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महुआपाली में ‘डोलोमाइट का खेला’, सिस्टम दर्शक बना

कटंगपाली–महुआपाली क्षेत्र में डोलोमाइट का अवैध खनन अब किसी छुपी हुई गतिविधि का नाम नहीं रह गया है। यहां बरसों से बिना किसी वैध माइनिंग लीज के डोलोमाइट निकाला जा रहा है और यह काम इतनी खुलेआम हो रहा है कि खनन स्थलों तक पहुंचने के लिए किसी जांच की नहीं, सिर्फ नजर उठाने की जरूरत है। इसके बावजूद जिम्मेदार खनिज विभाग की चुप्पी इस पूरे मामले को और गंभीर बना देती है।

महुआपाली क्षेत्र में डोलोमाइट का खनन किसी एक मौसम या कुछ दिनों का मामला नहीं है। यह वर्षों से लगातार जारी है। खदानों में मशीनें चलती हैं, पत्थर निकाला जाता है और उसका परिवहन भी नियमित रूप से होता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन खदानों के नाम पर न तो किसी वैध माइनिंग लीज का रिकॉर्ड सामने आता है और न ही विभागीय कार्रवाई का कोई ठोस उदाहरण दिखता है।

खनिज नियमों के अनुसार किसी भी प्रकार का खनन बिना वैध लीज के अपराध की श्रेणी में आता है। इसके बावजूद कटंगपाली–महुआपाली क्षेत्र में यह गतिविधि जिस निर्भीकता से चल रही है, वह सीधे तौर पर विभागीय निगरानी और नियंत्रण व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। सवाल यह नहीं है कि अवैध खनन हो रहा है या नहीं, सवाल यह है कि यह सब इतने लंबे समय से कैसे चलता आ रहा है।

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि इस पूरे अवैध खनन तंत्र को ऊपर से मौन समर्थन प्राप्त है। मीडिया में शिकायतें और खबरें आने के बावजूद कार्रवाई का अभाव इस चर्चा को और बल देता है। कई बार यह भी कहा जाता रहा है कि प्रभावशाली राजनीतिक संरक्षण के चलते खनन माफियाओं को एक तरह का अभयदान मिला हुआ है, जिसके कारण निचले स्तर पर कोई अधिकारी कदम उठाने की हिम्मत नहीं करता।

खनिज विभाग की भूमिका इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है। विभाग का दायित्व सिर्फ लीज जारी करना या रॉयल्टी वसूलना नहीं है, बल्कि अवैध खनन पर रोक लगाना भी उसकी जिम्मेदारी है। जब वर्षों से बिना लीज डोलोमाइट निकाला जा रहा हो और फिर भी न जांच हो, न प्रकरण दर्ज हो और न दंडात्मक कार्रवाई दिखे, तो यह विभागीय निष्क्रियता का स्पष्ट संकेत देता है।

कटंगपाली–महुआपाली क्षेत्र में अवैध खनन का यह मामला केवल खनिज संपदा के नुकसान तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर पर्यावरण, भूमि संरचना और भविष्य की पीढ़ियों पर पड़ रहा है। पहाड़ों की अंधाधुंध खुदाई से जमीन कमजोर हो रही है और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों की चुप्पी यह संदेश देती है कि नियम-कानून सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं।

यह पूरा प्रकरण अब प्रशासनिक इच्छाशक्ति की परीक्षा बन चुका है। जब अवैध खनन के तथ्य वर्षों से सामने हों, मीडिया में बार-बार मामला उठे और फिर भी कार्रवाई न हो, तो यह स्थिति अपने आप में बहुत कुछ कह जाती है। सवाल यह है कि क्या कटंगपाली–महुआपाली क्षेत्र में चल रहा यह अवैध डोलोमाइट खनन कभी विभागीय कार्रवाई के दायरे में आएगा, या फिर यह सिलसिला इसी तरह बिना लीज और बिना डर के चलता रहेगा।

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