मोहन जूट मिल की जमीन पर दोहरा खेल, एक तरफ 10 करोड़ की ईएसआईसी रिकवरी, दूसरी ओर उसी जमीन की प्लाटिंग की खुली तैयारी…
तालाब दर्ज सरकारी भूमि पर भी कब्जा, कॉलोनाइजरों पर गुंडागर्दी के आरोप, प्रशासन की भूमिका संदेहास्पद
डमरूआ न्यूज़/ रायगढ़।
रायगढ़ के जूटमिल क्षेत्र में मोहन जूट मिल की जमीन अब कानून, प्रशासन और सरकार की साख पर सीधा सवाल बन चुकी है। एक तरफ कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा इसी जमीन को लेकर 10 करोड़ 42 लाख रुपये से अधिक की वसूली का निषेधात्मक आदेश चस्पा किया गया है, तो दूसरी ओर कॉलोनाइजर अनूप बंसल और बंटी डालमिया एंड ग्रुप द्वारा उसी जमीन पर प्लाटिंग कर 10000 रुपये प्रति वर्गफुट तक बेचने की तैयारी चल रही है, ऐसी चर्चा है। यह स्थिति किसी सामान्य अव्यवस्था की नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित और संरक्षित खेल की ओर इशारा करती है, जिसमें नियम केवल कागजों पर हैं और जमीन पर दबंगों का कब्जा।
ईएसआईसी रायपुर द्वारा रायगढ़ प्रोजेक्ट्स लिमिटेड, पूर्व में मोहन जूट मिल्स लिमिटेड, के खिलाफ आयकर अधिनियम की दूसरी अनुसूची के नियम 48 के तहत 17.38 हेक्टेयर भूमि को कुर्क करने की चेतावनी दी गई है। आदेश में संपत्ति की बिक्री, हस्तांतरण और किसी भी प्रकार के लाभ पर पूर्ण प्रतिबंध दर्ज है। इसके बावजूद जमीन पर समतलीकरण, मिट्टी भराव और प्लाटिंग की गतिविधियां बिना किसी डर के जारी हैं।
तालाब दर्ज सरकारी भूमि पर कब्जा, रिकॉर्ड की सच्चाई बेनकाब
राजस्व अभिलेख और सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि जूटमिल क्षेत्र के खसरा नंबर 32/3, 40/3, 51/1, 110/3, 38/2, 265/2, 28/27 सहित कई भूमि 1959 से तालाब और जलभराव क्षेत्र के रूप में दर्ज है। एसडीएम कार्यालय के पत्र और तहसीलदार की रिपोर्ट में यह साफ दर्ज है कि भूमि का स्वरूप कभी बदला नहीं गया। इसके बावजूद कॉलोनाइजरों द्वारा तालाब पाटकर प्लाटिंग की जा रही है। स्थानीय लोगों का दावा है कि जूटमिल की लगभग 51 एकड़ भूमि में से करीब 17 एकड़ जमीन सरकारी है, जिस पर अवैध कब्जा कर लिया गया है। यह केवल जमीन नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों और पर्यावरण पर सीधा हमला है।
10 करोड़ 42 लाख की रिकवरी, फिर भी कार्रवाई जमीन पर शून्य
ईएसआईसी के नोटिस में 10 करोड़ 42 लाख रुपये से अधिक की बकाया राशि दर्शाई गई है, जो अक्टूबर 2025 तक की स्थिति की है और जिस पर आगे भी ब्याज देय रहेगा। आदेश की प्रतिलिपि तहसीलदार और उप पंजीयक को भेजी जा चुकी है, ताकि किसी भी प्रकार का पंजीयन रोका जा सके। इसके बावजूद न तो निर्माण रुका है और न ही प्लाटिंग की तैयारी। सवाल यह है कि जब जमीन कुर्की की आशंका में है, तो प्रशासन इस खुले उल्लंघन पर मौन क्यों है। यह चुप्पी अब प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संदिग्ध सहयोग की तरह दिखाई दे रही है।
एक तरफ कुर्की की तलवार, दूसरी तरफ निवेशकों को लुभाने का खेल
स्थिति यह है कि एक ओर इसी जमीन पर ईएसआईसी द्वारा कुर्की की तलवार लटक रही है, वहीं दूसरी ओर कॉलोनाइजर उसी जमीन को सुरक्षित निवेश बताकर संभावित खरीदारों को आकर्षित करने में जुटे हैं। जिस भूमि पर कभी भी कुर्की हो सकती है, उस पर प्लाट बेचने की तैयारी किसी दुस्साहस से कम नहीं लगती। जानकारों का कहना है कि इस तरह की स्थिति में निवेशकों को लुभाना केवल जोखिम भरा ही नहीं, बल्कि एक प्रकार की महत्थकी भी प्रतीत होता है, क्योंकि कल यदि जमीन कुर्क हुई तो खरीदारों का पैसा और भविष्य दोनों अधर में लटक जाएंगे।
गुंडागर्दी के आरोप, पूर्व कर्मचारियों के हक पर सीधा डाका
स्थानीय निवासियों और पूर्व जूटमिल श्रमिकों का आरोप है कि विरोध करने पर कॉलोनाइजर से जुड़े लोग धमकाते हैं और डर का माहौल बनाते हैं। जिन श्रमिकों ने वर्षों तक फैक्ट्री में काम किया, जिनका ईएसआई अंशदान आज भी बकाया है, उनके अधिकारों को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। एक तरफ ईएसआईसी कागजों पर वसूली की प्रक्रिया दिखा रहा है, दूसरी तरफ जमीन बेचकर मुनाफा कमाने की तैयारी चल रही है। सरकार और प्रशासन इस पूरे घटनाक्रम को मूक दर्शक की तरह देख रहे हैं, जिससे यह संदेश जा रहा है कि कानून कमजोर और दबंग मजबूत हैं।
प्रशासनिक ईमानदारी की अग्नि परीक्षा
मोहन जूट मिल की जमीन अब सिर्फ एक संपत्ति नहीं, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी, कर्मचारियों के अधिकार और सरकारी संपत्ति की सुरक्षा की अग्निपरीक्षा बन चुकी है। यदि इस पर अब भी सख्त और पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह माना जाएगा कि इस पूरे खेल में सिर्फ कॉलोनाइजर नहीं, बल्कि पूरा तंत्र बराबर का भागीदार है।