट्टी की परत बहा दी है और वही फ्लाई ऐश फिर से खुलेआम बहती दिखाई दे रही है। यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण व्यवस्था की गंभीर विफलता मानी जाएगी।
रायगढ़ के गेरवानी, सरायपाली, तमनार, घरघोड़ा रोड और औद्योगिक क्षेत्रों में फ्लाई ऐश परिवहन आज एक बड़े कारोबार का रूप ले चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि खुले वाहनों से उड़ती राख खेतों, घरों, तालाबों और पेड़ों तक पहुंच रही है। कई गांवों में लोगों को कपड़े सुखाने तक में परेशानी होती है और फसलों पर राख की परत जमना आम बात बन चुकी है। प्रदूषण की शिकायतें लगातार होती हैं, लेकिन कार्रवाई प्रायः तब दिखाई देती है जब मामला मीडिया की सुर्खियां बनता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि जिला प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण मंडल और उद्योगों के रिकॉर्ड के अनुसार लगभग पूरी फ्लाई ऐश का वैज्ञानिक उपयोग हो चुका है तो फिर नालों, जलस्रोतों और गांवों में यह राख आखिर कहां से आ रही है। क्या उपयोगिता रिपोर्ट का कभी स्वतंत्र भौतिक सत्यापन कराया गया? क्या जिन खदानों में लाखों टन फ्लाई ऐश भरने का दावा किया गया, वहां जीपीएस, ड्रोन या थर्ड पार्टी ऑडिट से जांच हुई? क्या परिवहन करने वाले वाहनों की निगरानी हुई? यदि नहीं, तो करोड़ों टन फ्लाई ऐश के निपटान का दावा केवल कागजी आंकड़ा बनकर रह जाता है।
अब यह मामला केवल पर्यावरण प्रदूषण का नहीं बल्कि लाखों लोगों के स्वास्थ्य, किसानों की आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न बन चुका है। बरदे नाले से केलो नदी तक बहती फ्लाई ऐश यदि नहीं रोकी गई तो आने वाले वर्षों में इसका असर पूरे क्षेत्र के जल स्रोतों पर दिखाई दे सकता है। वीडियो सामने आने और शिकायतें दर्ज होने के बाद अब निगाहें जिला प्रशासन, पर्यावरण संरक्षण मंडल और राज्य सरकार पर टिकी हैं कि इस बार दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होगी या फिर एक बार फिर राख पर मिट्टी डालकर मामला दफना दिया जाएगा।
कागजों में पर्यावरण बचा, जमीन पर राख का साम्राज्य
अप्रैल 2024 से मार्च 2025 की सरकारी रिपोर्ट में लगभग 1.97 करोड़ मीट्रिक टन फ्लाई ऐश के उपयोग का दावा किया गया है। अधिकांश उद्योगों ने 100 प्रतिशत तक निपटान दर्शाया है। इसके बावजूद बरपाली नाले, ग्रामीण क्षेत्रों और जलस्रोतों में फ्लाई ऐश मिलने के आरोप यह संकेत दे रहे हैं कि कागजी दावे और जमीनी स्थिति के बीच बड़ा अंतर हो सकता है। यही अंतर अब निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है।
बरपाली से केलो तक बहता जहर
स्थानीय लोगों का आरोप है कि बरपाली नाले में फ्लाई ऐश डंप किए जाने से बरसात के दौरान राख पानी के साथ बहकर केलो नदी की ओर जा रही है। यदि इसकी पुष्टि होती है तो यह केवल प्रदूषण नहीं बल्कि प्राकृतिक जलस्रोतों को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाने वाला गंभीर मामला होगा, जिसकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
क्या पर्यावरण विभाग और जिला प्रशासन इन सवालों के जवाब दे सकते हैं…
यदि फ्लाई ऐश का शत-प्रतिशत उपयोग हुआ तो नालों में राख कैसे पहुंची? जिन खदानों में लाखों टन फ्लाई ऐश भरने का दावा किया गया, उनका स्वतंत्र सत्यापन किसने किया? पिछले वर्षों में फ्लाई ऐश डंपिंग के कितने मामलों में एफआईआर या बड़ी कार्रवाई हुई? कितने उद्योगों पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई गई? और आखिर शिकायतें हर वर्ष बढ़ने के बावजूद स्थायी समाधान क्यों नहीं हो सका?
केवल जांच या जवाबदेही भी होगी तय
रायगढ़ की पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए सभी बड़े उद्योगों की फ्लाई ऐश उपयोगिता का थर्ड पार्टी ऑडिट, सभी डंपिंग स्थलों का ड्रोन सर्वे, जल एवं मिट्टी की वैज्ञानिक जांच, फ्लाई ऐश परिवहन की डिजिटल निगरानी तथा पूरी रिपोर्ट को सार्वजनिक करना समय की मांग है। यदि अब भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो करोड़ों टन फ्लाई ऐश का यह संकट आने वाले वर्षों में रायगढ़ के पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।



























