रायगढ़ न्यूज (सारंगढ़-बिलाईगढ़).
सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में लाइमस्टोन परिवहन को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। टीमरलग़ा खनिज जांच चौकी से रोज़ाना गुजरने वाले लाइमस्टोन से भरे ट्रकों की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि जांच व्यवस्था कागज़ों में सख़्त है, मगर ज़मीनी स्तर पर बेहद ‘नरम’।
स्थानीय सूत्रों से मिल रही जानकारी इस बात की ओर इशारा करती है कि कई लाइमस्टोन वाहन बिना वैध रॉयल्टी दस्तावेज़ की सही जांच के आगे बढ़ रहे हैं, जिससे शासन को गंभीर वित्तीय हानि पहुँचने की आशंका है।
नियम साफ कहते हैं—
बिना रॉयल्टी किसी भी खनिज का परिवहन पूरी तरह अवैध है, और इसे सामान्य भाषा में रॉयल्टी चोरी की श्रेणी में रखा जाता है।
🔶 क्या चेकपोस्ट किसी ‘अनदेखी नीति’ पर चल रहा है?
स्थानीय चर्चाओं में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब लाइमस्टोन ट्रकों का इतना बड़ा प्रवाह चल रहा है, तो रॉयल्टी वेरिफिकेशन में इतनी ढिलाई क्यों दिख रही है?
जिस चेकपोस्ट का काम हर वाहन की जांच करना है, वही अगर नज़रें फेर ले, तो यह केवल लापरवाही नहीं—पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल है।
🔶 संदिग्ध ‘लेन-देन सिस्टम’ — अंदर की दुनिया की फुसफुसाहट बढ़ी
क्षेत्र में यह बात अब खुलकर की जा रही है कि जाँच प्रक्रिया के दौरान कुछ वाहनों को ‘विशेष सुविधा’ प्रदान की जा रही है, जो साधारण प्रोटोकॉल से बिल्कुल अलग दिखती है।
सूत्र बताते हैं कि यह सुविधा किसी औपचारिक नियम के तहत नहीं, बल्कि किसी अघोषित “महीना आधारित व्यवस्था”, “अनौपचारिक कलेक्शन सिस्टम” या किसी अंदरूनी समझौते पर टिकी बताई जा रही है।
कई लोग संकेत दे रहे हैं कि—
“अगर कोई वाहन कागज़ों में कमज़ोर है और फिर भी आराम से आगे निकल रहा है…
तो उसके पीछे ज़रूर कुछ ऐसा है जो कागज़ पर नहीं, कहीं और लिखा जा रहा है।”
कुछ क्रेशर संचालकों के बीच यह चर्चा आम है कि हर महीने एक तय राशि देकर ‘व्यवस्था को सुचारू’ रखा जाता है, ताकि उनके वाहनों की राह आसान रहे।
भले ही इन बातों के दस्तावेज़ मौजूद न हों, मगर इलाके में जिस आत्मविश्वास से यह बातें की जा रही हैं, वह अपने-आप में कई सवाल खड़े करती है—
क्या ये सिर्फ़ अफवाहें हैं, या इसके पीछे और गहरी परतें छिपी हैं?
🔶 राजनीतिक दबदबा और क्रेशर संचालकों की ‘बेखौफ गतिविधियाँ’
सूत्रों का यह भी दावा है कि कुछ क्रेशर संचालक राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर वाहनों को रोक-टोक से बाहर रख रहे हैं।
जब राजनीतिक दबाव और सिस्टम की कमजोरी मिल जाए, तो नियम केवल किताबों में रह जाते हैं—जमीन पर नहीं।
🔶 शासन को लाखों/करोड़ों की संभावित हानि
लाइमस्टोन परिवहन राज्य के राजस्व का बड़ा स्रोत है।
अगर बिना रॉयल्टी गाड़ियाँ निकल रही हैं, तो यह सीधा-सीधा एक राजस्व लीक है, जो महीनों में लाखों नहीं—करोड़ों तक पहुँच सकता है।
यह केवल सरकारी नुकसान नहीं है,
यह पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को खतरे में डालने वाली स्थिति है।
🔶 विभागीय जिम्मेदारी पर सवाल — क्या सिर्फ़ फाइलें ही चल रही हैं?
खनिज विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी रॉयल्टी की जांच और सत्यापन है।
लेकिन यह देखना बेहद चिंताजनक है कि जिन जगहों पर सबसे ज्यादा गतिविधियाँ होनी चाहिए, वहीं सबसे ज्यादा चुप्पी दिखाई दे रही है।
क्या विभागीय अधिकारियों तक यह चर्चा नहीं पहुँच रही?
या पहुँचकर भी अनदेखी की जा रही है?
या फिर किसी स्तर पर ऐसी ताक़तें सक्रिय हैं जो जांच की दिशा मोड़ रही हैं?
ये सवाल फिलहाल हवा में हैं…
लेकिन जवाब प्रशासन को ही देना होगा।
🔶 कलेक्टर के संज्ञान की मांग — चुप्पी अब विकल्प नहीं
जिला कलेक्टर को इस पूरे मामले पर तत्काल संज्ञान लेने की आवश्यकता है।
लाइमस्टोन ट्रकों के इस बेखौफ परिवहन ने जिले में कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—
* क्या टीमरलग़ा चेकपोस्ट पर नियमों का पालन हो रहा है?
* क्या रॉयल्टी दस्तावेज़ की सही जांच की जा रही है?
* क्या किसी स्तर पर महीना-प्रथा या अनौपचारिक लेन-देन की भूमिका है?
* क्या राजनीतिक दबाव सिस्टम को कमजोर कर रहा है?
इन सवालों का जवाब केवल एक निष्पक्ष, उच्च स्तर की जांच ही दे सकती है।
बहरहाल टीमरलग़ा चेकपोस्ट और लाइमस्टोन परिवहन से जुड़ी बढ़ती अनियमितताएँ अब केवल चर्चा का विषय नहीं, बल्कि जिले की प्रशासनिक चुनौतियों का बड़ा केंद्र बन चुकी हैं।
अब ज़िम्मेदारी प्रशासन की है कि वह इन संकेतों, संदेहों और चर्चाओं को गंभीरता से लेकर तुरंत कार्रवाई करे, ताकि रॉयल्टी
चोरी की इस संभावित श्रृंखला पर रोक लग सके और शासन का राजस्व सुरक्षित रह सके।