डमरूआ न्यूज़ /रायगढ़। रायगढ़ जिले में बुधवार के तड़के पुलिस के द्वारा कबाड़ पर प्रहार करने का दावा किया गया है. परंतु अवैध कबाड़ कारोबार के खिलाफ पुलिस द्वारा की गई बहुचर्चित कार्रवाई अब सवालों के घेरे में है। वर्षों से शहर और ग्रामीण इलाकों में खुलेआम चल रहे कबाड़ के काले कारोबार पर अचानक हुई छापेमारी को लेकर यह चर्चा तेज है कि पुलिस किसी स्वतः संज्ञान या सतत निगरानी के चलते नहीं जागी, बल्कि ऊपर से मिले निर्देशों के बाद यह कार्रवाई की गई। जिस अवैध धंधे की भनक पुलिस को रोजमर्रा की गश्त, थानों की गतिविधियों और मुखबिर तंत्र से पहले ही लग जानी चाहिए थी, उस पर अब जाकर कार्रवाई होना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
छापे तो पड़े, लेकिन पते और ठिकाने क्यों छुपाए गए
इस कथित बड़ी कार्रवाई में पुलिस ने यह जरूर बताया कि जिलेभर में कई स्थानों पर छापेमारी की गई, लेकिन जिन गोदामों, कबाड़ यार्डों और ठिकानों पर दबिश दी गई, उनके स्पष्ट पते और पहचान मीडिया से साझा नहीं की गई। शहर में यह सवाल उठ रहा है कि यदि कार्रवाई पारदर्शी और निष्पक्ष है तो फिर यह गोपनीयता क्यों। वर्षों से जिन इलाकों में भारी मात्रा में कबाड़ का भंडारण और परिवहन होता रहा, वहां तक पुलिस की नजर अब तक कैसे नहीं पहुंची। आमजन यह मानने को तैयार नहीं है कि ट्रक, हाईवा और टनों कबाड़ का यह कारोबार पुलिस की जानकारी के बिना चलता रहा होगा।
नाम भी नहीं, असली खिलाड़ी भी सुरक्षित
शहर में यह चर्चा आम है कि पुलिस और अवैध कबाड़ कारोबारियों के बीच लंबे समय से अच्छे संबंध रहे हैं। यही वजह मानी जा रही है कि न तो किसी बड़े कबाड़ी का नाम सार्वजनिक किया गया और न ही उन संगठित व्यापारियों पर हाथ डाला गया, जिन्हें इस काले धंधे का असली संचालक माना जाता है। कार्रवाई में जिन लोगों की गिरफ्तारी दिखाई गई, उन्हें केवल छोटे स्तर के लोग या मोहरे बताया जा रहा है। इससे यह संदेश जा रहा है कि असली खिलाड़ी अब भी पर्दे के पीछे सुरक्षित हैं और पुलिस की कार्रवाई केवल निचले स्तर तक सीमित रह गई।
कबाड़ियों का खुला दावा, माल वापस आ ही जाएगा
अवैध कबाड़ कारोबार से जुड़े लोगों के बीच खुलेआम यह कहा जा रहा है कि यह कार्रवाई ज्यादा दिनों तक असर नहीं दिखाएगी। कबाड़ी डंके की चोट पर दावा कर रहे हैं कि दो-तीन दिन के भीतर न्यायालय के माध्यम से पुलिस द्वारा जप्त किया गया अधिकांश सामान वापस ले लिया जाएगा। जिले में पूर्व के अनुभव भी इसी ओर इशारा करते हैं। शायद ही कोई ऐसा मामला हो, जहां अवैध कबाड़ पर कार्रवाई के बाद जप्त माल स्थायी रूप से जब्त रहा हो। अक्सर औपचारिकताएं पूरी होने के बाद वही सामग्री दोबारा उन्हीं लोगों के हवाले कर दी जाती है। यही कारण है कि जनता इस बार भी इसे कागजी सख्ती मान रही है, न कि कबाड़ माफिया के खिलाफ निर्णायक लड़ाई।
पुलिस ने इस कबाड़ कार्रवाई के संदर्भ में मीडिया को यह बताया
थाना कोतवाली क्षेत्र अंतर्गत ग्राम लाखा में तीन अलग-अलग स्थानों पर की गई कार्रवाई में दो 10 चक्का ट्रक, दो माजदा, एक बोलेरो वाहन में लोड कबाड़ तथा ग्राम चिराईपानी रोड किनारे स्थित सिकंदर कबाड़ी के गोदाम से करीब 46 टन अवैध कबाड़ जब्त किया गया, जिसकी कीमत दो करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है। मौके से हाईवा और ट्रकों में भरे छोटे-बड़े वाहनों के पार्ट्स, लोहे के पाइप, सरिया, एंगल, गोली, खाली सिलेंडर और हाइड्रोलिक मशीनें बरामद की गईं। इसी क्रम में पूंजीपथरा क्षेत्र में पुलिस टीम ने छह अलग-अलग स्थानों पर दबिश देकर तीन ट्रक के साथ छह आरोपियों को पकड़ा और लगभग 67 टन अवैध कबाड़ जब्त किया, जिसकी अनुमानित कीमत 34 लाख रुपये बताई गई है। यहां आरोपियों पर पृथक से प्रतिबंधात्मक कार्रवाई भी की गई है। इसी प्रकार पुसौर क्षेत्र में तीन अलग-अलग स्थानों पर कार्रवाई करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, जिनके कब्जे से एक टाटा 710 वाहन और चार टन से अधिक कबाड़ जब्त किया गया। इसके अलावा चक्रधरनगर और भूपदेवपुर क्षेत्र में तीन-तीन स्थानों पर, कोतरारोड़ और खरसिया में दो-दो स्थानों पर तथा धरमजयगढ़ और तमनार में एक-एक स्थान पर दबिश दी गई। इस प्रकार जिलेभर में एक साथ चली कार्रवाई में हाईवा, ट्रक, टाटा 710, माजदा और छोटा हाथी पिकअप सहित कुल 14 वाहन जब्त किए गए।
दर्जनों नंबर प्लेट मिलीं, पर क्यों नहीं दिखाया गया सच
छापेमारी के दौरान कबाड़ गोदामों और वाहनों से दर्जनों दोपहिया और चारपहिया वाहनों की नंबर प्लेटें मिलने की चर्चा है, लेकिन इस अहम तथ्य को मीडिया के सामने स्पष्ट रूप से उजागर नहीं किया गया। सवाल यह उठ रहा है कि ये नंबर प्लेट किन वाहनों की हैं, क्या ये चोरी की गाड़ियों से जुड़ी हुई हैं और क्या इनके जरिए वाहन चोरी के बड़े नेटवर्क का खुलासा हो सकता है। यह भी चर्चा में है कि नंबर प्लेटों को सार्वजनिक करने से कई बड़े नाम और पुराने मामलों के तार खुल सकते हैं। अब जिलेभर की जनता यह जानना चाहती है कि क्या पुलिस इन नंबर प्लेटों का पूरा विवरण सार्वजनिक करेगी और क्या इनके जरिए चोरी हुई गाड़ियों का राज सामने आ पाएगा, या यह जानकारी जांच के नाम पर फिलहाल दबाकर रखी जाएगी।