डमरुआ डेस्क सारंगढ़ ।।कटंगपाली क्षेत्र में इन दिनों डोलोमाइट पत्थर का एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसे देखकर खनिज नियम-कायदों की किताब भी शर्मा जाए। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक यहाँ रोज़ाना बड़े पैमाने पर डोलोमाइट पत्थर का अवैध खनन और परिवहन किया जा रहा है, वो भी बिना किसी वैध अनुमति, बिना रॉयल्टी और बिना किसी डर के।
कहानी में दो नाम बार-बार कानों में गूंजते हैं—एक ‘धनी’ और दूसरा ‘माधव’। नाम ऐसे कि जैसे सब कुछ “धन” और “माधव की माया” से ही चल रहा हो। सीधे आरोप नहीं, लेकिन इशारे इतने साफ हैं कि तस्वीर खुद बोलने लगती है।
बिना लीज, बिना अनुमति… JCB–पोकलेन का खुला इस्तेमाल
सूत्रों का दावा है कि क्षेत्र में पोकलेन और जेसीबी मशीनों की मदद से डोलोमाइट पत्थर निकाला जा रहा है। न कोई स्वीकृत खदान, न पर्यावरणीय मंजूरी, न परिवहन पास—फिर भी ट्रैक्टरों की कतारें दिन-रात दौड़ रही हैं।
बताया जा रहा है कि:
* हर ट्रैक्टर में करीब 5 टन डोलोमाइट लोड किया जाता है
* मौके पर 20 से अधिक ट्रैक्टर लगातार लगे रहते हैं
* एक दिन में करीब 100 चक्कर
* यानी रोज़ाना लगभग 500 टन डोलोमाइट की निकासी
बाज़ार भाव और ‘गायब’ राजस्व
कटंगपाली क्षेत्र में डोलोमाइट का मौजूदा भाव करीब ₹260–270 प्रति टन बताया जा रहा है। इस हिसाब से:
* 500 टन × ₹260 = ₹1,30,000 प्रतिदिन
हैरानी की बात यह है कि इस पूरी रकम का एक रुपया भी शासन के खाते में रॉयल्टी के रूप में नहीं पहुँच रहा। न रॉयल्टी चालान, न वैध परमिट—सीधा-सीधा राजस्व की सेंधमारी।
कागज़ों का जादू: अवैध पत्थर कैसे बनता है ‘वैध’?
स्थानीय जानकारों का कहना है कि असली खेल इसके बाद शुरू होता है।
जो पत्थर अवैध रूप से निकाला जाता है, उसे:
* ऐसे क्रेशरों में खपाया जाता है
* जहाँ से बाद में किसी दूसरी लीज की रॉयल्टी दिखाकर कागज़ पूरे कर दिए जाते हैं
-उन खदानों के नाम पर, जहाँ वास्तव में खनन हो ही नहीं रहा
यानी ज़मीन कटंगपाली की, पत्थर अवैध—और कागज़ किसी और खदान के!
क्रेशर मालिकों की भूमिका भी सवालों में
सूत्र यह भी इशारा करते हैं कि इस पूरे नेटवर्क में कुछ क्रेशर संचालकों की भूमिका संदिग्ध है। बिना वैध दस्तावेज़ के पत्थर आखिर क्रेशर तक पहुँच कैसे रहा है?
क्या क्रेशर प्रबंधन को मालूम नहीं कि पत्थर कहाँ से आ रहा है, या फिर सब कुछ “समझदारी” से समझा-बुझाकर किया जा रहा है?
खनिज विभाग की चुप्पी पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल खनिज विभाग पर खड़ा होता है।
* क्या विभाग को रोज़ाना सैकड़ों ट्रैक्टरों की आवाजाही दिखाई नहीं देती?
* क्या बिना अनुमति चल रही मशीनें नज़र नहीं आतीं?
* या फिर सब कुछ देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है?
कटंगपाली में चल रहा यह “कमाल का खेल” केवल अवैध खनन का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक निगरानी, विभागीय जवाबदेही और राजस्व सुरक्षा पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है।
अब देखना यह है कि खनिज विभाग इस पूरे मामले में जांच करता है या फिर यह ‘धनी–माधव मॉडल’ यूँ ही धड़ल्ले से चलता रहेगा—और सरकारी खजाना रोज़ यूँ ही खाली होता रहेगा।